बिहार की राजधानी पटना की बांकीपुर विधान सभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में राजनीतिक विश्लेषकों ने अनंत सम्भावनाएँ देखी हैं। भाजपा इस सीट पर पिछले 30 साल से अपराजेय थी। जो पार्टी आठ महीने पहले हुए विधान सभा चुनाव में राज्य में एक सीट भी नहीं जीत पायी, उसके कर्णधार प्रशांत किशोर ने इस सीट से भाजपा और राजद उम्मीदवार को हराकर सबको चौंका दिया।
प्रशांत किशोर राष्ट्रीय मीडिया में अच्छी दखल रखते हैं। बिहार चुनाव के दौरान नेशनल कहे जाने वाले मीडिया ने उन्हें उतनी ही तवज्जो दी, जितनी सीएम नीतीश कुमार को मिली होगी या पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव को। प्रशांत किशोर ने कई बार पत्रकारों को लगभग डाँट दिया है मगर मीडिया उनसे प्यार करना बन्द नहीं कर रहा है। बांकीपुर की जीत ने मीडिया के इस प्यार को चुनावी जीत का आधार दे दिया क्योंकि उसके पहले प्रशांत किशोर के पास केवल दावा ही दावा था।
चूँकि बांकीपुर सीट पर भाजपा का वर्चस्व था इसलिए प्रशांत किशोर द्वारा जीत हासिल करना पार्टी के लिए खतरे की तरह देखा जाना स्वाभाविक है। मगर हैरत इस बात पर हुई कि भाजपा के कुछ स्पिन डॉक्टर यह जताने लगे कि बांकीपुर में प्रशांत किशोर की जीत राजद के लिए बड़ा झटका है! इस उलटबांसी को प्रचारित करने वालों में भाजपा के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय भी शामिल हैं।
लेकिन क्या सचमुच ही जन सुराज और प्रशांत किशोर राजद और तेजस्वी यादव के लिए बड़ी चुनौती बनकर उभर सकते हैं? इस सवाल पर आने से पहले यह विचार कर लेते हैं कि बांकीपुर में भाजपा की हार क्या राजद की नाकामी है? जिस सीट पर राजद लगातार हारती रही है और वहाँ का सामाजिक समीकरण पार्टी के जनाधार के प्रतिकूल है, वहाँ राजद ने खुद को अंडरप्ले करके भाजपा के हारने का रास्ता सुगम कर दिया तो यह सफल राजनीति है न कि किसी तरह की विफलता। जरूरी नहीं है कि तेजस्वी ने जानबूझकर ऐसा किया हो, मगर इससे उन्हें परोक्ष रूप से फायदा ही हुआ है।
अपने ताजा इंटरव्यू में प्रशांत किशोर ने कहा है कि भाजपा सम्राट चौधरी के कारण बांकीपुर सीट से हारी है! चुनाव से पहले भी प्रशांत किशोर ने नीतीश कुमार की जगह सम्राट चौधरी को सीएम बनाए जाने के मुद्दा बनाया था। भाजपा के किसी नेता ने ऐसा नहीं कहा मगर प्रशांत किशोर और जन सुराज ने प्रचार किया कि भाजपा नेता कहते हैं कि बांकीपुर से कुत्ता-बिल्ली को भी टिकट देंगे तो जीत जाएगा! प्रशांत किशोर ने कुत्ता-बिल्ली वाला पैंतरा खेलकर बांकीपुर के भाजपा वोटरों के ईगो को ठेस पहुँचायी ताकि वो भाजपा को सबक सिखाने के लिए वोट दें। आखिरकार ऐसा ही हुआ।
भाजपा के बड़े नेताओं के बूथ पर भी प्रशांत किशोर ने जीत हासिल करके दिखा दिया कि उनकी रणनीति सफल रही। मतदान से पहले राजद समर्थकों के बीच यह सन्देश जा चुका था कि मुख्य मुकाबला प्रशांत किशोर और नीरज सिन्हा के बीच है। शायद इसी वजह से राजद के कुछ समर्थकों ने किशोर को वोट दिया क्योंकि उनका अव्वल मकसद भाजपा को हराना रहा होगा। उनके द्वारा किशोर को वोट देना उतना चौंकाना वाला नहीं है, जितना 30 साल के लॉयल वोटरों का भाजपा से दूरी बनाना है।
बांकीपुर में हार को राजद के लिए झटका बताने वालों को इस पर विचार करना चाहिए कि राजद के जो वोटर नीतीश कुमार जैसे नेता, जिनके खिलाफ प्रशांत किशोर भी नहीं बोलते, के सामने होने के बावजूद लगातार लालू यादव की पार्टी को वोट देते रहे हैं, वही वोटर अचानक से प्रशांत किशोर में नया तारणहार क्यों देखेंगे?
