मैं भी अन्ना…अब यह नारा बदल गया है। करोड़ों के महंगे स्टूडियो को धता बताते हुए करोड़ों की तनख्वाह लेने वाले एंकरों को खारिज करते हुए भारत की जेन-जी ने कहा-नमस्कार…मैं मेरा खुद का पत्रकार। इसके बाद दृश्य दिखते हैं, किस तरह लड़कियों पर पुरुष पुलिस लाठीचार्ज कर रही है। युवाओं के सिर तोड़ रही है। जेन-जी ने अपनी पत्रकारिता खुद की। स्टूडियो में जहर उगलते एंकरों का खमियाजा भुगता मैदान में पहुंचे पत्रकारों ने। रोटी के मुद्दे पर केक है न, और पानी के मुद्दे पर जूस की बात कह कर मुद्दा भटकाने वाले एंकरों के कंधे से पत्रकार का बिल्ला निकाल कर लिख दिया गया है-157। सत्ता की तरफ से मिलीसादी वर्दी वाले इन एंकरों को गणतंत्र के गणवेश वालों ने कहा कि हमें सत्ता के इस चौथे इंजन की जरूरत नहीं है। हम अपना माध्यम खुद बनेंगे। यह लड़ाई थी एंकरों के स्टूडियो बनाम जंतर मंतर की। स्टूडियो से निकलती देशद्रोही, दहशतगर्दी के खिताबोंकी मिसाइलें अपने जुनून के ड्रोनों से ध्वस्त करते गए। जंतर मंतर पर जुटे देश भर के युवा बनाम बिल्ला नंबर-157 पर बेबाक बोल।
‘मैं आपके उन सवालों का जवाब दूंगी जो प्रासंगिक हैं। आप हमेशा वही पूछते हैं जो यह सरकार पुछवाना चाहती है। मैं जानना चाहती हूं कि आपने पूछा है धर्मेंद्र जी से, वो इस्तीफा कब देंगे? गोलमोल जवाब नहीं…तो जब आप पूछेंगे न इनसे तब मैं आपके सवालों का जवाब दूंगी।’
समाचार एजंसी के सवाल के जवाब में यह बयान प्रियंका गांधी का है। विपक्ष अब सवाल के जवाब में सलाह दे रहा है कि यह सवाल किससे होना चाहिए।
पत्रकारिता का सवाल किससे है, क्यूं है और कब है, यही तीन ‘क’ तय करते हैं कि आपके सवालों के माइक पर बिल्ला नंबर एक है या 157। आज के दौर मेंअसमंजस इस बात पर है कि अगर विपक्ष सवालों का जवाब देने से इनकार कर दे, फिर खबरिया संस्थान किस खंभे के बल पर टिके रहेंगे? पत्रकारिता के सवाल के जवाब में यह सलाह अब रोज-रोज की बात होने लगी है।
जिन्हें झुकने के लिए कहा गया था, वे रेंगने लगे…भाजपा-नेता लालकृष्ण आडवाणी के इस अमर वाक्य में हम कुछ संशोधन करना चाहते हैं। टीवी पत्रकारिता का हाल यह था कि जब सत्ता पक्ष ने मीडिया को झुकने का आदेश देने के लिए बैठक बुलाई तो किसी का सिर दिखा ही नहीं। तभी सत्ता के सहायक ने कहा-नीचे देखो, नीचे…। मुख्यधारा की ज्यादातर पत्रकारिता झुकने के आदेश के पहले ही लेटी हुई मिली। सत्ता का आदेश देने का मजा भी किरकिरा हो गया।
157…जंतर मंतर से लेकर सोशल मीडिया पर वो संख्या है जो इन दिनों सबसे ज्यादा बोली जा रही है। यह है विश्व प्रेस स्वतंत्रता के संदर्भ में भारतीय मीडिया की रैंकिंग। क्या वजह है कि इन दिनों देश के ज्यादातर समस्याओं की वजह संख्या-157 को करार दिया जा रहा है। टीवी चैनलों की विश्वसनीयता पर संकट से उनकी कमाई पर क्या असर पड़ा है, इसके पुष्ट आंकड़े हमारे सामने नहीं हैं, लेकिन इंटरनेट पर वे सभी बंपर दृश्यता के कारण खूब कमाई कर रहे हैं, जिनकी पत्रकारिता टीवी एंकरों के द्वारा परोसी गई खबरों के मजाक उड़ाने पर ही टिकी हुई है। इधर एंकर खबर सुनाते हैं, दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर उनकी खबर ‘कामेडी सर्कस’ बन जाती है। क्या यह सब अचानक से हुआ है कि आम लोगों में स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए जागरूकता आ गई है?
