Duniya Mere Aage: हम अक्सर अपने कामों को टालने के आदी होते हैं। अनिवार्य और मजबूरी वाले दैनिक कार्य हमें करने ही पड़ते हैं, लेकिन इसके अलावा अपने शौक, अपने स्वप्नों को लोग अक्सर स्थगित रखते हैं। स्थगन की यह प्रक्रिया इस तरह हो गई है कि स्वाभाविक लगने लग गई है। कार्यों को अक्सर हम समय न होने का सोचकर एक तरफ रखते हैं और कभी-कभी वास्तव में उतना समय हमारे पास होता भी नहीं।
यह हमेशा ईमानदार उत्तर नहीं होता। अधिकतर कार्य समय नहीं होने के बजाय हमारे एक निश्चित और स्थिर जीवन शैली के अभ्यस्त होने की वजह से टाले जाते हैं। कामों को टालने से हम उनसे मुक्त नहीं हो पाते। वे हमारे मन-मस्तिष्क पर बोझ बनकर स्थायी तनाव का रूप लेने लगते हैं। इससे हमारी आदत खराब होती है। वहीं चिंता और बोरियत में भी इजाफा होता है।
सोचा हुआ न करने से धीरे-धीरे एक अपराधबोध हममें जमने लगता है और आत्मविश्वास कम होने लगता है। इससे बहुत कम समय और मेहनत मांगने वाले कार्य भी समय निकलने के साथ असंभव लगने लगते हैं। किसी को कुछ लिखना है, कहीं जाना है, किसी से मिलना है, लंबे समय बाद फोन करना है, खाने में कुछ नया बनाना है, नई किताब पढ़नी है, व्यायाम करना शुरू करना है- जैसे बहुत सारे काम हमेशा स्थगित रहते हैं।
जैसे बच्चे सोचते हैं कि वार्षिक परीक्षा के बाद मैं यह सब करूंगा, लेकिन वैसा हो पाता नहीं। ठीक वैसे ही हम इन कामों के लिए छोटे-छोटे पड़ाव चुन लेते हैं। सोचते हैं बस इसके बाद, इसके बाद मैं अपने अनुसार जीऊंगी। अधिकतर लोग नौकरी को लेकर सोचते हैं कि एक बार नौकरी मिल जाए, उसके बाद सब ठीक हो जाएगा। मैं अपने सभी अधूरे काम निपटा सकूंगा।
मगर एक परिस्थिति दूर से जैसी समस्याहीन दिखती है, वैसी होती नहीं। यह उस परिस्थिति में जाकर ही जाना जाता है। हम वर्तमान को हमेशा कठिन समय मानते हुए सोचते हैं कि भविष्य इससे आसान होगा और उस भविष्य के वर्तमान बनने पर सोचते हैं कि इससे तो पहले ही ठीक था।
चीजों को टालने से वे हमारे भीतर अधूरी आकांक्षाओं और असंतुष्टि के रूप में जमा होती जाती हैं, जिससे न सिर्फ हमारी कार्यक्षमता, बल्कि मानसिक-शारीरिक स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है, क्योंकि हमें लगता है कि दूसरे तो अपने लिए कुछ भी स्थगित नहीं रखते। वे तो जीवन का आनंद लेते हैं और हम हमेशा अधबीच में रहते हैं।
हरेक दूसरे के बारे में ऐसा ही सोचता है, यही मानवीय स्वभाव है। स्थगित किए कामों की सूची बनाने के बजाय हम एक-एक करके उन्हें करना शुरू करें, तो वे धीरे-धीरे हमारे दैनिक-क्रियाकलाप का हिस्सा हो जाते हैं। अक्सर चीजों को सोचने में जैसा भार लगता है, काम शुरू करने पर उससे कम मेहनत लगती है। इससे व्यक्ति खुद को बहलाने और बहाना मारने की आदत से भी बाहर आ सकता है।
इन कार्यों को एक साथ करने के बजाय प्राथमिकता के हिसाब से क्रमश: किया जा सकता है। कहते हैं, यात्राएं कितनी भी लंबी क्यों न हों, वे एक कदम से ही शुरू होती हैं। शुरुआत कितनी ही छोटी क्यों न हो, मनुष्य को बड़ा आत्मविश्वास देती है। जब व्यक्ति अरसे से रुके हुए कामों को करता है, तो केवल काम ही नहीं करता, बल्कि यह विश्वास भी हासिल करता है कि एक ढर्रा पकड़ चुकी जिंदगी को थोड़ी-सी हलचल देकर खुद को जीवंत कर सकता है।
उससे वह एक ऐसे माहौल से निकलने में सक्षम होता है, जिसने उसकी चेतना को जड़ करने में अहम भूमिका निभाई है। जब व्यक्ति बहुत दिनों तक कुछ भी नया नहीं करता, किसी नए काम या दिलचस्पी के कार्य को करने की कोशिश नहीं करता, तब उसकी इंद्रियां धीरे-धीरे शिथिल होने लगती हैं, उसका मन सुस्त होने लगता है और मस्तिष्क में नए विचार आने बंद हो जाते हैं। रचनात्मकता तभी जिंदा रहती है, जब उन कार्यों के लिए व्यक्ति खुद के भीतर जगह बचाए रखे, जिनमें उसकी दिलचस्पी है।
इसी से मनुष्य ऊर्जावान, सुखी और सकारात्मक महसूस करता है और सीखने का ऐसा चक्र बनता है, जिसमें क्रमश: सब चीजों में सुधार होता है। सवाल यह भी है कि ऐसे समय में जब बड़ी-बड़ी उपलब्धियां व्यक्ति के जीवन को खुशी नहीं देती, उसे आनंद नहीं देती, तो इन छोटे कामों का कोई मतलब भी बनता है! यही समझने की बात है, बड़ी-बड़ी उपलब्धियों के लिए बहुत मेहनत मनुष्य पर भारी दबाव पैदा करती है।
मानव की प्रकृति है कि उसे अक्सर बेमतलब लगने वाली चीजें ही खुशी देती हैं। ऐसी चीजें, जिनके बारे में उसे बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं होती। इनसे मनुष्य के भीतर एक झनझनाहट पैदा होती है, जो उसे जिंदा रखती है। स्थगित करने की आदत से बाहर आकर हमें सोचे हुए को करने की थोड़ी आदत डालनी चाहिए। इससे भले ही ये काम पूरे हों या न हों, उनमें सफल हो पाए या नहीं, लेकिन हम उनसे बाहर जरूर आ जाते हैं। हमारे मन-मस्तिष्क से वे निकल जाते हैं।
मनुष्य एक नकारात्मक चक्र को तोड़ देता है। इससे समय का प्रबंधन हो जाता है और नए के लिए जगह भी बन जाती है। आने वाले समय के लिए अधूरे कामों और सपनों की पोटली हमें बांधकर नहीं रखनी पड़ती।
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\मनुष्य हमेशा एक ही भाव में मुश्किल से ही दिखता है। वह कभी खुश कभी नाखुश है। कभी मुखर तो कभी मौन। कभी चुस्त-दुरुस्त तो कभी आलसी और सुस्त। कभी स्वस्थ तो कभी अस्वस्थ। कभी कंजूस तो कभी खर्चीला। यह इंद्रधनुषी रंग हर जगह देखने को मिल जाते हैं। इसे हर कोई स्वीकार भी कर लेता है। पढ़िए पूरा लेख…
