पिछले सप्ताह जयपुर में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ कांग्रेस ने प्रदर्शन किया। ‘धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दो’ के नारे सुनने में आए और प्रधानमंत्री पर भी अंगुली उठाई गई ‘नीट’ में फिर प्रश्नपत्र लीक होने को लेकर। आक्रोश इतना था प्रदर्शनकारियों में कि भीड़ को काबू में लाने के लिए आंसू गैस छोड़नी पड़ी। भीड़ को देखकर मेरे मन में एक ही सवाल उठा बार-बार और वह यह कि इतना आक्रोश क्यों नहीं हम देख रहे हैं उन छात्रों में, जिनको दोबारा परीक्षा देनी पड़ेगी।

दो साल पहले जब इसी तरह पेपर लीक हुआ था, तो शिक्षा मंत्री ने पहले तो स्वीकार ही नहीं किया कि पेपर लीक हुआ है। जब ‘लीक’ साबित हुई, तो मंत्रीजी ने प्रेस वार्ता बुलाकर माफी मांगी, लेकिन उसके बाद सुधार के तौर पर अगर कोई कदम उठाए गए हैं, तो इतने चुपके से कि किसी को पता तक नहीं लगा।

बड़ा सवाल: एनटीए अपने सभी काम चोरी छिपे क्यों करती है?

राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) अपने सारे काम चोरी-छिपे क्यों करती है, यह किसी को मालूम नहीं, लेकिन अब सवाल इतने उठने लगे हैं उस पर कि पर्दे के पीछे से इस संस्था को सामने आना ही पड़ेगा, आज नहीं तो कल। इस बार नौबत शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र तक आ सकती है। दिल्ली के आला राजनीतिक गलियारों में चर्चा यह है कि धर्मेंद्र प्रधान को प्रधानमंत्री के करीबियों में माना जाता है, इसलिए उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है अभी तक, लेकिन भारतीय उच्च शिक्षा की समस्याएं न उनके रहने से हल होंगी और न ही उनके जाने से।

मेरा मानना है कि भारत का विकसित होने का रास्ता तब तक बंद रहेगा, जब तक हम अपने बच्चों के लिए अच्छे स्कूल-कॉलेज नहीं तैयार करते। इसलिए मैं बहुत दिनों से अपनी बेहाल शिक्षा संस्थाओं पर लिखती आई हूं। जब भी ग्रामीण भारत के दौरों पर जाती हूं, तो प्रयास करती हूं हर गांव में पहले सरकारी स्कूल का हाल जानने की। सो यकीन मानिए, आज तक मैंने एक भी सरकारी स्कूल नहीं देखा है जिसकी तुलना अच्छे निजी स्कूलों से की जा सकती हो।

निजी स्कूलों में साफ-सुथरी कक्षाएं होती हैं, अध्यापक होते हैं, जो एक विषय को पढ़ाने के लिए ही रखे जाते हैं। पुस्तकालय होते हैं, खेलकूद के मैदान होते हैं और आज के दौर में एआई की मदद लेकर आधुनिक पढ़ाई होती है। क्या ऐसा सरकारी स्कूल देखा है आपने भारत में? होते ऐसे स्कूल, तो क्या नेता और आला अधिकारी अपने बच्चों को निजी स्कूलों में डालते?

जब शिक्षा की सीढ़ी की पहली पौड़ी ही इतनी कमजोर हो, तो आगे की सीढ़ी कैसे मजबूत हो सकती है? हमारी समस्या यह है कि राजनेताओं ने शुरू से शिक्षा की अहमियत नहीं समझी। जवाहरलाल नेहरू जब प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने उच्च शिक्षा पर ध्यान जरूर दिया, लेकिन यह भूल कर कि आईआईटी जैसी संस्थाओं में वही बच्चे पहुंच सकेंगे, जिनकी अच्छे स्कूलों में पढ़ाई हुई हो। ऐसा ही हुआ है। कुछ मुट्ठी भर भारतीय बच्चे ही शिक्षा की सीढ़ी चढ़ पाए हैं ऊपर तक।