वैश्विक मंच से मिले बिल्ला नंबर-157 को नकारते हुए हर टीवी एंकर खुद को, और खुद के चैनल को स्वयंभू नंबर एक बताने में मशगूल रहा। लेकिन इनके स्वयंभू भोंपू के बाद भी आम लोगों तक यह बात पहुंच ही गई। शुरुआत किसान आंदोलन से हुई थी, जब खास मीडिया संस्थानों के पत्रकारों को आंदोलन-स्थल में प्रवेश की इजाजत नहीं दी गई थी। जब किसान अपने अधिकारों के लिए शहीद हो रहे थे तो सत्ता से ज्यादा जोर से मीडिया आंदोलनरत किसानों को आतंकवादी घोषित कर रहा था। लोगों को बात समझ में आ गई कि यह मीडिया जनता के खिलाफ है। जज साहब ने तो बाद में टिप्पणी की, लेकिन मीडिया देश के आम लोगों से काकरोच की तरह ही बर्ताव करने लगा और जनता की मुखालफत में अपना मुनाफा खोजता रहा।
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बारी आई छात्र-आंदोलन की। आज के संदर्भ में यह जेन-जी है। इस पीढ़ी ने अपने हाथ के मोबाइल से ही ज्ञान प्राप्त कर लिया कि रोटी और रोजगार किसी एप भंडार से डाउनलोड नहीं होते हैं। उनके कानों ने एंकरों की जुबान से निकल रहे जहर की पहचान कर ली कि यह हमारे खिलाफ है। जंतर मंतर पर तो बाद में शुरू हुआ, इन एंकरों के खिलाफ घर-घर, और मोबाइल-मोबाइल मुखालफत पहले ही शुरू हो चुकी थी।
न्यूज चैनलों का विकल्प बने वे लोग, जो गोदी मीडिया के कारण अनाथ हो चुके थे, उनके पास कोई बड़ा संस्थान नहीं था। था तो बस फोन, इंंटरनेट और सच बताने का हौसला। युवाओं ने बहुत पहले ही सरकारी गदाधारी बने एंकरों की पोल खोल शुरू कर दी थी। लेकिन इन एंकरों को लगा कि हम तो सत्ता की गोद में सुरक्षित हैं, हमारा ये शक्तिहीन युवा क्या बिगाड़ेंगे। हम इन पर जो भी बिल्ला लगा दें, वही चस्पां हो जाएगा।
सत्ता की गोदी में सुरक्षित बैठे इन जहरीले एंकरों की करनी की भरनी मिली उन पत्रकारों को जो स्टूडियो में बैठे इन सज्जित चेहरों के लिए खबर जुटाते हैं। एंकर इन खबरों में अपने एजंडे का जहर मिलाते हैं। विद्यार्थियों और युवाओं का गुस्सा इन पर इतना उतरा कि कहीं-कहीं दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति बन गई।
जिन एंकरों के कारण जमीनी पत्रकारों की यह स्थिति हुई है, अब वे ही अपनी साख बचाने के लिए हुंकार भर रहे हैं-मैं पत्रकार हूं…। अफसोस यह है कि अब आपको कोई पत्रकार मानने के लिए तैयार नहीं है। आपको युवा सादी वर्दी वाली सत्ता की वैसी ही पुलिस के रूप मेंदेख रहे हैं जो बच्चियों तक की बेरहमी से पिटाई कर रही थी। आपके पत्रकारों के माइक पर चैनल का जो भी निशान बना हो, युवा वर्ग बस एक ही इबारत पढ़ रहा है, बिल्ला नंबर-157।
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टीवी मीडिया के शुरुआती दौर में एंकरों को ‘लक्षित चेहरा’ माना गया था। यानी हर चैनल ने एक-दो ऐसे चेहरे तैयार किए, जिनके जरिए चैनल तक दर्शक की पहुंच हो। चैनल की पहचान बने। लेकिन कुछ ही समय में ये चेहरे सत्ता के प्रवक्ता बन गए। ये चेहरे जनता और उससे जुड़े मुद्दों के खिलाफ बोलने के प्रतीक बन गए। इन्हें हर आंदोलनकारी देशद्रोही लगता है, जनता के पक्ष में बोलने वाला पाकिस्तानी लगता है। अब इन लक्षित चेहरों को खारिज करना युवाओं का लक्ष्य बन गया है।
युवाओं के भविष्य के लिए कई युवा भूख हड़ताल पर बैठ गए। भूख हड़ताल पर बैठे आंदोलनकारियों का शरीर जैसे-जैसे कमजोर होता गया वैसे-वैसे देश भर के युवाओं की ऊर्जा बढ़ती गई। इन युवाओं के शरीर पर धूप, गर्मी, उमस, पुलिस के डंडे किसी का भी असर नहीं हो रहा है।
न तो सत्ता को यकीन हो रहा था और न विपक्ष को कि बिना किसी सांगठनिक अगुआई के दिल्ली में देश कैसे उमड़ पड़ा। कहां से आई इन युवाओं में इतनी चेतना। इनके पीछे तो कोई राजनीतिक दल नहीं था। मुंबई-बंगलुरू से लोग इनके लिए आनलाइन खाना भिजवा रहे थे। युवाओं के आंदोलन की ‘फंडिंग’ अभिभावकों ने कर डाली। एंकर विश्वास नहीं कर पा रहे हैं कि जंतर मंतर पर बैठे भूखे शरीरों ने सत्ता की गोदी में बैठी हुई उनकी सत्ता हिला दी है।
इन एंकरों ने भूख की रिपोर्टिंग दिखानी बंद कर दी थी। रोजी-रोटी की बात करने वाला हर नागरिक इनके चैनल पर पाकिस्तानी करार दिया जाता है। जिस जेन-जी पर आरोप लगाया जा रहा था कि उन्हें रोटी की कद्र नहीं है, वह उस रोटी की बात करने के लिए एकजुट हो गई जो जंतर मंतर पर बैठे प्रदर्शनकारियों ने नहीं खाई थी। एंकरों ने इस देश की सामूहिक चेतना के जिस तरह से टुकड़े-टुकड़े कर दिए थे, भूख ने उसे फिर से जोड़ दिया है। यह लोकतंत्र की खासियत है कि भूख उसे जोड़ती है। अघोषित चौथे खंभे को उसकी जिम्मेदारी याद दिलाने का यह अध्याय इतिहास का हिस्सा होगा, जहां आवाज गूंजती रहेगी – नमस्कार, हम जेन जी जंतर मंतर से।