अगर बिहार की जनता को किशोर की ‘जादू की झप्पी’ पर यकीन होता तो महज आठ महीने पहले हुए चुनाव में उनकी पार्टी को जीरो सीटें नहीं मिलतीं। बांकीपुर की जनता ने प्रशांत किशोर को वोट दिया है, इससे यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि समूचे बिहार की जनता को जन सुराज पर यकीन हो गया है। देश में कई ऐसी वीआईपी सीटें रही हैं जहाँ से चर्चित नेता चुनाव जीतते रहे हैं और उनकी पार्टी वहाँ हारती रही है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण हैं, यूपी के अमेठी और रायबरेली। यूपी में कांग्रेस की हालत छिपी नहीं है मगर इन दो लोक सभा सीटों पर नेहरू परिवार का दबदबा निर्विवाद है। अमेठी और रायबरेली की जनता को इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता कि राज्य या केंद्र में किसकी सरकार बननी है। ऐसे कई अन्य उदाहरण हैं, जिन्हें इस सन्दर्भ में याद किया जा सकता है।
प्रशांत किशोर ने सम्राट चौधरी की शिक्षा को भी बड़ा मुद्दा बनाया। हो सकता है कि भाजपा के कोर वोटरों में एक वर्ग इस मुद्दे पर किशोर से सहमत हो मगर राजद का वोटर सीएम की शिक्षा को लेकर नाराज होंगे, ऐसा नहीं लगता है। जब लालू यादव ने अनपढ़ राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाया, तब भी राजद का कोर वोटर उसके साथ था। जब लालू यादव ने अपने नौवीं तक पढ़े बेटे तेजस्वी यादव को डिप्टी सीएम बनाया, उसके बाद भी राजद के कोर वोटरों ने पार्टी से किनारा नहीं किया। यानी प्रशांत किशोर का शिक्षित सीएम वाला दाँव भले ही भाजपा खेमे में एक वर्ग को घायल कर रहा है मगर गैर-भाजपा खेमे में उनका यह दाँव ज्यादा मायने नहीं रखता।
भाजपा के पुराने वोटरों के बीच पार्टी को सबक सिखाने की जिस भावना को प्रशांत किशोर ने कुरेदा उसका एक आधार बिहार में सीएम के चयन का तरीका भी रहा है। बात केवल बिहार की नहीं है, बल्कि कई अन्य राज्यों में भाजपा के कोर वोटर माने जाने वाले वर्ग में सीएम बनाए गए चेहरों को लेकर गहरी नाराजगी दिखती है।
भाजपा के कुछ कोर वोटर यह मानने लगे हैं कि आलाकमान किसी भी ईर-बीर-फत्ते को पर्ची से सीएम बनाकर उसके ऊपर बैठाने लगी है। जाहिर है कि हर आलाकमान की तरह भाजपा आलाकमान भी अपने फैसले को लेकर पूरी तरह आश्वस्त है मगर भाजपा शासित कई प्रदेशों में यह भाजपा-समर्थक जनता के बीच नाराजगी की बड़ी वजह है।
सीएम ही नहीं उम्मीदवार के चयन को लेकर भी भाजपा समर्थकों के बीच यह भावना घर करती जा रही है। जिसका नतीजा ये हो रहा है कि उसके समर्थक वोट देने के लिए घर से निकलने में कोताही करने लगे हैं। लोक सभा चुनाव में भी इस भावना का असर दिखा था। यूपी में पार्टी की दुर्गति का बड़ा कारण उम्मीदवारों का चयन था और उसकी आँच पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी तक पहुँची जहाँ उनके समर्थक कई जगहों पर वोट देने के लिए नहीं निकले। बांकीपुर में भी ऐसा ही हुआ।
