मानव जीवन के यात्रा पथ के विभिन्न पड़ावों का सबसे महत्त्वपूर्ण विषय यह है कि व्यक्ति का वास्तविक लक्ष्य क्या है। यह लक्ष्य वही होगा, जैसा व्यक्ति अपनी चिंतनधारा से उसे आकार देगा। जैसे दुखी व्यक्ति का लक्ष्य है प्रसन्न होना या भूखे व्यक्ति का लक्ष्य है भोजन ग्रहण करना, उसी प्रकार सकारात्मक भविष्य प्रबंधन के लिए लक्ष्यों के अनेक आयाम हैं।

बचपन के बाद किशोरावस्था और फिर युवावस्था में प्रवेश करते ही आमतौर पर यह तय करने की पारिवारिक जिम्मेदारी होती है कि उसे किस क्षेत्र में कदम रखना है। अगर घर की परंपरा या विरासत में कृषि कार्य या व्यवसाय का संचालन हो रहा है, तो कई बार युवा अपने अभिभावकों की इच्छा का सम्मान करते हुए अपनी सहमति देते हैं।

आज के दौर में हो रहे परिवेशीय परिवर्तन और एकल परिवार के गठन ने विशेषकर युवा पीढ़ी के समक्ष भविष्य निर्माण की गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। शिक्षा ग्रहण करने के अनेक क्षेत्रों की उपलब्धता से युवा वर्ग को इसमें चयन के कई विकल्प दिखाई देते हैं। ग्रामीण परिवेश की स्थितियों में अब कृषि भूमि और व्यावसायिक हिस्सों में विभाजन की स्थिति ने युवाओं के भीतर यह चिंतनभूमि तैयार कर दी है कि रोजी-रोजगार के लिए उन्हें शिक्षा के द्वार तलाशने होंगे।

इस क्रम में आज की युवा पीढ़ी को लक्ष्य का चयन सोच-समझकर करने की जरूरत है, जो उसकी गहन अभिरुचि, योग्यता और मूल्यों से समन्वय स्थापित करता हो। केवल अर्थोपार्जन या प्रसिद्धि पाना लक्ष्य नहीं, बल्कि ऐसे कार्य का चुनाव हो, जिससे आत्म-संतुष्टि मिले और परिवार, समाज की अपेक्षाओं पर खरा उतरते हुए भावी पीढ़ी के लिए प्रेरणा-अंश भी बने। अनुभवी और सफल लोगों की मान्यता है कि लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए समयबद्ध योजना, कठिन परिश्रम और धैर्य भी आवश्यक है।

रास्ते में असफलताएं, बाधाएं और चुनौतियां आएंगी, पर लक्ष्य दृढ़ होगा तो हम थोड़ा थक-हार कर भी फिर से उठ खड़े होंगे और लक्ष्य प्राप्ति के लिए गतिशील हो जाएंगे। लक्ष्यहीन लोग समय की गति के साथ बह जाते हैं, जबकि लक्ष्य के साथ वे प्रतिकूल परिस्थितियों को अपनी मुट्ठी में कैद कर आगे बढ़ने में सफल हो जाते हैं।

जो युवा अपने जीवन का एक श्रेष्ठ लक्ष्य निर्धारित कर कठिनाइयों के बावजूद आगे बढ़ते हैं, वे ही लक्ष्य का दीपक प्रज्ज्वलित कर अपने जीवन से अंधकार की छाया को भी दूर भगा पाते हैं। उत्साही मन अपने प्रथम लक्ष्य बिंदु को स्पर्श करने में ज्यों ही सफल होता है, उसके समक्ष सृजन के दूसरे लक्ष्य के सपने भी तैरने लगते हैं। आए दिन कई दृष्टांत देखे गए हैं कि एक प्रतियोगी जब लक्ष्य का प्रथम सोपान प्राप्त कर लेता है, तो उसकी ज्ञान-ऊर्जा उच्चतर लक्ष्य के लिए भी उसे प्रेरित करती है।

