आज के समय में मोबाइल फोन हमारी जिंदगी का सबसे बड़ा हिस्सा बन चुका है। सुबह आंख खुलने से लेकर रात को सोने तक, हमारा हाथ बार-बार फोन की तरफ जाता है। कुछ मिनट के लिए सोशल मीडिया खोलते हैं और देखते ही देखते घंटों बीत जाते हैं। खासकर रील्स और Shorts जैसे वीडियो ने लोगों का ध्यान इस तरह बांध लिया है कि समय का पता ही नहीं चलता।
लेकिन इस बदलती आदत का असर सिर्फ बड़ों तक सीमित नहीं है। इसका सबसे गहरा प्रभाव बच्चों पर पड़ रहा है। अक्सर लोग बच्चों के मोबाइल इस्तेमाल पर चिंता जताते हैं लेकिन बहुत कम लोग इस बात पर ध्यान देते हैं कि बच्चों की बिगड़ती आदतों के पीछे कहीं न कहीं पेरेंट्स की डिजिटल आदतें भी जिम्मेदार हैं।
आज कई घरों में यह सीन बहुत सामान्य हो चुका है- मम्मी रील्स देख रही हैं, पापा फोन पर स्क्रॉल कर रहे हैं और बच्चा पास बैठा उनका ध्यान पाने की कोशिश कर रहा है। कभी वह कुछ दिखाना चाहता है, कभी बात करना चाहता है, लेकिन जवाब में उसे सिर्फ ‘एक मिनट’ सुनने को मिलता है। धीरे-धीरे यही ‘एक मिनट’ बच्चों और पेरेंट्स के बीच दूरी पैदा करने लगता है।
टीचर का कहना है कि सिर्फ एक ही नहीं बल्कि कुछ और बच्चों के साथ भी इस तरह की घटनाएं हुई हैं। हमने अभिभावकों को इस बारे में बताया है और उन्हें सोशल मीडिया, रील्स, फोन से इतर बच्चों पर ध्यान देने को कहा है।
बच्चे वही सीखते हैं जो घर में देखते हैं
बच्चों का पहला स्कूल उनका घर होता है। वे किताबों से पहले अपने माता-पिता को देखकर सीखते हैं। अगर घर में हर समय फोन हाथ में रहेगा तो बच्चों को भी यही सामान्य लगेगा।
आज दो-तीन साल के बच्चे भी मोबाइल स्क्रीन देखकर खाना खाते हैं। कई बच्चे रोते हैं तो उन्हें चुप कराने के लिए फोन पकड़ा दिया जाता है। धीरे-धीरे स्क्रीन उनके जीवन का हिस्सा बन जाती है। वे खेलना कम और स्क्रीन देखना ज्यादा पसंद करने लगते हैं।
सबसे बड़ी समस्या तब होती है जब पेरेंट्स खुद देर रात तक मोबाइल इस्तेमाल करते हैं। बच्चे भले फोन सीधे इस्तेमाल न करें लेकिन कमरे में चलती रील्स की आवाज़, स्क्रीन की रोशनी और जागता हुआ माहौल उनकी नींद को प्रभावित करता है। छोटे बच्चे जल्दी सोना चाहते हैं लेकिन जब घर का माहौल ही देर रात तक जागने वाला हो जाए तो उनकी नींद पूरी नहीं हो पाती।
अधूरी नींद और उसका असर
डॉक्टर और विशेषज्ञ हमेशा कहते हैं कि बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए अच्छी नींद बहुत जरूरी है। लेकिन आज कई बच्चों की नींद पूरी नहीं हो रही।
रात में देर तक जागने की वजह से बच्चे सुबह थके हुए उठते हैं। स्कूल जाते समय उनका मन चिड़चिड़ा रहता है। क्लास में उनका ध्यान पढ़ाई पर नहीं लग पाता। कई टीचर्स शिकायत करते हैं कि बच्चे बार-बार जम्हाई लेते हैं, उनींदे रहते हैं या पढ़ाई में रुचि नहीं दिखाते। यह सिर्फ आलस नहीं है। यह थके हुए दिमाग और अधूरी नींद का असर है।
