देश का आम बजट-2026-27 संसद में पेश होने के बाद सरकारी प्रवक्ताओं, संपादकीय लेखकों, टिप्पणीकारों तथा पत्रकारों ने इसकी व्याख्या करने के लिए ‘सतर्क’ और ‘स्थिति को बिगाड़ना नहीं’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। मेरा मानना है कि उन्होंने इस अमेरिकी मुहावरे का अनुसरण किया- ‘अगर कोई चीज खराब नहीं है, तो उसे ठीक करने की कोशिश मत करो’।

कई चुनौतियां

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने मौजूद चुनौतियों की पहचान की गई थी। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं।

-राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से शुरू किया गया शुल्क संघर्ष। हालांकि ट्रंप ने भारतीय वस्तुओं पर शुल्क को पचास फीसद से घटाकर अठारह फीसद करने की घोषणा की है, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि यह कटौती भारत की ओर से अमेरिकी वस्तुओं पर शुल्क को शून्य करने, गैर-शुल्क बाधाओं को हटाने, 500 अरब डालर की अमेरिकी वस्तुओं की खरीद और अन्य शर्तों पर निर्भर है, जिन्हें पूरा करना भारत के लिए मुश्किल हो सकता है।

-प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का प्रवाह क्षमता से कम है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक अपना निवेश वापस ले रहे हैं। भारतीय प्रवर्तक अपने पास नकदी होने के बावजूद निवेश करने में अनिच्छुक हैं। इसका परिणाम यह है कि सकल स्थिर पूंजी निर्माण जीडीपी के लगभग तीस फीसद पर अटका हुआ है।

-सांकेतिक जीडीपी वृद्धि असंतोषजनक बनी हुई है। एनएसओ की ओर से अपनाई गई कार्य पद्धति और राष्ट्रीय खातों पर संदेह ने वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर पर सवाल खड़े किए हैं। सांकेतिक जीडीपी एक बेहतर सूचक है। यह वर्ष 2023-24, 2024-25 और 2025-26 में क्रमश: 12 फीसद, 9.8 फीसद और आठ फीसद की दर से बढ़ी है। वृद्धि की गति धीमी हो रही है।

-बेरोजगारी की स्थिति गंभीर बनी हुई है। जून 2025 में युवा बेरोजगारी दर 15 फीसद थी। कुल कार्यबल का केवल 21.7 फीसद ही नियमित और वेतनभोगी रोजगार में है। लाखों युवा बेरोजगार हैं। ये आंकड़े स्वरोजगार की ओर रुझान को दर्शाते हैं।

-कोई भी देश विनिर्माण शक्ति बने बिना मध्यम आय वाला देश नहीं बना है। पिछले दस वर्षों में भारत के विनिर्माण क्षेत्र का जीडीपी में योगदान केवल 15-16 फीसद रहा है। ‘मेक इन इंडिया’, ‘पीएलआइ’ और अन्य योजनाएं रोजगार सृजन में विफल रही हैं।

-राजकोषीय समेकन की गति बेहद धीमी है। राजकोषीय घाटा वर्ष 2025-26 में 4.4 फीसद के मुकाबले 2026-27 में 4.3 फीसद हो जाएगा और राजस्व घाटा 1.5 फीसद पर ही बना रहेगा। इस रफ्तार से एफआरबीएम लक्ष्यों तक पहुंचने में बारह साल या उससे अधिक समय लगेगा, और इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।

  • वर्ष 2025-26 का कर संबंधी दांव बुरी तरह विफल रहा। बजट के गणित को बचाने में आरबीआइ का हाथ रहा, जिसने वर्ष 2025-26 में लगभग 304,000 करोड़ रुपए का उदार लाभांश दिया। पिछले दो वर्षों में इसने क्रमश: 210,874 करोड़ और 268,590 करोड़ रुपए का लाभांश दिया था। यूपीए सरकार (2004-2014) के दौरान आरबीआइ से प्राप्त उच्चतम लाभांश 2013-14 में 52,679 करोड़ रुपए था।

