युद्ध और सत्ता के संदर्भ में ‘कूटनीति’ और ‘रणनीति’ जैसे शब्द भले ही बड़े और जटिल प्रतीत होते हों, पर उनकी असली नींव अक्सर हमारे बचपन में ही रख दी जाती है। जब हम दिनचर्या के छोटे-बड़े लक्ष्य पूरे करने के लिए अपने अनूठे तरीकों का निर्माण कर रहे होते हैं, तब अनजाने में ही हम निर्णय लेने और संबंधों को संतुलित रखने की कला भी सीख रहे होते हैं।

हमारे रोजमर्रा के काम- जैसे जब हम अपने लिए कुछ लेने से पहले आसपास के लोगों की आवश्यकता पूछ लेते हैं, या अपने काम को इस प्रकार करते हैं कि किसी और को उसके कारण असुविधा न हो- वहीं से इस समझ की शुरुआत होती है।

जब छोटे-छोटे निर्णयों में हमें दूसरों का खयाल रखना, बांटना और धैर्य रखना सिखाया जाता है, साथ ही हमारे बड़े भी अपने आचरण से सही उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, तब हम अपने लक्ष्य तक पहुंचने के मार्ग को केवल उसकी लंबाई या उससे मिलने वाले लाभ के आधार पर नहीं, बल्कि नैतिकता और व्यापक दृष्टि से देखने लगते हैं।

हर अनुभव के साथ हमारा व्यक्तित्व परिष्कृत, मजबूत और सुदृढ़ बनने लगता है। न्यायपूर्ण और स्पष्ट निर्णय लेना धीरे-धीरे हमारे स्वभाव का हिस्सा बन जाता है।

कहने को तो यह आचरण सामान्य शिष्टाचार की श्रेणी में आता है, जो लगभग हर व्यक्ति को बचपन में सिखाया जाता है, लेकिन भविष्य में जब जीवन अपना पूर्ण आकार लेता है और हमारे निर्णयों का प्रभाव पहले से कहीं अधिक व्यापक हो जाता है, तब हमारी कार्य-योजनाओं और निर्णयों को कूटनीति और रणनीति का नाम दे दिया जाता है। जबकि हमारे भीतर बचपन में विकसित हुई वही कोमल संवेदनाएं और आदर्श ही हमारा मार्गदर्शन कर रहे होते हैं।

सोचने-समझने की दिशा बचपन में ही चुपके-चुपके तय होती रहती है

सच यह है कि हमारे व्यक्तित्व के सोचने-समझने की दिशा बचपन में ही चुपके-चुपके तय होती रहती है, जब हमें परिवार से लेकर समाज और हमारे खेलने-कूदने से लेकर लेकर स्कूल तक में व्यवहारों आदि के संदर्भ में सिखाया जाता है। वह हमारा सामाजिक प्रशिक्षण होता है, जिसके जरिए हमारे जीने का ढंग तय होता है और इसके समांतर ही हम अपने सामने घटने वाली घटनाओं को लेकर राय बनाते हैं, अपने भीतर सिंचित आग्रहों के आधार पर उसका आकलन करते हैं।

हां, बाद के दिनों में कुछ परिस्थितियों में अगर हमें अपने स्वतंत्र विवेक के साथ जूझने का मौका मिलता है और हम उसे स्वीकार करके सोचने-समझने की नई दिशा पर भी विचार करते हैं, तब हमारी ‘कूटनीतिक’ दिशा भी बदल सकती है।

कई बार ‘कूटनीति’ को नकारात्मक अर्थों में देखा जाता है, जिसका वास्तविक कारण मनुष्य के भीतर की दुर्बलता होती है। जब व्यक्ति अपने भीतर आवश्यक जीवन-मूल्यों, आदर्शों और विचारों को पनपने का अवसर नहीं देता, तब उसके निर्णय स्वार्थ, संकीर्ण सोच या भय से प्रेरित होने लगते हैं। ऐसे में परिपक्व विचारों तथा न्यायसंगत और साहसिक योजनाओं की अपेक्षा करना ही अनुचित है।

कूटनीति केवल परिस्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ने की कला नहीं

दरअसल, कूटनीति केवल परिस्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ने की कला नहीं है, बल्कि यह एक चुनाव भी है- एक ऐसा चुनाव, जहां हम तत्काल लाभ और स्वार्थ से ऊपर उठकर व्यापक हित, संतुलन और न्याय को प्राथमिकता देते हैं। यह वही समझ है, जो बचपन की सरल सीखों से विकसित होकर जीवन के जटिल निर्णयों में हमारा मार्गदर्शन करती है। हम किन आदर्शों को लेकर चलते हैं, यही निर्धारित करता है कि हमारे निर्णय किस दिशा में आकार लेंगे और हम कितने दृढ़ बन सकेंगे।

आम जीवन में भी कूटनीति का अर्थ केवल छल या चतुराई नहीं है। जब व्यक्ति गंभीरता से अपने प्रत्येक कार्य और व्यवहार की जिम्मेदारी स्वीकार करता है, तब वह स्वाभाविक रूप से संवेदनशीलता, संतुलन और समझदारी के साथ व्यवहार करने लगता है।

अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए भी वह इस बात का ध्यान रखता है कि किसी का अहित न हो। सही ढंग से बनाई गई योजनाएं संबंधों को सुदृढ़ बनाती हैं और समाज में सामंजस्य बनाए रखने में सहायक होती हैं। जब यही सोच व्यक्ति से आगे बढ़ती है, तो समाज के स्वरूप को भी प्रभावित करने लगती है।

इस संदर्भ में यह समझना आवश्यक हो जाता है कि कूटनीति केवल युद्ध और सत्ता का उपकरण मात्र नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति और समाज दोनों को परिभाषित करने वाली एक दृष्टि है। सही कूटनीति किसी एक नेता तक सीमित नहीं रहती, वह एक ऐसा पथ-प्रदर्शक विचार बन जाती है, जिसका अनुसरण करने के लिए किसी आदेश की नहीं, बल्कि विश्वास की आवश्यकता होती है।

निस्संदेह, यह यात्रा उसी क्षण आरंभ होती है, जब व्यक्ति अपने प्रत्येक निर्णय में न्याय को चुनने का साहस अपने भीतर जागृत करता है। भले ही इसकी शुरुआत किसी एक व्यक्ति या निर्णय से हो, पर धीरे-धीरे यह पूरी अवाम के चरित्र को प्रभावित करने लगती है।

जब निर्णय भय के प्रभाव में लिए जाते हैं, तब कूटनीति केवल बचाव का साधन बनकर रह जाती है और व्यक्ति अपने ही विवेक से पराजित हो जाता है। वास्तविक और सार्थक कूटनीति वही है, जो तटस्थ और संतुलित दृष्टि के साथ सही कार्य करने का मार्ग दिखाए।

ऐसी कूटनीति न केवल व्यक्ति के चरित्र को मजबूत बनाती है, बल्कि समाज में विश्वास और न्याय की भावना को भी बनाए रखती है। मजबूत समाज की नींव उसके मूलभूत आदर्शों और मूल्यों पर टिकी होती है। यही वे आधारभूत स्तंभ हैं, जिन पर सही और न्यायपूर्ण निर्णय लिए जा सकते हैं। जब समाज अपने इन आदर्शों के प्रति स्पष्ट होता है, तभी उसकी कूटनीति भी संतुलित और दूरदर्शी बनती है।

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