अफसोस कि इनमें से कई लाख, जो सबसे काबिल हैं, जल्दी देश छोड़कर किसी विकसित पश्चिमी देश में काम ढूंढ़ने चले जाते हैं। हाल यह है कि विदेशों से आकर जो डॉक्टर काम कर रहे हैं संयुक्त राज्य अमेरिका में, उनमें से बीस फीसदी भारतीय मूल के हैं यानी बीस डॉक्टरों में से एक भारतीय मूल का होता है। सिलिकॉन वैली में भी ज्यादातर विदेशी कंप्यूटर वैज्ञानिक भारत से ही गए हैं।

कहने का मतलब यह है मेरा कि हमारे बच्चों में दिमाग की कोई कमी नहीं है। अभाव है अगर किसी चीज का, तो अच्छे शिक्षा संस्थानों का है। ऐसा हाल अचानक नहीं हुआ है। दशकों से हमारे विश्वविद्यालयों का हाल बदतर होता गया है, इसलिए कि इन पर नियंत्रण रखते हैं नेता अपनी राजनीतिक जरूरतों के लिए, बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए नहीं।

शिक्षा पर राजनेताओं का नियंत्रण मजबूत करने के लिए ही नरेंद्र मोदी के दौर में 2017 में राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी बनाई गई। यानी जो लाइसेंस राज पहले से ही था शिक्षा क्षेत्र में, उसको और भी अधिक मजबूत किया गया।

आज जरूरत है इस लाइसेंस राज को समाप्त कर शिक्षा के क्षेत्र में आजादी की ताजी हवा लाने की। हर राज्य को पूरा अधिकार होना चाहिए शिक्षा संस्थाओं को अपने तरीके से चलाने का, बिना केंद्र सरकार के हस्तक्षेप के। ऐसा जब होगा, तो राज्यों में बेहतर शिक्षा संस्थाओं के निर्माण की स्पर्धा शुरू हो जाएगी।

निजी तौर पर मैं मानती हूं कि राज्य सरकारों के हाथ में भी ये संस्थाएं नहीं होनी चाहिए। संयुक्त राज्य अमेरिका में आज अगर दुनिया की सबसे बढ़िया उच्च शिक्षा संस्थाएं हैं, तो इसलिए कि उनको पूरी आजादी है अपना काम अपने तरीकों से करने की। भारत में उल्टा हाल है। हर कदम पर मिलते हैं आपको अधिकारी या सरकारी नौकर, जो शिक्षा में सुधार होने नहीं देते हैं। कुछ ऐसे हैं, जो रिश्वत खाने के बाद रास्ते से हट जाते हैं, लेकिन कुछ ऐसे हैं, जो रिश्वत लेने के बाद भी नहीं हटते हैं।

रही बात पेपर के लीक होने की, तो ऐसा इतनी बार हुआ है कि समझना मुश्किल है कि अभी तक इस गलत चलन को रोकने में सफल क्यों नहीं हुई है केंद्र सरकार? क्या इसलिए कि इस क्षेत्र में सुधार नाम की कोई चीज नहीं हुई है? ऐसा मेरा मानना है, क्योंकि मैंने वे दिन देखे हैं जब दूसरे देशों से भारत आया करते थे छात्र पढ़ाई करने, खासकर दक्षिण-पूर्वी एशिया से। अफसोस कि आज हमारे बच्चे चीन, सिंगापुर और मलेशिया शिक्षा हासिल करने जाते हैं। अफसोस कि इस क्षेत्र में ये देश हमसे बहुत आगे निकल गए हैं।

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देश में जब भी किसी परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होता है, तो जांच के आदेश के बाद ‘मुख्य साजिशकर्ता की गिरफ्तारी’ और ‘दोबारा परीक्षा की तारीख’ जैसी बातों के शोर-शराबे के पीछे एक ऐसा कड़वा सच छिप जाता है। नीट परीक्षा के इस अंतहीन तमाशे और बार-बार होने वाले प्रश्नपत्र लीक ने भारत में एक नए किस्म के पलायन को जन्म दे दिया है। अब तक देश का युवा डॉक्टर बनने के बाद विदेश जाता था, लेकिन अब इस परीक्षा तंत्र से तंग आकर देश के मेधावी विद्यार्थी बारहवीं पास करते ही भारत छोड़ रहे हैं। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक