दुनियाभर में युवाओं की नई पौध कहीं अधिक प्रखर और त्वरित कदमों से आगे बढ़ने वाली पीढ़ी है। सोशल मीडिया और स्मार्टफोन के दौर की इस पीढ़ी को आजकल ‘जेन-जेड’ कहा जा रहा है। यही वह नई युवा शक्ति है, जो अपने-अपने देशों में अन्याय और विसंगतियों के विरुद्ध खड़ी हो रही है। कुछ समय पहले पूरी दुनिया ने नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश में उन प्रदर्शनों को देखा, जिनमें हजारों युवा सड़कों पर उतर आए थे। उस समय ऐसा लगा कि बहुत कुछ बदल जाएगा। जो विसंगतियां हैं, अब वे खत्म होंगी। चाहे वह भ्रष्टाचार हो या नेताओं का परिवारवाद या फिर महंगाई और बेरोजगारी जैसी समस्या। मगर ऐसा कुछ देखने को नहीं मिला और इन देशों में ढर्रा वही रहा, जो पहले था। सत्ता परिवर्तनों के बावजूद कोई खास बदलाव सामने नहीं आया।
नई युवा शक्ति का असमानता और अन्याय के खिलाफ उठ खड़ा होना उन देशों के लिए असरदार हो सकता है, जहां स्थिति सचमुच बेहद खराब है और जहां अर्थव्यवस्था जर्जर हो रही है। मगर दिक्कत यह है कि कृत्रिम मेधा और सोशल मीडिया से प्रभावित यह पीढ़ी तत्काल सब कुछ दुरुस्त कर लेना चाहती है। मगर सच तो यह है कि अचानक सड़कों पर उतर जाने से रातों-रात व्यवस्था नहीं बदल जाती। यह पीढ़ी अपनी ताकत का धैर्य और सकारात्मक तरीके से इस्तेमाल करे, तो दुनिया में जो बदलाव वे चाहते हैं, वह संभव हो सकता है। ऐसी स्थिति में इस पीढ़ी की सार्थकता और उसकी ताकत पर दुनिया का भरोसा कायम हो सकता है। मगर अभी ऐसा हुआ नहीं है। इस समय बड़ी चुनौती यह है कि डिजिटल दुनिया से प्रभावित इस शक्ति को अगर सही दिशा नहीं मिली, तो इससे उनका ही नुकसान हो सकता है।
भारत में इस युवा पीढ़ी को सार्थक निवेश के जरिए आगे बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। देश इनका साथ लेकर प्रगति के पथ पर तेजी से अग्रसर होना चाहता है। मगर, ये उम्मीदें आगे कितनी सच होंगी, अभी कुछ कहा नहीं जा सकता। फिलहाल तो करोड़ों युवा बेरोजगार हैं। देश की युवा आबादी कार्ययोग्य है, लेकिन उन्हें काम देने की बजाय अनुकंपा पर जीने की राह दिखाई जा रही है। अगर वे जल्द से जल्द अमीर बनने के लिए दूसरे देशों की ओर पलायन करते हैं, तो वहां से उन्हें किस तरह से स्वदेश वापस भेजा गया है, इसे सभी ने देखा है। अपने देश में तो रोजगार की गुंजाइश बढ़ नहीं रही, ऐसे में युवा करे, तो क्या करें। वहीं इनके सही राह से भटक जाने का जो जोखिम है, इसे कौन समझेगा।
युवा देश की अमूल्य निधि होते हैं। उनके प्रखर और विकासोन्मुख होने की बात कही जाती है। मगर अभी दुनिया के कई देशों में अनुसंधान का निष्कर्ष यह बताता है कि आधुनिक तकनीक अपनाने वाली इस पीढ़ी की मेधा शक्ति पिछली पीढ़ी से कम है। इसकी क्या वजह हो सकती है? इसका कारण यह बताया जाता है कि ‘जेन-जेड’ कहलाने वाली यह पीढ़ी डिजिटल तकनीक पर बहुत अधिक निर्भर है। स्वयं खोज करने या अनुसंधान करने की बजाय उन्हें पहले से तैयार सब चीजें चाहिए। कई बार उनमें मौलिकता नहीं दिखाई पड़ती। उनमें कितनी संभावनाएं हैं, यह सामने आना अभी बाकी है। कहा जा रहा है कि भारत कृत्रिम मेधा और डिजिटल दुनिया में तेज गति से आगे बढ़ रहा है, लेकिन यह साफ है कि नई पीढ़ी मेधा और स्मृति के मामले में पिछली पीढ़ी जितनी भी नहीं दिखाई देती है।