लक्ष्यजनित सफलता के सूर्योदय में अनेक ऐसे भी संयोग सूत्र आते हैं, जब व्यक्ति आधे रास्ते में थककर वापस लौटना चाहता है। उसकी हिम्मत और धैर्य की तरंग उसे ऐसे पड़ाव पर खड़ा कर देती है, जहां कोई उसका हितैषी या मार्गदर्शक दिखाई नहीं देता। इस संक्रमण काल में निराश व्यक्ति के अंदर भंडारित ऊर्जा और विवेक ही है, जो उसे जागृत कर सकता है।

प्रश्न है कि इसे किस स्रोत से जागृत कराया जाए। इस स्थिति में मनोवैज्ञानिक अनुभव यही कहता है कि लक्ष्य बिंदु से बुझ चुके व्यक्ति को कुछ दिनों के लिए रोचक या मनोरंजक गतिविधियों से संबद्ध किया जाए, ताकि वह मानसिक दबाव से मुक्त होकर राहत की अनुभूति के आंगन में आ जाए। जब व्यक्ति अपने को तरोताजा महसूस करने लगे, तो उसे उस विरत हुए बिंदु पर फिर लाकर आगे की लक्ष्य यात्रा के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। उसे यह बताने की जरूरत है कि रुक जाना, थक जाना या हार मानकर गंतव्य से वापसी करना उसके भविष्य के लिए अनुकूल नहीं है।

एक सबसे प्रभावी क्रिया यह भी है कि उससे राय ली जाए कि द्वंद्व के पड़ाव पर उसकी अनुभूति कैसी रही और अब जब वह उस द्वंद्व से स्वतंत्र होकर बिल्कुल तरोताजा है, तो आगे उसकी क्या योजना है। स्वचिंतन के पल में निश्चित ही वह व्यक्ति अतीत के नैराश्य-बंधन से आजाद होकर अपने भविष्य को फलदायी बनाने का संकल्प दोहराएगा। कभी-कभी हताश युवा समुचित मार्गदर्शन के अभाव में भाग्यवादी होकर कुछ निराश साथियों की संगति में भी लक्ष्य मार्ग से भटकते हुए यथास्थिति का पालक बन जाता है।

मानसिक रूप से सबसे तरल और सरल हमारी युवा पीढ़ी के भविष्य निर्माण के अनेक प्रकल्प हैं, जिन्हें अपनी प्रतिभा और सामर्थ्य के अनुसार ही चयन करने की आवश्यकता है। अपनी कार्यक्षमता और योग्यता से अधिक भार वहन करने पर युवा लक्ष्य से फिसलन की ओर आ जाते हैं। अधिकांश मामलों में युवाओं की महत्त्वाकांक्षा इतनी भारी हो रही है, जिसे वे अपनी क्षमता के विपरीत मानते हैं। कभी-कभी अभिभावकों की बच्चों से अधिक उम्मीद की स्थिति खतरनाक साबित होती है।

कई शोधों में यह सामने आया है कि करीब सत्तर फीसद ऐसे विद्यार्थी थे, जिन्होंने खुले मन से बताया कि उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए उनके अभिभावकों का उन पर अत्यधिक दबाव था। आंकड़े चिंतित करने वाले हैं कि इस दबाव से पीड़ित कई विद्यार्थी अपनी जीवनलीला भी समाप्त कर रहे हैं, क्योंकि वे सोच लेते हैं कि जो अपेक्षा उनसे की जा रही है, वह उनकी सामर्थ्य के बाहर है।

इसलिए आवश्यक है कि इस भाग-दौड़ की जिंदगी में युवा पीढ़ी को लक्ष्य निर्धारण में उनके माता-पिता अपने मैत्रीभाव का प्रदर्शन करते हुए समय-समय पर आत्मीय सहयोग, अनुश्रवण और मृदुल वातावरण उपलब्ध कराएं। इससे लक्ष्य का लालित्य शाश्वत रहेगा।