कल्याणी।

सुबह की चाय से लेकर रात के खाने तक, घर से ऑफिस जाने तक बच्चों की पढ़ाई तक आज हर आम आदमी की जिंदगी का लगभग हर हिस्सा महंगाई के हिसाब किताब में ही निकल रहा है। किसी चीज की कीमत मे छह, सात, आठ या नौ रुपये की बढ़ोतरी पहली नजर में बहुत छोटा अंक लगता है और मामूली वृद्धि कहकर नजरंदाज कर दिया जाता है।

आखिर नौ रुपये ही तो बढ़े है, इससे किसी परिवार पर कितना ही असर पर जाएगा? पर किसी परिवार में न ही केवल एक चीज खरीदी जाती है या न ही किसी एक की कीमत बढ़ती है। जब दूध, प्याज, गैस, सीएनजी, पीएनजी, टैक्सी या ऑटो का किराया, वाहन, मोबाइल रिचार्ज और दूसरी अन्य चीज की कीमत बढ़ती है तो महीने के अंत तक ये सब मिलकर एक बढ़ी रकम बन जाते हैं।

मुंबई में एक सितंबर 2026 से दूध की कीमत में एक साथ नौ रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी इसका सटीक उदाहरण है। पहली नजर में नौ रुपये का अंतर छोटा लग सकता है, लेकिन ऐसे परिवार की उदाहरण लीजिए जहां रोजाना दो लीटर दूध की जरूरत होती है। वहां प्रतिदिन 18 रुपये का अतिरिक्त खर्च जुड़ जाता है और महीने के 30 दिनों में केवल दूध पर ही लगभग 540 रुपये ज्यादा खर्च हो सकते हैं। अब यह रकम शायद किसी बहुत बड़ी खरीदारी के सामने छोटी लगे, लेकिन एक वेतनभोगी परिवार के मासिक बजट में 540 रुपये का मतलब होता है कि कहीं न कहीं कोई दूसरा खर्च कम करना पड़ेगा।

मुश्किल यहीं खत्म नहीं होती, क्योंकि दूध अकेली चीज नहीं है जिसके दाम बढ़ रहे हैं। किचन में दूध के साथ-साथ और भी कई अन्य जरूरत के चीज जैसे प्याज और चीनी की भी कीमत बढ़ गई है। प्याज कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे लंबे समय तक खरीदना बंद किया जा सके और चीनी भी अधिकांश घरों के दैनिक उपयोग का हिस्सा है। किसी वस्तु की कीमत बढ़ने पर परिवार कुछ दिन उसके इस्तेमाल में कटौती कर सकता है, लेकिन हर चीज पर लगातार समझौता करना संभव नहीं है। आखिर एक घर कितनी चीजें कम करे और कब तक करे?

…और ये महंगाई की मार सिर्फ रसोई तक ही सीमित नहीं है। घर से बाहर निकलते ही बढ़ते खर्च का दूसरा हिसाब शुरू हो जाता है। सीएनजी की कीमत बढ़ती है तो इसका असर केवल उस व्यक्ति पर नहीं पड़ता जिसकी निजी गाड़ी सीएनजी से चलती है। सीएनजी महंगी होने पर ऑटो और टैक्सी चालकों का खर्च बढ़ता है और इसका सीधा असर यात्रियों के किराये पर पड़ सकता है।

मुंबई में ऑटो और टैक्सी के किराये में हालिया बढ़ोतरी इस बात का उदाहरण है कि ईंधन की बढ़ती लागत का बोझ आखिरकार किसी न किसी रूप में उपभोक्ता तक पहुंचता है। एक या दो रुपये की बढ़ोतरी किसी एक यात्रा में मामूली लग सकती है, लेकिन जो व्यक्ति प्रतिदिन कार्यालय जाता है और महीने में न जाने कितनी बार यात्रा करता है, उसके लिए यही छोटी बढ़ोतरी धीरे-धीरे एक अलग मासिक खर्च बन जाती है।

सोने की बढ़ती कीमतें भी इसका एक उदाहरण हैं। भारत में सोना केवल एक आभूषण नहीं है। उसे एक तरह से बचत या शादी ब्याह के लिए भविष्य की तरह देखा जाता है। …तो ऐसे समय में एक मध्यवर्गीय परिवार इतने महंगा सोना कैसे खरीद पाएगा?

