देश की अर्थव्यवस्था में निगमित क्षेत्र का महत्त्वपूर्ण योगदान है। यह क्षेत्र अब तेजी से वृद्धि और बदलाव के दौर में है। वर्तमान में यह संरचनात्मक परिवर्तनों, तकनीकी एकीकरण और स्थिरता की दिशा में विकास के चरण से गुजर रहा है। इस क्षेत्र में विनिर्माण क्षेत्र सर्वाधिक अहम है। पिछले कुछ वर्षों से इसकी गति धीमी चल रही थी। मगर अब इसके पुनरुद्धार की दिशा में किए गए प्रयासों से विनिर्माण क्षेत्र में तेज वृद्धि देखी जा रही है। नवंबर 2025 तक विनिर्माण क्षेत्र में 8.0 फीसद की वृद्धि दर्ज की गई है।

सरकार की ओर से समय-समय पर जारी आंकड़ों के अनुसार, यह क्षेत्र बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही में इसमें 7.72 फीसद और दूसरी तिमाही में 9.13 फीसद वृद्धि दर्ज की गई है। सकल घरेलू उत्पाद में विनिर्माण क्षेत्र का योगदान लगभग 17 फीसद रहा है। ताजा संशोधित आंकड़ों के अनुसार, विनिर्माण की वृद्धि दर वर्ष 2025-26 में 11.5 फीसद रहने का अनुमान है। भारत का लक्ष्य सकल घरेलू उत्पाद में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी को 17 फीसद से बढ़ा कर 25 फीसद करना है।

निगमित क्षेत्र में डिजिटल परिवर्तन का दौर भी तेजी से चल रहा है। बैंकिंग, खुदरा व्यवसाय, स्वास्थ्य सेवा और सामग्री प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में कृत्रिम मेधा (एआइ) को तेजी से अपनाया जा रहा है। निगमित क्षेत्र में ब्राडबैंड और इंटरनेट उपयोगकर्ता बढ़ रहे हैं। नवंबर 2025 तक ब्राडबैंड ग्राहकों की संख्या एक सौ करोड़ के पार चली गई, जो एक दशक पहले के 13.15 करोड़ से सात गुना अधिक है। देश के 99.9 फीसद जिलों में 5जी की सुविधा है और 5.18 लाख से अधिक बेस स्टेशन कार्यरत हैं। वहीं यूपीआइ लेन-देन भी तेजी से बढ़ रहा है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा डिजिटल देश है। देश में डेटा की लागत वर्ष 2014 के 269 रुपए प्रति गीगाबाइट से घट कर वर्ष 2025-26 में 8-10 रुपए प्रति गीगाबाइट रह गई है। डेटा सुरक्षा के लिए डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण नियम- 2025 में लागू हुए, जिसमें बच्चों के डेटा और गोपनीयता के संबंध में सख्त प्रावधान किए गए हैं।

अब कारपोरेट क्षेत्र में केवल मुनाफे के बजाय पर्यावरणीय और सामाजिक शासन के मापदंडों पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। इससे हरित ऊर्जा और सतत विकास के क्रियाकलापों में निवेश बढ़ा है। निगमित संस्थाओं में पर्यावरण और समाज के प्रति जिम्मेदारियां बढ़ाई गई हैं। निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व के लिए बने सीएसआर कोष से इसके लिए व्यय लगातार बढ़ रहा है। कंपनियां पर्यावरणीय पहलों जैसे नवीकरणीय ऊर्जा, अपशिष्ट प्रबंधन और जल संरक्षण आदि पर अधिक खर्च कर रही हैं।

सीएसआर के तहत प्रमुख कार्यों में भुखमरी, गरीबी और कुपोषण को दूर करना, स्वास्थ्य सेवा, स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी प्रमुखता से प्रयास किए गए हैं। अब कंपनियां केवल परियोजना-आधारित व्यय के बजाय, स्थायी विकास के लक्ष्यों को अपनी मूल व्यावसायिक रणनीतियों में शामिल कर रही हैं। कंपनियां पर्यावरण अनुकूल उत्पादों को अपना रही हैं, ताकि पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों को कम किया जा सके। कई संस्थाएं 18 राज्यों में 2,250 गांवों और कस्बों में पांच लाख से अधिक परिवारों को जोड़ते हुए अपने पर्यावरणीय लक्ष्यों के माध्यम से सतत विकास में योगदान दे रही हैं। इनका प्रमुख जोर पर्यावरण संरक्षण और पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने पर है।

