Parliament Ruckus: संसद अखाड़ा है। दंगल है। जनतंत्र है। यहां ‘जो मारे सो मीर’ है, ‘हारे को हरिनाम’ है! ऐसे ही एक दिन संसद के बहस रूपी अखाड़े में विपक्ष के नेता ने पहले अपनी कलाइयों के जरिए ‘जिउ जुत्सु’ (मार्शल आर्ट) की ‘ग्रिप चोक’ की मुद्रा बनाकर दिखाई कि असली दांव है ‘ग्रिप’ यानी ‘पकड़’ और फिर किया जाता है ‘चोक’ (दमघोंटू दबाव), जब विरोधी ‘चोक’ हो जाता है, तो यह उसकी आंख में दिखने लगता है। जब जान बचाने के लिए प्रतिपक्षी तीन बार ‘टैप’ यानी ‘थप थप थप’ कर देता है, तो उसे छोड़ दिया जाता है।

फिर जब संसद की बहस में पूर्व सेनाध्यक्ष नरवणे की किताब को ‘उद्धृत’ करते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री तथा रक्षामंत्री पर अपनी ‘पकड़’ लगानी चाही, तो लोकसभा अध्यक्ष ने एक ‘अप्रकाशित पुस्तक’ से ‘उद्धृत’ करने को ‘नियम विरुद्ध’ बताकर उनको बोलने की इजाजत नहीं दी। इसके बाद उनके साथी लोकसभा अध्यक्ष के कमरे में पहुंच गए और अपनी नाराजगी व्यक्त करते रहे। लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ ‘अविश्वास प्रस्ताव’ देकर उनको हटाने की मांग तक की गई।

इस तरह, विपक्ष के नेता ने ‘जिउ जुत्सु’ को आज की राजनीति का पूरा रूपक बना दिया। मसलन, ट्रंप ने पहले ‘ग्रिप’ लगाई फिर ‘चोक’ किया और ‘समझौता’ करा लिया… और अब ये ‘ग्रिप’ और ‘चोक’ देखो। डर उनकी आंखों में दिखता है। सत्ता पक्ष उनके इस रूपक पर भ्रमित-सा दिखा। इसके बाद जैसे ही संसद के बाहर दो मंत्री मीडिया से बात करते दिखे, वैसे ही विपक्ष के नेता ने एक मंत्री की बांह पकड़ी और मजाक-मजाक में कहा कि आइए बात करते हैं… तो उन मंत्री ने तुरंत अपनी बांह छुड़ाई और अपने साथी के साथ तेजी से आगे निकल गए।

बाद में चैनलों में आ बैठी ‘हाय हाय’ कि उनका आचरण संसदीय नहीं… कि उनके खिलाफ ‘विशेषाधिकार हनन’ प्रस्ताव लाओ। फिर सत्ता पक्ष ने दांव बदला। एक कहने लगे कि ‘विशेषाधकिार हनन’ की जगह उनको संसद की सदस्यता से वंचित करने वाली ‘ग्रिप’ लगाओ, ‘चोक’ लगाओ! जवाब में विपक्षी नेता ने फिर अपनी ‘बेल्ट’ लहरा दी कि आप ‘विशेषाधिकार हनन’ लाओ या कुछ और करो… मैं डरने वाला नहीं, क्योंकि मैं सच के साथ खड़ा हूं… किसान के साथ खड़ा हूं… मजदूर के साथ खड़ा हूं..!

इसी दौरान उन्होंने यौन अपराधों की बदबू से बजबजाती ‘एपस्टीन फाइल्स’ में भारत के कुछ ‘अति महत्त्वपूर्ण’ नामों का जैसे ही उल्लेख किया, वैसे ही ‘हाय-हाय’ शुरू हो गई। जवाब में सत्ता पक्ष के एक सांसद ने कुछ प्रसंगों को प्रकाशित किताबों से उद्धृत कर विपक्ष पर दबाव बनाने की कोशिश की। विपक्ष ने इस पर जम कर एतराज किया। चर्चित ‘एपस्टीन फाइल्स’ की दुनिया बड़े-बड़े सत्तानशीनों, नेताओं, सेठों और जानी-मानी हस्तियों के आपत्तिजनक फोटो-वीडियो की प्रदर्शनी है।

ऐसे ही एक ‘संदर्भित’ मंत्री ने एक चैनल पर जवाब देते हुए दो-टूक कहा कि विपक्ष के नेता एक बार मिलने आए और मुझे आंख मारी… कुछ ‘खास जगह’ में आपका नाम आया है। एंकर बोला कि यह तो ‘भयादोहन’ हुआ। मंत्री कहिन कि मेरा कोई क्या ‘भयादोहन’ करेगा? मेरा जीवन खुली किताब है। मैं योद्धा हूं, कई मामले जीते हैं, मैं ऐसे आरोपों को गंभीरता से नहीं लेता। एक सत्ता प्रवक्ता ने साफ किया कि ऐसे मामलों में नाम का जिक्र आना अलग बात है और ‘गलत’ संदर्भ में जिक्र आना अलग बात है।

‘जिउ जुत्सु’ वाला दिन विपक्ष के नेता के नाम रहा। उन्होंने ‘जिउ जुत्सु’ के ‘ग्रिप’ और ‘चोक’ का पूरा रूपक ही रच दिया। सत्ता पक्ष इसकी दमदार काट नहीं सोच सका। वह कभी ‘विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव’ लाने, कभी संसद की ‘सदस्यता से वंचित’ करने की दुविधा में देर तक फंसा नजर आया। एक चैनल पर एक चर्चक ने कहा भी कि सत्तापक्ष, विपक्ष के नेता का कुछ नहीं करने वाला, क्योंकि वही भाजपा के सबसे बड़े सहायक हैं… अगर उनको सदस्यता से वंचित करेंगे, तो वे ‘शहीद’ के तौर पर देखे जाएंगे।

बहरहाल, इस बीच एक ओर मुर्शिदाबाद में हुमायूं कबीर की ‘बाबरी मस्जिद’ बनाने की तैयारियां और उसके खिलाफ उत्तर प्रदेश से कुछ हिंदू संगठनों का मुर्शिदाबाद तक जुलूस निकाल कर यह रोकने का एलान और दूसरी ओर केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के छह छंद और उसके सम्मान में तीन मिनट कुछ सेकंड तक खड़े रहना, उसके बाद ‘राष्ट्रगान’ के गायन की अनिवार्यता ने लगभग परिचित किस्म की बहसें पैदा कीं। एक पक्ष कहिन कि हम तो अल्लाह को मानते हैं और किसी को नहीं, एक ने कहा कि मुसलिम लीग ने इस पर एतराज किया था और एतराज माना गया था। एक कहिन कि ये सांप्रदायिकता फैलाने की कोशिश है, दूसरे कहिन कि ये देशभक्ति का गीत है। जिस देश में रहते हैं, उसे नमन करने में क्या दिक्कत! तवलीन सिंह का विचार: विकसित भारत में प्रधानमंत्री अकेले जा रहे हैं या हमें भी साथ ले जाएंगे?