समस्या सुलझाने का उनका तरीका त्वरित बेशक हो, लेकिन वह ठोस और व्यावहारिक नहीं होता। बड़े-बुजुर्ग जटिल से जटिल समस्याओं का धीरज से सामना करते हुए न केवल उन्हें सुलझाने में कामयाब हो जाते थे, बल्कि एक नया पैमाना भी बना देते थे। वहीं आज की युवा पीढ़ी संक्षिप्त वीडियो से स्वयं को प्रशिक्षित करने और इसी से रास्ता तलाशने में लगी रहती है। अध्यापकों के साथ आमने-सामने बातचीत अब होती नहीं। नतीजा बच्चों की बौद्धिक क्षमता घटने लगी है।
देश में तकनीक के अधिक इस्तेमाल के कारण किसी में स्वयं खोज करने की पहल नहीं दिखाई देती। शोध विशेषज्ञों के मुताबिक, पिछले पचास- साठ साल में जैसे-जैसे भारत सहित पूरी दुनिया में तकनीक का उपयोग शिक्षा क्षेत्र में बढ़ा है, बच्चों में सीखने की क्षमता घट गई है। मगर जो बच्चे प्रौद्योगिकी का कम या बिल्कुल इस्तेमाल नहीं करते, उनके परिणाम उन बच्चों से बेहतर हैं, जो डिजिटल सुविधा पर निर्भर हैं।
भारत समेत पूरी दुनिया में कृत्रिम मेधा का बोलबाला हो गया है। सब जगह कागज रहित कार्य संस्कृति विकसित होने लगी है। दूसरी ओर इसी नई तकनीक का नतीजा है कि अब पुस्तकों के जरिए कम और स्मार्ट फोन, लैपटाप एवं कंप्यूटर पर शिक्षा देने का चलन बढ़ रहा है। कारण यह है कि युवा पीढ़ी यानी जेन-जी डिजिटल ताकत का इस्तेमाल करती है। वे कहीं अधिक आत्मविश्वासी हैं। उनको लगता है कि वे हर चीज जानते हैं। उनके पास सभी सूचनाएं उपलब्ध हैं। बच्चों को हम स्मार्टफोन तो दे रहे हैं, लेकिन उनकी मौलिकता कम होती जा रही है। डिजिटल दुनिया की इस अपार ताकत ने एक नए खतरे को जन्म दिया है।
अब कहा जा रहा है कि तकनीक में तरक्की तो कीजिए, लेकिन इस पर नियंत्रण भी रखिए। विशेषज्ञों ने इस पूरे परिदृश्य पर चिंता जताई है। गौरतलब है कि एक समय में पूरी दुनिया इस डिजिटल ताकत से बेहद प्रभवित थी। अब उसका असर घटने लगा है। कुछ देश तो तकनीक के बेतहाशा उपयोग से अब पीछे हटने लगे हैं। स्वीडन ने हाल ही में विद्यालयों में डिजिटल उपकरणों को हटा कर फिर से कागज-कलम और किताबों की ओर लौटने का फैसला किया है। फ्रांस, नीदरलैंड, ब्रिटेन और फिनलैंड जैसे देशों में स्कूलों में लैपटाप और टैबलेट के इस्तेमाल को अब सीमित किया जा रहा है।
यूनेस्को की एक रपट के मुताबिक, शिक्षा में तकनीक का अधिक इस्तेमाल ठीक नहीं है। इसे सीखने में मदद करने तक ही सीमित रखना चाहिए, न कि पथ निर्देशक बनने देना चाहिए। इसके नकारत्मक प्रभाव अब सामने आ रहे हैं। हाल में गाजियाबाद में जो घटना हुई है, उससे भी सबक लिया जा सकता है, जहां तीन नाबालिग बहनों ने आभासी दुनिया में गुम होकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। यह घटना एक उदाहरण भर है। पहले भी डिजिटल लत के कारण ऐसी घटनाएं होती रही हैं।
दरअसल, हमारी नई पीढ़ी सपने में जीने लगी है। उनकी ताकत डिजिटल की बैसाखियों पर निर्भर है। जो ताकत दुनिया को सशक्त करने के लिए बनाई गई थी, वह नौजवानों को एक काल्पनिक जगत में कैद कर रही है। अब वे घंटों कंप्यूटर के सामने या स्मार्टफोन लेकर बैठे रहते हैं। युवा आभासी दुनिया को सच मान कर जीवन की वास्तविकताओं से दूर जाकर एक ऐसी जिंदगी जीने लगते हैं, जिसका वजूद उनकी कल्पना में तो है, लेकिन असल जिंदगी में कहीं नहीं। नई पीढ़ी यानी ‘जेन-जेड’ के उभरने और संवरने से पहले ही डिजिटल की ताकत उसे यथार्थ से दूर ले जा रही है। इस पर नियंत्रण तो किसी सीमा तक करना ही होगा, ताकि वह नई पीढ़ी के लिए चुनौती न बन जाए।