भारतीय निगमित जगत ने वित्तीय मजबूती के लिए ऋण में भारी कटौती की है, जो वर्ष 2010 के दशक के 67 फीसद से घट कर 2024 में 48 फीसद पर आ गया है। इससे कंपनियों की वित्तीय स्थिति मजबूत हुई है। एनएसओ द्वारा वार्षिक निगमित सेवा क्षेत्र उद्यम सर्वेक्षण की शुरुआत के साथ, निगमित प्रशासन और डेटा पारदर्शिता में सुधार के प्रयास किए जा रहे हैं।

‘मेक इन इंडिया’ के तहत रक्षा और रेलवे जैसे क्षेत्रों में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की सीमा को उदार बना कर सौ फीसद तक की अनुमति दे दी गई है। जुलाई 2025 तक विनिर्माण विकास में 5.4 फीसद की वृद्धि देखी गई। 2025 में अप्रैल-अगस्त के दौरान उत्पाद निर्यात 2.52 फीसद से बढ़ कर 184.13 बिलियन अमेरिकी डालर हो गया। देश में आटोमोबाइल उत्पादन 1991-92 के बीस लाख से बढ़ कर 2023-24 में दो करोड़ 80 लाख इकाइयां हो गई हैं। वित्त वर्ष 2024-25 में कोयला उत्पादन 7.12 फीसद से बढ़ कर 370 मीट्रिक टन तक पहुंच गया है।

भारत सेमीकंडक्टर मिशन के तहत नई इकाइयों को मंजूरी देकर वैश्विक केंद्र बनने की ओर अग्रसर है। इन नवीन पहलुओं के परिणामस्वरूप, भारतीय निगमित क्षेत्र न केवल घरेलू मांग को पूरा कर रहा है, बल्कि वैश्विक मूल्य शृंखला में भी एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभर रहा है। इन सभी के बीच देश के निगमित क्षेत्र में इस समय कई तरह की आर्थिक, ढांचागत और नियामक चुनौतियां हैं। इससे विकास और उत्पादकता प्रभावित होती है। विशेष रूप से लघु और मध्य आकार की कंपनियां अपने कारोबार का विस्तार करने, नई तकनीक अपनाने या उत्पाद शृंखला में विविधता लाने के लिए आवश्यक पूंजी की कमी से जूझ रही हैं।

भारत में लाजिस्टिक लागत सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 13-14 फीसद है, जो वैश्विक औसत से अधिक है। खराब परिवहन प्रणाली, अपर्याप्त भंडारण और बिजली की कमी, ये सभी उत्पादन लागत को बढ़ाते हैं। जटिल नियामक ढांचा और नीतिगत अनिश्चितता, भ्रष्टाचार और नियमों में बार-बार बदलाव निवेश को हतोत्साहित करते हंै। अनुसंधान और विकास में कम निवेश के कारण भारतीय उद्योग नवाचार और उद्यमिता के मामले में पीछे हैं। सख्त श्रम कानूनों के कारण भी निजी क्षेत्र को कार्य बल प्रबंधन में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

विपणन और तकनीक की पुरानी कार्यप्रणालियों के उपयोग, विशेष रूप से लघु उद्योगों में प्रतिस्पर्धा को कम करता है। जीडीपी के मुकाबले निजी ऋण का उच्च अनुपात भी आर्थिक चिंता का विषय है। भारत के निगमित क्षेत्र को विनिर्माण, बुनियादी ढांचे, नौकरशाही और वित्तीय मोर्चों पर कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इन समस्याओं के समाधान के लिए व्यापक संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है।

निगमित क्षेत्र के इन आयामों से जुड़ी समस्याओं के समाधान की दृष्टि से पुराने श्रम कानून और व्यवसाय शुरू करने तथा उनको चलाने में अत्यधिक दस्तावेजीकरण निवेश को हतोत्साहित करते हैं। एकल खिड़की मंजूरी प्रणाली को मजबूत करना तथा श्रम कानूनों का और सरलीकरण करना जरूरी है। खराब परिवहन से उत्पादन और वितरण लागत बढ़ जाती है। गति शक्ति पहल के तहत बहु-परिवहन प्रणालियों और समर्पित माल गलियारों में निवेश तेज करना तथा सामग्री प्रबंधन लागत को कम करने के प्रयास जरूरी है।