जब बच्चा ठीक से सो नहीं पाता तो उसका व्यवहार भी बदलने लगता है। वह जल्दी गुस्सा करता है, छोटी-छोटी बातों पर रोता है और मानसिक रूप से अस्थिर महसूस करता है। कई बार पेरेंट्स इसे बच्चों की जिद या बदतमीजी समझ लेते हैं जबकि असली वजह उनकी बिगड़ी दिनचर्या होती है।
मोबाइल ने कम कर दी बातचीत
पहले घरों में रात का समय परिवार के लिए होता था। लोग साथ बैठकर बातें करते थे, बच्चे दिनभर की बातें बताते थे, दादी कहानियां सुनाती थीं। लेकिन अब हर शख्स अपनी स्क्रीन में व्यस्त है।
आज कई बच्चों को अपने पेरेंट्स का पूरा ध्यान ही नहीं मिल पाता। जब बच्चा कुछ पूछता है तो जवाब आधा सुनाई देता है क्योंकि आंखें फोन पर होती हैं। धीरे-धीरे बच्चे भी समझ जाते हैं कि मोबाइल उनसे ज्यादा जरूरी है। इसका असर बच्चों के आत्मविश्वास पर भी पड़ता है। वे अपनी बातें खुलकर कहना कम कर देते हैं। अकेलापन महसूस करने लगते हैं। कुछ बच्चे चुप हो जाते हैं जबकि कुछ जरूरत से ज्यादा गुस्सैल हो जाते हैं।
सोशल मीडिया का अति इस्तेमाल गलत
यह कहना गलत होगा कि सोशल मीडिया पूरी तरह खराब है। आज उसी मोबाइल से लोग नई चीजें सीख रहे हैं, काम कर रहे हैं और दुनिया से जुड़े हुए हैं। समस्या सोशल मीडिया नहीं है बल्कि समस्या उसका जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल है।
रील्स इस तरह बनाई जाती हैं कि व्यक्ति लगातार उन्हें देखता रहे। एक वीडियो खत्म होते ही दूसरा शुरू हो जाता है। दिमाग को तुरंत मनोरंजन मिलने लगता है और धीरे-धीरे इसकी आदत बन जाती है। पेरेंट्स कई बार सोचते हैं कि वे सिर्फ कुछ मिनट फोन इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन बच्चे उन मिनटों को अलग तरीके से महसूस करते हैं। बच्चे समय नहीं, ध्यान समझते हैं। उन्हें यह महसूस होता है कि फोन उनके माता-पिता से ज्यादा जरूरी हो गया है।
बच्चों पर मानसिक असर
आज छोटे बच्चों का ध्यान बहुत जल्दी भटकने लगा है। वे लंबे समय तक किसी एक चीज पर ध्यान नहीं लगा पाते। इसकी एक वजह लगातार बदलती स्क्रीन भी है।
जब बच्चा हर समय छोटे-छोटे तेज वीडियो देखता है तो उसका दिमाग उसी गति का आदी हो जाता है। फिर स्कूल की पढ़ाई उसे धीमी और बोरिंग लगने लगती है। किताब पढ़ना कठिन लगता है क्योंकि वहां तुरंत मनोरंजन नहीं मिलता।
कई बच्चों में चिंता, चिड़चिड़ापन और गुस्सा बढ़ता जा रहा है। कुछ बच्चे बाहर खेलना छोड़ चुके हैं। वे घर में रहते हुए भी अकेले महसूस करते हैं। यह सिर्फ स्क्रीन का असर नहीं बल्कि भावनात्मक दूरी का असर भी है।
टीचर्स की बढ़ती चिंता
आज कई स्कूलों और टीचर्स ने भी इस बदलाव को महसूस किया है। शिक्षक बताते हैं कि पहले की तुलना में बच्चों का ध्यान पढ़ाई में कम हो गया है। वे जल्दी थक जाते हैं और धैर्य कम दिखाते हैं।
कुछ बच्चे क्लास में सो जाते हैं। कुछ लगातार बेचैन रहते हैं। कई बार समस्या पढ़ाई की नहीं होती बल्कि घर के वातावरण की होती है। टीचर्स बच्चों को कुछ घंटों के लिए संभाल सकते हैं लेकिन उनकी आदतों की असली नींव घर में बनती है। अगर घर में स्क्रीन टाइम नियंत्रित नहीं होगा तो उसका असर स्कूल में जरूर दिखाई देगा।
