प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में सांसदों को दो घंटे पुस्तकालय में व्यतीत करने की सलाह दी है। संभवत: संसदीय भाषणों की उल्लेखनीयता और गंभीरता का समाप्त हो जाना उनकी चिंता का कारण रहा होगा। मोदी ने भले ही सांसदों को सुझाव दिया है, लेकिन यह सभी जनतांत्रिक देशों के लिए संसदीय मूल्यों के क्षरण के दौर में संजीवनी की तरह है।

संसद में हो-हल्ला और अमर्यादित भाषा का उपयोग आम बात हो गई है। अल्बानिया, यूक्रेन, सर्बिया और जॉर्जिया की संसद में तो हाथापाई भी होने लगी है। ऐसी बातें जनतांत्रिक संस्थाओं के प्रति अनास्था पैदा करने के लिए यथेष्ट हैं। वे दिनों-दिन अपनी सामाजिक स्वीकृति और सम्मान दोनों खो रहे हैं।

ब्रिटेन में हुए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि मात्र नौ फीसद लोग अब देश के सांसदों पर भरोसा करते हैं। ब्रिटेन संसदीय व्यवस्था का जनक माना जाता है। एक समय था, जब एडमंड बर्क, जेएस मिल, डिजराइली और चर्चिल जैसे लोग वहां की संसद को सुशोभित करते थे। ऐसे लोगों की बौद्धिकता ने ही लोकतंत्र को संवारा है। तीन सौ वर्ष पूर्व बर्क ने ‘रिफ्लेक्शन ऑन द रिवॉल्यूशन ऑफ फ्रांस’ की रचना की थी, जो आज भी प्रासंगिक है। व्यस्तता के बावजूद चर्चिल ने छह खंडों में द्वितीय विश्वयुद्ध का इतिहास लिखा।

ऐतिहासिक रूप में भारत तो उससे दो कदम आगे है। यह जनतंत्र का जनक है। यूरोप में तो एक पेरिक्लिस चौबीस सौ साल पहले हुआ था, जो जन सरोकारों एवं बौद्धिकता से संपन्न एथेंस का राजा था। मगर भारत में तो इसकी लंबी सूची है। केपी जायसवाल की पुस्तक ‘हिंदू पॉलिटी’ (1924) लोकतांत्रिक समृद्धि के तथ्यों से भरी पड़ी है।

यह और बात है कि उसे प्राध्यापक ही नहीं पढ़ रहे हैं, तो राजनीतिज्ञों से क्या उम्मीद की जा सकती है। हमारी सभ्यता की विशिष्टता विचारों की विविधता है। इसी ने शास्त्रार्थ को जन्म दिया। यह हमारी प्राणवायु की तरह है। इसलिए विमर्श की संस्कृति में गिरावट और बौद्धिकता के प्रति बढ़ती अरुचि सिर्फ संसदीय जनतंत्र ही नहीं, बल्कि सभ्यताई संकट का कारण बन सकता है।

संविधान सभा की चर्चा उत्कृष्ट और सजीव बौद्धिकता का उदाहरण है। उसके प्रत्येक सदस्य का भाषण समाज विज्ञान के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनने की गुणसंपन्नता से भरा है। बौद्धिकता जब समाज-सभ्यता सापेक्ष और व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर होती है, तब वह सजीव बन जाती है। मगर ज्ञान और अनुभवों का जब सिर्फ तात्कालिक स्वार्थ के लिए उपयोग किया जाता है, तब यह निर्जीव बौद्धिकता का रूप ले लेता है। समकालीन संसदीय चर्चा में निर्जीव बौद्धिकता की प्रचुरता देखी जा सकती है।

सजीव बौद्धिकता में निष्पक्षता और निर्भयता दोनों होते हैं। इसका एक अच्छा उदाहरण है- संविधान सभा में गांधीवादी सिब्बलाल सक्सेना ने जब महात्मा गांधी का नाम संविधान की प्रस्तावना में जोड़ने के लिए संशोधन दिया, तो उसका विरोध दूसरे गांधीवादी ब्रजेश्वर प्रसाद और आचार्य कृपलानी ने किया। दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क थे। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा, ‘प्रस्तावना में न गांधी होंगे, न ही ईश्वर।’

