एक देश, एक चुनाव- का मुद्दा केवल चुनावी सुधार के सवाल तक नहीं बल्कि क्षेत्रीय दलों के भविष्य से भी जुड़ गया है। बिहार चुनाव से पहले जब केन्द्र की भाजपा सरकार ने जाति जनगणना कराए जाने का फैसला लिया था। कांग्रेस और विपक्षी दल खासकर राष्ट्रीय जनता दल और समाजवादी पार्टी ने इसका क्रेडिट खुद लिया। लेकिन पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद ऐसा लग रहा है कि उत्तर प्रदेश चुनाव में विधानसभा चुनाव होने से पहले ही देश का लोकतांत्रिक सिस्टम दो दलीय हो जाएगा।
मैं ऐसा इसलिए नहीं कह रहा हूं कि आठ जून को इंडिया गठबंधन की बैठक में समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने कांग्रेस को सलाह दी कि उसे क्षेत्रीय दलों के महत्व को स्वीकार करना चाहिए,क्योंकि भाजपा के खिलाफ लड़ाई में क्षेत्रीय दलों की भूमिका निर्णायक है। बैठक के बाद जो मीडिया रिपोर्ट आई हैं उसके हिसाब अखिलेश यादव ने कहा कि क्षेत्रीय दल खुले तौर पर कहते हैं कि वे कांग्रेस के साथ गठबंधन में हैं, लेकिन कांग्रेस अक्सर अपने सहयोगी दलों का उसी तरह उल्लेख नहीं करती। और अखिलेश यादव ने कांग्रेस को बड़ा दिल दिखाने को कहा है।
आप कह सकते हैं कि मैं यह टिप्पणी जल्दी कर रहा हूं। लेकिन आपको यह लेख पढ़ते हुए यह याद रखना होगा कि इंडिया गठबंधन की बैठक में आम आदमी पार्टी नहीं पहुंची थी जो पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए सिरदर्द है। आम आदमी पार्टी की जन्मभूमि दिल्ली के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव कांग्रेस के खिलाफ प्रचार किए थे। चलिए, आप कह सकते हैं, कि दिल्ली व उत्तर प्रदेश की राजनीति अलग है। लेकिन सवाल ये नहीं है कि दिल्ली, पंजाब और उत्तर प्रदेश के समीकरण क्या हैं? सवाल ये है कि बिहार, पश्चिम बंगाल के चुनावों के बाद क्या देश दो दलीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की तरफ बढ़ रहा है।
अब आठ जून की रात इंडिया गठबंधन के सुपर स्टार राहुल गांधी जी का एक्स पोस्ट का संज्ञान लीजिए, रात 9.30 पर अपने पोस्ट में राहुल गांधी लिखते हैं कि “यूसुफ पठान को गुजरात से अधीर रंजन के खिलाफ चुनाव लड़ाने के लिए एयरलिफ्ट किया गया था। अधीर रंजन को हराने में ममता बनर्जी और भाजपा की राजनीतिक मशीनरी ने मिलकर भूमिका निभाई थी। यूसुफ पठान को लेकर यह धारणा लंबे समय से रही है कि वे मोदी के करीबी माने जाते हैं।”
अब अखिलेश यादव और ममता बनर्जी के बीच का समन्वय को समझते हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने यूपी में अपने कोटे से तृणमूल कांग्रेस को भदोही सीट दी थी जहां ललितेश पति त्रिपाठी टीएमसी के कैंडिडेट थे। ललितेश कांग्रेस के दिग्गज नेता कमलापति त्रिपाठी के परपौत्र हैं। और कांग्रेस से विधायक रहे हैं। बनारस में कांग्रेस का पर्याय रहा इनका परिवार अजय राय के उत्थान से नाराज होकर टीएमसी चला गया। ममता बनर्जी की हार के बाद अखिलेश यादव सॉलिडैरिटी में कलकत्ता पहुंचते हैं और कांग्रेस पर तंज करता हुआ एक पोस्ट करते हैं-हम मुश्किल में साथ नहीं छोड़ते हैं।
राजनीतिक पंडित भले ही बैठक में अखिलेश यादव की टिप्पणी को केवल कांग्रेस की आलोचना ना माने,और मान लेते हैं कि राजनीति में मोल भाव का अपना तरीका होता है। लेकिन इंडिया गठबंधन की बैठक में क्षेत्रीय दलों की बेचैनी और बैठक खत्म होने की चंद घंटों बाद ही राहुल गांधी का ममता बनर्जी को सीधे तौर पर भाजपा का एजेंट बताना। सिर्फ सीटों की तौलाई नहीं है बल्कि क्षेत्रीय दलों के भाजपा विरोधी छवि के खिलाफ बड़ा नैरेटिव स्थापित करने का संकेत भी है। बहुत संभव है कि आने वाले कुछ दिनों में राहुल गांधी अरविन्द केजरीवाल और उनकी पार्टी पर भी भाजपा का एजेंट होने का आरोप लगाए। यह वो संकेत है जो दो- दलीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की तरफ इशारा करते हैं।
इस बैठक के बाद यह तो तय है कि पंजाब विधानसभा चुनावों में भाजपा-कांग्रेस-आम आदमी पार्टी अलग अलग चुनाव लड़ेंगे। लेकिन राघव चड्ढा और कैप्टन अमरिंदर सिंह के भाजपा के पाले में आने के बाद समीकरण अभी और बदलेंगे। लेकिन उत्तर प्रदेश में क्या होगा? क्या समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन रहेगा या कांग्रेस किसी और दल के साथ संभावना तलाश रही है। चूंकि 2024 के लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन बेहद सफल रहा था। दोनों दलों ने मिलकर भाजपा को कड़ी चुनौती दी और राज्य में विपक्ष की वापसी का आधार तैयार किया। इसलिए मुमकिन नहीं है कि दोनों दल गठबंधन तोड़े। लेकिन सीट बंटवारे पर खींचतान आखिरी तक जारी रहेगी। ठीक इलास्टिक की तरह, वह किस प्वाइंट पर टूटेगी ये कोई नहीं जानता है, या फिर खींचतान में लचीली हो जाए। दोनों ही स्थिति में कांग्रेस को फायदा होगा। टूट गई तो सपा खत्म और लचीली रही तो कांग्रेस को यूपी में फैलने का मौका मिलेगा। और दो-दलीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की राह आसान होगी।
ऐसे में पंजाब और उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों से पहले यदि केन्द्र सरकार परिसीमन एक्ट पारित करा लेती है। चूंकि संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार देशव्यापी परिसीमन 2026 में होने वाली पहली जनगणना के प्रकाशित आंकड़ों पर आधारित होना है। सुप्रीम कोर्ट का भी आदेश दिया है कि 2027 की जनगणना के आंकड़े आने से पहले देशव्यापी परिसीमन नहीं हो सकता। इन सबको देखते हुए तो यही लगता है कि 2029 का लोकसभा चुनाव परिसीमन के बाद 850 सीटों पर होगा। और संभव है कि फरवरी 2027 में संभावित पंजाब, उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव 6 महीने के लिए स्थगित हो जाए।
(डिस्क्लेमर: इस लेख में लेखक के निजी विचार हैं। जनसत्ता का इनसे सहमत होना जरूरी नहीं है।)