वित्त मंत्री ने सीईए को नजरअंदाज किया

आर्थिक सर्वेक्षण के अध्याय-1 में मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) ने ‘सावधानी बरतने, लेकिन निराशावादी न होने’ की सलाह दी थी। पूरी रपट में यही लहजा बरकरार रहा। एक अन्य अध्याय में उन्होंने राजकोषीय समेकन के लिए एक विश्वसनीय मार्ग की वकालत की। सीईए ने केवल शहरीकरण के मुद्दे पर साहसिक दृष्टिकोण अपनाया और ‘मजबूत महानगरीय शासन, पूर्वानुमानित प्रवर्तन तथा एक विश्वसनीय नागरिक समझौते की सलाह दी, जो नागरिकों और राज्य के बीच प्रोत्साहनों को संरेखित करे। साथ ही शहरों को भी बेहतर वित्तीय संसाधनों से सशक्त करना होगा।’

वित्त मंत्री का अपने प्रमुख सलाहकार को दिया गया जवाब बौद्धिक नहीं था और टालमटोल भरा था। अपने 85 मिनट के भाषण में उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति या अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से शुल्क और दबावपूर्ण सौदों के माध्यम से दुनिया की अर्थव्यवस्था पर किए जा रहे दोहरे हमले पर कोई टिप्पणी नहीं की। न ही उन्होंने वैश्विक उथल-पुथल, चीन के आर्थिक विस्तार या किसी अन्य ऐसे विषय पर टिप्पणी की, जिसकी जानकार लोगों को बजट भाषण में उम्मीद रहती है। मेरा उदार दृष्टिकोण यह है कि वित्त मंत्री और सरकार आर्थिक सर्वेक्षण को महत्त्व नहीं देते हैं। जबकि, मेरा अनुदार विचार यह है कि वे सोचते हैं कि हम एक ऐसे ग्रह पर रह रहे हैं, जो सौर मंडल का हिस्सा नहीं है।

मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि वित्त मंत्री ने धीमी विकास दर, गरीबी और बढ़ती असमानता, निवेश में ठहराव, व्यापक बेरोजगारी, कल्याणकारी योजनाओं की उपेक्षा, रुपए का अवमूल्यन तथा बुनियादी ढांचे और आवश्यक सेवाओं की मांग एवं आपूर्ति के बीच भारी अंतर जैसी चिंताओं को दूर करने के लिए सरकार की नीतियों को स्पष्ट करना जरूरी नहीं समझा।

लेखाकार की कसौटी पर विफल

सामान्य लेखा मानकों के अनुसार भी वित्त मंत्री के वित्तीय प्रबंधन का रिकार्ड कमजोर रहा। वर्ष 2025-26 के बजट आबंटन में ग्रामीण विकास, शहरी विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और कई अन्य मंत्रालयों के व्यय में भारी कटौती की गई। शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्रालय के बजट में 60,052 करोड़ रुपए की कटौती हुई। जल जीवन मिशन के लिए 67,000 करोड़ रुपए आबंटित किए गए थे, लेकिन संशोधित अनुमान में पाया गया कि केवल 17,000 करोड़ रुपए ही खर्च किए गए। पूंजीगत व्यय 2024-25 में सकल घरेलू उत्पाद के 3.2 फीसद से घटकर 2025-26 में 3.1 फीसद हो गया। रक्षा व्यय सकल घरेलू उत्पाद के 1.6 फीसद (कुल व्यय का 11.4 फीसद) के निम्नतम स्तर पर आ गया और 2026-27 में इसके घटकर सकल घरेलू उत्पाद के 1.5 फीसद (कुल व्यय का 11.1 फीसद) होने का खतरा है।

आर्थिक विशेषज्ञों ने बजट भाषण की तीखी आलोचना की है। डा सुरजीत भल्ला ने ‘चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था’ होने की आत्म-प्रशंसा का उपहास किया। डा सी रंगराजन ने राजकोषीय सुदृढ़ीकरण की धीमी गति पर सवाल उठाए। डा अशोक गुलाटी ने कृषि क्षेत्र के बड़े हिस्से की उपेक्षा पर खेद व्यक्त किया। प्रोफेसर रोहित लांबा (कार्नेल विश्वविद्यालय) ने बजट को एक ऐसी अर्थव्यवस्था के लिए उपयुक्त बताया, जो योजना की तलाश में है।

वित्त मंत्री ने लोगों के लिए योजनाओं, कार्यक्रमों, अभियानों, संस्थानों, पहलों, निधियों और समितियों आदि की झड़ी लगा दी। मैंने कम से कम चौबीस ऐसी घोषणाएं गिनीं। उन्हें जल्द ही पता चलेगा कि इनमें से कई घोषणाओं के लिए कोई धन आबंटित नहीं किया गया था!
यह बजट बौद्धिक आलस्य का एक नमूना था।