बांकीपुर में हार को राजद के लिए झटका बताने वाले यह भी भूल गये कि प्रशांत किशोर जब कांग्रेस के रणनीतिकार थे, तब यह संकेत मिला था कि वह कांग्रेस के पुराने जनाधार (जनरल हिन्दू, मुस्लिम और एससी) को एकजुट करके यूपी में पार्टी को खड़ा करना चाहते हैं।
बिहार विधान सभा चुनाव के दौरान प्रशांत किशोर ने जिस तरह मुसलमानों के प्रतिनिधित्व का सवाल उठाया और जिस तरह वह चिराग पासवान के लिए हमेशा मीठे बोल बोलते हैं, उससे भी संकेत मिलता है कि वह मुस्लिम और दलित को रणनीतिक नजरिए से देखते हैं। रही बात जनरल हिन्दू की तो राज्य में करीब 40 साल बाद उनके बीच से कोई सीएम पद का दावेदार होगा तो वह किस तरफ जाएगा, यह भाजपा के चुनावी चाणक्यों के लिए विचार करने की बात है।
बिहार के जिन वोटरों ने करीब दो दशकों तक लगातार नीतीश कुमार के नाम पर वोट दिया है, वे न राजद के वोटर हैं और न भाजपा के। उन्हें राजद और भाजपा से ज्यादा नीतीश के चेहरे पर भरोसा रहा है। ऐसे वोटरों के सामने भी सम्राट चौधरी और तेजस्वी यादव के बरक्स प्रशांत किशोर उन्नीस पड़ेंगे या बीस यह भाजपा के लिए विचार का विषय है। ऐसे वोटर अगर किशोर की तरफ झुकते हैं तो तेजस्वी को उनका कोर वोटर बचा सकता है क्योंकि उसकी संख्या भारी है मगर भाजपा को जनाधार में सम्राट चौधरी की कितनी निजी हिस्सेदारी है, यह दुनिया जानती है।
भाजपा के लिए बिहार में एक और खतरा है, वह है नये सपने का अभाव। भाजपा भूल गयी है कि मोदी जी देश को अच्छे दिन का सपना दिखाकर सत्ता में आए थे। बीते 12 सालों में जनता ने देख लिया है कि कौन से सपने पूरे हो सकते हैं और कौन से नहीं। जो सपने पूरे नहीं हुए उनके लिए जनता किसी नए नेता पर भरोसा कर ले तो उसका दोष नहीं। प्रशांत किशोर बिहार को नया सपना दिखा रहे हैं। भाजपा खुद इस प्रवृत्ति की लाभार्थी रह चुकी है, जब देश के एक बड़े वर्ग ने इस नारे पर यकीन किया था कि ‘सबको देखा बारी-बारी, अबकी बारी अटल बिहारी’! बिहार की जो जनता तेजस्वी को सीएम नहीं देखना चाहती और उसे नीतीश के रीप्लेसमेंट के रूप में सम्राट भी नहीं पसन्द हैं, वह एक बार किशोर को मौका देने की तरफ बढ़ी तो यह भाजपा के लिए बड़ा झटका होगा क्योंकि तेजस्वी तो आज भी विपक्ष में ही हैं।
राजनीतिक पण्डितों का काम है संभावनाएँ टटोलना। ऊपर जो कुछ लिखा है, वह सब संभावना ही है। किसी को नहीं पता कि पाँच साल बाद किसी प्रदेश की जनता किस मुद्दे पर किस नेता को वोट देगी। मगर कम से कम मुझे इस बात में कोई दो राय नहीं दिखती है कि प्रशांत किशोर बिहार में भाजपा के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं, राजद के लिए नहीं।
आज इतना ही। शेष, फिर कभी।