एक सच्ची घटना जिसने मुझे झकझोर दिया और सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर क्यों मां-बाप रील्स में इतना डूब गए हैं कि उन्हें अपने बच्चे की शारीरिक सेहत और मानसिक स्वास्थ्य का कोई ध्यान नहीं है। एक जाने-माने स्कूल में टीचर एक किस्सा साझा करते हुए बताती हैं कि पहली क्लास में पढ़ने वाली सात साल की बच्ची लगातार क्लास में दो दिन तक सोते हुए मिली। जब उन्होंने बच्ची से इस बारे में पूछा तो उसकी आंखों में आंसू थे और प्यार से पूछने पर उसने बताया कि मम्मी रात में रील्स देखती हैं, शोर होता है और मैं ठीक से सो नहीं पाती। सुबह स्कूल जाने के लिए जल्दी उठा देती हैं और नींद पूरी नहीं होने के चलते मैं क्लास में सो जा रही हूं। टीचर ने बताया कि इस घटना ने उन्हें स्तब्ध कर दिया कि कैसे पेरेंट्स अपने ही बच्चों को इस कदर दरकिनार कर सकते हैं। मां-बाप से जब टीचर ने बात की तो उन्होंने भी इस बात को स्वीकार और कहा कि उन्होंने इस तरफ गौर नहीं किया।
पेरेंट्स क्या कर सकते हैं?
समाधान बहुत कठिन नहीं है लेकिन शुरुआत पेरेंट्स को खुद से करनी होगी।
-बच्चों के सामने लगातार फोन इस्तेमाल करने से बचना चाहिए।
-रात में सोने से कम से कम एक घंटा पहले मोबाइल दूर रख देना चाहिए।
-बच्चों के साथ रोज कुछ समय बिना फोन के बिताना चाहिए।
-खाने के समय ‘नो मोबाइल’ नियम बनाया जा सकता है।
-बच्चों को बाहर खेलने, किताब पढ़ने और बातचीत के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
-सबसे जरूरी- बच्चों को यह महसूस होना चाहिए कि वे स्क्रीन से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।
-बच्चों को समय चाहिए, सिर्फ सुविधाएं नहीं
आज पेरेंट्स बच्चों को अच्छे स्कूल, महंगे खिलौने और बेहतर सुविधाएं देना चाहते हैं। लेकिन कई बार सबसे जरूरी चीज पीछे छूट जाती है- समय। बच्चों को महंगे गैजेट्स से ज्यादा जरूरत अपने माता-पिता के साथ बैठने की होती है। उन्हें बातचीत चाहिए, कहानी चाहिए, साथ में हंसना चाहिए। एक बच्चा अपने पेरेंट्स के साथ बिताए गए समय को हमेशा याद रखता है। लेकिन अगर बचपन सिर्फ स्क्रीन की रोशनी में गुजर जाएगा तो रिश्तों की गर्माहट धीरे-धीरे कम होने लगेगी।
कुल मिलाकर देखें तो सच यह है कि टेक्नोलॉजी अब हमारी जिंदगी का हिस्सा है और शायद हमेशा रहेगी। लेकिन हमें यह तय करना होगा कि तकनीक हमारे परिवार को जोड़ रही है या दूर कर रही है। हमें अपने व्यवहार और आदतों को भी देखना होगा।
बच्चे हमारी बातों से कम और हमारी आदतों से ज्यादा सीखते हैं। अगर हम चाहते हैं कि वे किताबों से जुड़ें, समय पर सोएं और मानसिक रूप से स्वस्थ रहें तो हमें खुद भी स्क्रीन से थोड़ा दूर होकर उनके करीब आना होगा क्योंकि बचपन दोबारा नहीं आता। और कहीं ऐसा न हो कि रील्स देखते-देखते हम अपने बच्चों का सबसे खूबसूरत समय खो दें।
