कहते हैं कि जिनकी वाणी में प्रेम नहीं, आदर भाव नहीं, सम्मान नहीं, मधुरता नहीं, वह मानो बोझा उठाकर घूमते हैं। सच यह है कि बोलचाल और बातचीत के दौरान कहे गए शब्दों में बड़ा दम होता है। बोलते हुए वाणी और वचनों में जितनी मधुरता होगी, उतना ही ज्यादा सुनने वालों के दिल की गहराई में उतरना संभव हो पाता है। जबकि कटु या कठोर शब्द कहने वाले लोग सुनने वालों के दिलों में बसने के बजाय दिलों से निकल जाते हैं।

हालांकि विचारक पीटर ड्रकर का कहना है कि संवाद में बोलने से महत्त्वपूर्ण सुनना होता है। इसका कारण यही है कि दूसरों की बात सुनकर ही अपनी बात बेहतर और प्रभावशाली ढंग से कही जा सकती है। उदाहरण के तौर पर मिसरी अल्फाज रद्दी ही होंगे, अगर श्रोता या सामने वाला उन बातों को समझ नहीं पाता है।

शब्दों की गहराइयों के साथ ही भावनाओं में भी गहराई आती है। जब कोई कंठ से बोलता है, तो दूसरे के कान से गहरा कभी नहीं जाता। उधर जब कोई हृदय से बोलता है, तो सामने वाले के हृदय तक चला जाता है। कर्णप्रिय गीत-संगीत का ऐसा जादुई प्रभाव अमूमन हर सुनने वाला अनुभव करता ही है। सभी विचारकों ने शब्दों के सहारे जीवन के तीन सरल सूत्रों का जिक्र किया है- ‘सदा धीमे बोलो, कम बोलो और मीठा बोलो।’ यही मंत्र क्रोध और कटुता से बचाव की शक्तिशाली दीवार बन कर उभरता है।

जैसे हर मां अपने नवजात शिशु को दुलार से पुचकारती है और नींद न आए, तो लोरी सुना कर सुलाती है। गुरु नानक देव ने भी जो कुछ भी कहा या बोला, उसके लिए पद्य का सहारा लिया। उनकी वाणी का मार्ग माधुर्य और कोमलता से भरा था, अमृत रस से भरा था। दूसरे शब्दों में, उनका परम बोध और ईश्वरत्व का मार्ग गीतों और फूलों से भरा था। सुनने की तल्लीनता और बीच में न बोल पड़ना चित्त की शांति दर्शाता है। जब-जब चित्त शांत होता है, मन-मस्तिष्क में स्थिरता आ जाती है। और कई बार प्रतिक्रिया भी इसी मिठास से संचालित होती है।

एक फेरी वाला गुस्सैल स्वभाव से भरा और गालीबाज था। उसके मधुर भाषी फेरी वाले पड़ोसी ने गुड़ बेचकर अच्छा-खासा कमा लिया और अपनी दुकान खोल ली। एक दिन वह अपनी पत्नी से बोला, ‘मैं भी कल से शहद नहीं, गुड़ बेचूंगा। मेरा शहद तो बिकता नहीं है।’ पत्नी ने समझाया कि शहद और गुड़ का धंधा बाद में करना, पहले शहद और गुड़ जैसा बोलना सीखो। अपनी आदत से मजबूर उसने पत्नी को डांटा-फटकारा और सिर पर गुड़ के टुकड़ों से भरा टोकरा उठा कर निकल पड़ा बेचने।

एक दिन वह सुबह-सवेरे ही निकल गया, ताकि ज्यादा बिकने की गुंजाइश रहे, लेकिन बेचने के लिए आवाज लगाते उसके स्वर में गुस्सा भरा था। गुस्सैल आवाज में लोगों को पुकारता वह गली-गली, मुहल्ले-मुहल्ले घूमता रहता, लेकिन उसकी कर्कश वाणी के कारण कोई उससे गुड़ लेने को तैयार नहीं होता। कोई भूला-भटका उसका टोकरा उतरवाता और चखता, तो मुंह फेर लेता। बिना बोहनी किए यानी बिना गुड़ बेचे वह देर शाम थका-हारा घर लौट आया।

पत्नी से चिड़चिड़ेपन में कहने लगा कि ‘ग्राहक नालायक हैं, बेवकूफ हैं… मटका उतरवाते हैं, चखते हैं, मगर खरीदते नहीं।’ पत्नी ने फिर समझाया, ‘आप कब समझेंगे कि जो लोग खुशमिजाज होते हैं, प्रसन्नता और मधुरता से बोलते हैं, उनकी मिर्च भी बिक जाती है, लेकिन कटुभाषियों से लोग शहद, गुड़ या मिसरी भी नहीं खरीदते।’

दरअसल, शब्दों में मिठास से भावनाओं, रिश्तों और संस्कारों में भी बेहतरी होने लगती है। कबीर भी नसीहत देते हैं कि ‘ऐसी बानी बोलिए मन का आपा खोय/ औरन को शीतल करे आपहु शीतल होय।’ तात्पर्य यह है कि गुस्से में भी ऐसी मधुर वाणी का साथ नहीं छोड़ना चाहिए, ताकि कहने वाले का मिजाज शीतल रहे और सुनने वाला भी पुलकित हो जाए।

ओशो के विचार में, भीतरी सौंदर्य को पाने का एक ही मंत्र है कि मीठा बोलो और मिठास घोलो। किसी को कुछ कहना हो, तो चीखने-चिल्लाने और अपशब्दों का प्रयोग करने से समय बर्बाद होता है, लोग समाधान की राह से दूर जाते हैं। इतना तय है कि क्रोध का बुलबुला संभलते ही सारे बिगड़ते काम संवरने लगते हैं।

कई बार कुछ कहने की जल्दबाजी से पहले, शांत रह कर, स्वयं को सुनने भर से मीठा बोलने का रास्ता प्रशस्त होने लगता है। कटु वचन हमारे आंतरिक शत्रु क्रोध से कम नहीं होते। क्षण भर के क्रोध के वेग में अपशब्द निकल जाते हैं। इसीलिए बलवान असल में पहलवान नहीं होता, बल्कि असली पहलवान वह है, जो क्रोध में खुद को नियंत्रित रख सके।

यह समझने की जरूरत है कि बात-बेबात पर गुस्सा, फिर गाली-गलौज, दरअसल सही समझ के दुश्मन हैं। क्रोधित होना बेशक मानव स्वभाव है, लेकिन यह बुरा तब है, जब इंसान अपना आपा खो देता है और बेलगाम प्रतिक्रिया करने लगता है। वास्तव में, जिसके भीतर विवेकशीलता होगी, वह कोई कटु वचन कह ही नहीं सकता।

इसलिए मधुर शब्दों की ताकत को हरगिज कम नहीं आंकना चाहिए। इनकी कितनी अहमियत होती है, यह हर गुरु-शिक्षक साफतौर पर समझाते रहे हैं। ऐसे वचन अक्सर सुनने को मिल जाते हैं कि ‘सफलता के लिए बोली में मिठास का महत्त्व निश्चित रूप से व्यापक है।’ इंसानी रिश्तों को मजबूत बनाने या बिगाड़ने में शब्द और बोली पहली सीढ़ी बनते हैं और सदा उत्साहित रहते हैं। कह सकते हैं कि लफ्जों और लहजे की ताकत से हर इंसान अपेक्षाकृत कम समय में शर्तिया ऊंची उड़ान भरता है।