ऐसे ही एक सितंबर 2026 से टाटा मोटर्स और हुंडई ने अपनी कारों के दाम भी बढ़ा दिये हैं। एक आदमी त्योहारी सीजन और शादी-ब्याह के लिए सोचकर लंबे समय से पैसे जोड़ कर ये सब चीजों को खरीदने के लिए अपनी कमर मजबूत करता ही है कि तब तक उनके दाम और बढ़ जाते हैं।

महंगाई लगातार बढ़ रही है, लेकिन उसके मुकाबले वेतन में होने वाली बढ़ोतरी अक्सर मामूली होती है। यही नहीं, कई लोगों की सैलरियां तो लंबे समय तक नहीं बढ़ती। ऐसे में खर्च तेजी से बढ़ते हैं, जबकि आमदनी लगभग उतनी ही रहती है। यही अंतर मध्यमवर्गीय और वेतनभोगी परिवारों के बजट पर सबसे ज्यादा दबाव डालता है।

महंगाई की सबसे बड़ी चुनौती मध्यमवर्गीय और वेतनभोगी परिवारों के सामने खड़ी होती है। एक वेतनभोगी कर्मचारी की आय आमतौर पर तय होती है। उसे महीने की शुरुआत में एक निश्चित वेतन मिलता है, लेकिन उसका खर्च निश्चित नहीं होता। घर का किराया, बच्चों की पढ़ाई, राशन, दूध, बिजली, पानी, यात्रा, फोन रिचार्ज और ईएमआई (EMI) जैसे कई खर्च पहले से ही उसका इंतजार कर रहे होते हैं। ऐसे में अगर रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं तो उसके सामने आमदनी बढ़ाने का विकल्प तुरंत मौजूद नहीं होता। उसका वेतन अगले महीने अपने आप नहीं बढ़ता, इसलिए उसे खर्चों में बदलाव करना पड़ता है।

मध्यम वर्ग की स्थिति इस मामले में सबसे अधिक मुश्किल है। वह न तो इतना संपन्न होता है कि बढ़ती कीमतों को बिना सोचे स्वीकार कर ले और न ही कई बार उसे ऐसी सहायता मिलती है जो आर्थिक रूप से कमजोर आय वर्ग के लोगों के लिए उपलब्ध होती है। ऐसे लोग ऐसी स्थिति को न तो ठीक से स्वीकार पाते हैं और न ही ठीक से नकार पाते हैं। वह अपनी जिंदगी का अधिकांश हिस्सा हिसाब लगाते हुए बिताता है। महीने की सैलरी आने से पहले ही उसके खर्च तय होते हैं और जब खर्च बढ़ते हैं तो सबसे पहले बचत प्रभावित होती है।

यही बचत बच्चों की पढ़ाई, घर खरीदने, शादी, भविष्य, शौक और किसी आपात स्थिति के लिए जरूरी होती है। जब रोजमर्रा की महंगाई बचत को कम करने लगती है तो उसका असर केवल वर्तमान पर नहीं, बल्कि भविष्य की प्लानिंग पर भी पड़ता है। सवाल सिर्फ इतना है कि वह इसके लिए क्या छोड़ेगा- अपनी बचत, अपनी जरूरतें या अपने सपने? महीने के आखिरी दिनों में एक मध्यमवर्गीय परिवार के बजट में दिखाई देता है और तब समझ में आता है कि छह, सात, आठ और नौ रुपये की रकम कभी इतनी छोटी थी ही नहीं।

(यह लेख कल्याणी चौधरी ने लिखा है। यह इनके निजी विचार हैं। जनसत्ता का इनसे सहमत होना जरूरी नहीं है। कल्याणी जनसत्ता डिजिटल के साथ बतौर इंटर्न जुड़ी हैं)

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