इस सृष्टि में प्राणधारी से लेकर प्राणहीन तक और प्रकृति प्रदत्त से लेकर मानव निर्मित तक जितनी भी संरचनाएं या उपादान विद्यमान हैं, सभी सुंदर और असुंदर, दो श्रेणियों में वर्गीकृत हैं। कोई भी चीज या तो सुंदर है या फिर असुंदर। इन दोनों के बीच या इनके अतिरिक्त कोई तीसरी श्रेणी निर्धारित नहीं है। यों सुंदरता को परिभाषित कर पाना अपने आप में बहुत पेचीदा मामला है। दरअसल, सुंदरता को नापने का कोई सार्वभौम, सार्वकालिक और सार्वजनिक पैमाना नहीं है।
कहा गया है कि सुंदरता दृश्य में नहीं, बल्कि देखने वाले की दृष्टि में होती है। एक ही वस्तु, एक ही कृति या एक ही रूप किसी एक के लिए सुंदर हो सकती है और किसी दूसरे के लिए असुंदर। किसी को वह आकर्षित कर सकती है, तो किसी को विकर्षित। इसके अतिरिक्त, सुंदरता काफी हद तक देशकाल, अवसर और परिस्थिति पर भी निर्भर करती है। यह देखने वाले की सोच और नजरिए पर भी निर्भर करती है। इन सबके बावजूद यह कहा जा सकता है कि सुंदर और असुंदर की आम स्वीकृति के मामले में विरोधाभास की गुंजाइश बहुत कम है।
यह भी है कि सुंदर और असुंदर के मध्य भेद करने की प्रवृत्ति सिर्फ मनुष्य के पास ही है। अन्य प्रजातियों के लिए सब कुछ एक-सा, यानी सब धान बाईस पसेरी है। हालांकि पशुओं और पक्षियों के अंदर भय, क्रोध, हिंसा, ममता, भूख, प्यास, नींद, स्व रक्षा आदि भावनाएं होती हैं, लेकिन सुंदर और असुंदर की समझ उनमें नहीं होती है। सच यह कि उन्हें सुंदर-असुंदर से कोई लेना-देना भी नहीं होता है। उन्हें तो बस अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति भर से मतलब होता है। समस्त प्राणधारियों में होमो सेपियंस, यानी मानव ही एकमात्र ऐसी प्रजाति है, जिसके नर और मादा, दोनों ही अपने जीवन के हर क्षेत्र में सुंदरता के आग्रही होते हैं। ऐसा शायद इसलिए है कि उनके अंदर एक विकसित मस्तिष्क होता है और उस मस्तिष्क में सोचने-समझने और विश्लेषण करने की क्षमता होती है।
मानव स्वभावत: सुंदरता का पक्षधर है। लगभग सभी लोग सुंदरता के आग्रही होते हैं। कोई भी ऐसा नहीं, जो असुंदरता को स्वेच्छा से स्वीकार करे, लेकिन सच्चाई यह है कि सुंदरता की पहचान, पूछ और प्रशंसा असुंदरता की वजह से ही है। किसी भी गुण, भाव, बोध या दृश्य का मूल्यांकन सदैव सापेक्षता के आधार पर होता है। अच्छाई का अस्तित्व तभी तक है, जब तक उसके समांतर बुराई भी है। मिठाई का आकर्षण तभी तक है, जब तक उसके बरक्स तीखापन विद्यमान है। उजाले का महत्त्व अंधियारे के कारण है। ठीक इसी प्रकार असुंदरता ही वह अस्तित्व है, जो हमें सुंदरता का बोध कराता है, उसका महत्त्व स्थापित करता है और हमारी चेतना में सुंदरता के प्रति आकर्षण पैदा करता है।
हम सभी अपने जीवन में सब कुछ सुंदर ही चाहते हैं। जीवनपर्यंत सुंदरता पाने की ललक में भागते रहते हैं। उसे सहेजने की कोशिश में हलकान रहते हैं, लेकिन क्या हम वैसा करने में सफल हो पाते हैं? इसका उत्तर है- नहीं। लाख कोशिशों के बावजूद आखिर हमें असफलता ही हाथ लगती है। सुंदरता साथ छोड़ सकती है, लेकिन असुंदरता नहीं।
सुंदरता के आकर्षण में पागल बने हम यह ध्रुव सत्य भूल जाते हैं कि असुंदरता की व्याप्ति सुंदरता के मुकाबले बहुत अधिक है। सुंदरता की अंतिम परिणति असुंदरता में ही होती है। सुंदरता अल्पकालिक होती है, जबकि असुंदरता दीर्घजीवी। सुंदरता गतिशील होती है, लेकिन असुंदरता स्थावर। इसके अतिरिक्त सुंदरता की सीमा होती है, यानी कोई चीज कम सुंदर होगी, कोई चीज अधिक सुंदर होगी और कोई उससे भी अधिक सुंदर, लेकिन जो असुंदर है, वह सदैव एक-सा बना रहता है।
प्रकृति का नियम है कि हर सुंदर को एक निश्चित अवधि के बाद असुंदर हो जाना होता है। प्रात:काल डाल पर खिला, झूमता, हर मन को रिझाता सुंदर फूल शाम होते-होते कुम्हलाने लगता है। यौवन काल में अपने रूप के लावण्य का स्वामी रहा कोई व्यक्ति- स्त्री या पुरुष प्रौढ़ होने की तरफ बढ़ने के साथ ही अपना सामान्य सौंदर्य खोने लगता है। वृद्धावस्था आने तक सारा सलोनापन उड़न-छू हो जाता है और असुंदरता उसमें घर बना कर ठहर जाती है।
इसी प्रकार, राह चलते लोगों की धड़कन बढ़ाने वाले सुंदर, सुकांत छबीले युवक आयु के तीसरे दशक तक आते-आते अपने सौष्ठव का आकर्षण खो बैठते हैं। कृत्रिम तरीकों का सहारा लेकर कोई लाख यत्न करे, लेकिन सुंदरता टिकती नहीं है। आखिरकार वही असुंदरता आखिर अपना कब्जा जमा लेती है, जिसे हमने अपने आग्रहों के कारण असुंदर घोषित किया था।
इतिहास साक्षी है कि सुंदरता आदिकाल से ही मानव समाज में अशांति और उपद्रव का कारण बनती रही है। पौराणिक काल से लेकर वर्तमान तक, जितने भी युद्ध, संधि और खून-खराबे हुए हैं, सब सुंदरता पर अधिकार के लिए भी हुए हैं। इसके पीछे न जाने कितनी जानें चली गईं और न जाने कितनी सत्ताएं मिट गर्इं। इतिहास में वर्णित कहानियां इसकी पुष्टि करती हैं। बावजूद इसके मनुष्य है कि इतिहास से सबक लेने को तैयार नहीं है। वह सुंदरता का मोह त्याग नहीं पाता है।
दरअसल, दिन और रात, धूप और छांव तथा सुख और दुख की ही तरह सुंदर और असुंदर भी एक ही सिक्के के दो पहलू की तरह हैं। इनकी गति को रोक सकना और इनके प्रभाव से बच सकना नितांत असंभव है। कुदरत का अपना नियम है और अपने नियम में वह रंचमात्र भी हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करती है। आज जो सुंदर है, कल उसे असुंदर होना ही है। इसलिए श्रेयस्कर यही है कि हम सुंदर और असुंदर को समभाव से लें।