भारतीय संसद उस श्रेष्ठता को आरंभ के कुछ वर्षों तक प्रदर्शित करती रही। इसका उदाहरण 1957 में केरल की चुनी हुई कम्युनिस्ट सरकार की बर्खास्तगी पर संसदीय चर्चा है। इस उत्तेजक घटना पर भी चर्चा के दौरान न व्यवधान हुआ, न ही अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल। तथ्यों और तर्कों के उपयोग में सांसद अकादमिक जगत को पीछे छोड़ देते थे।

उस समय संसद के पुस्तकालय में जगह कम पड़ जाती थी। तब केएम मुंशी केंद्रीय मंत्री थे। उन्होंने तीन दर्जन पुस्तकें लिखीं। ‘जय सोमनाथ’ उनकी प्रसिद्ध कृति है। संपूर्णानंद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और उन्होंने दर्जनों पुस्तकों की रचना की। इनमें ‘अधूरी क्रांति’ और ‘ऋग्वेद प्रतिसाख्यम’ प्रसिद्ध हैं। ऐसी प्रतिभाएं सभी दलों में थीं।

सोशलिस्ट सांसद एनजी गोरे ने पंडित जवाहरलाल नेहरू के जीवन चरित का मराठी अनुवाद किया था। राम मनोहर लोहिया की ‘वील्स ऑफ हिस्ट्री’ उनकी अनेक पुस्तकों में से एक थी। कम्युनिस्ट हीरेन मुखर्जी ने 1952 से 1977 तक के संसदीय विकास पर ‘पोर्ट्रेट ऑफ पार्लियामेंट’ पुस्तक लिखी, तो जनसंघ के बलराज मधोक का ‘भारतीयकरण’ कालजयी रचना है।

कर्ण सिंह की पुस्तक ‘डांस ऑफ पीकॉक’ अंग्रेजी भाषा की श्रेष्ठ रचनाओं में से एक है। साठ के दशक में त्रिगुणा सेन, एमसी छागला, भूपेश गुप्ता, दत्तोपंत ठेंगड़ी और जगन्नाथ राव जोशी के भाषणों में भारत का भविष्य रचता-बसता था। 1958-63 तक शिक्षा मंत्री रहे केएल श्रीमाली की पुस्तक ‘शिक्षा और भारतीय लोकतंत्र’ की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है।

लोकतंत्र के मंदिर के वे ऐसे पुजारी थे, जो भौतिकता पर बौद्धिकता को महत्त्व देते थे। लोग उनकी तस्वीरों को स्कूल-कॉलेजों एवं घरों में सम्मान से लगाते थे। उसमें ठहराव क्यों आया, यह विचारणीय है।

दुनिया की तमाम जनतांत्रिक संस्थाएं इस संकट से गुजर रही हैं। फ्रांस की विधायिका में ‘इमैनुएल जोसेफ’ थे। उनकी रचना ‘व्हाट इज द थर्ड एस्टेट’ ने फ्रांस की क्रांति को बौद्धिक आधार दिया था। समकालीन ऑस्ट्रेलिया में ‘एज इट हैपंड’ (1996) के लेखक जॉन मैककॉन जैसे सांसदों की कमी महसूस की जा रही है।

इटली की संसद में बेनेडेटो क्रोचे जैसे विद्वान ने ‘फिलॉसफी ऑफ स्पिरिट’ पुस्तक लिखी थी। बाबा साहब आंबेडकर और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निजी पुस्तकालयों में पचास हजार से अधिक पुस्तकें थीं।

जनतंत्र सिर्फ शासन व्यवस्था नहीं है। यह मानव मूल्यों की उच्चतम अभिव्यक्ति है, जिसमें उसका विवेक, बुद्धि, ज्ञान, चेतना और समर्पण पांचों बातें सम्मिलित रहती हैं। यही बात संसद में बैठने वालों की जाति, धर्म, लिंग, आयु और भाषा को गौण कर देती है। आज दुनिया के विभिन्न देशों में बुद्धिजीवी और राजनेता निर्जीव बौद्धिकता के पथिक हैं। भारत अभी भी सजीव बौद्धिकता से पूरी तरह विरक्त नहीं हुआ है। उसे संभलने और संभालने का वक्त दस्तक दे रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सुझाव उसी की एक शुरुआत है।