धीरे-धीरे देह की सीढ़ियां चढ़ती है उम्र। आहिस्ता-आहिस्ता दीमक समय कुतरता है हड्डियों को। त्वचा सिकुड़ती है बगैर किसी शोर-शराबे के। आंखों की रोशनी बुझने लगती है। ऐसा नहीं होता कि अचानक कोई सुबह उठे और देखे कि वह बूढ़ा हो गया है। ऐसी ही है जीवन की सांझ। इसकी आहट किसी कैलेंडर की तारीख से नहीं, बल्कि आईने से झांकते उस खामोश सच से आती है, जिसमें हमें अक्सर ‘जेरंटाफोबिया’ या बुढ़ापे का डर दिखाई देता है।

यह डर वक्त के बीतने का नहीं, जितना कि अपने वजूद के धीरे-धीरे सिकुड़ने का है। हम घबराते हैं कि व्यक्तिगत पहचान की जिस इमारत को हमने ताकत, सौंदर्य और उपयोगिता की ‘मजबूत’ चट्टान पर बनाया था, वह कहीं भविष्य की धुंधली अनिश्चितता में ढह न जाए।

इस डर की गहराई को समझने के लिए उस ढांचे को देखना चाहिए, जो हमने अपने ‘अहंकार’ के इर्द-गिर्द बनाया है। दुनिया हमें सिखाती है कि हमारे होने का अर्थ है लगातार कुछ करते रहना और बराबर लोगों को आकर्षित करना। जब देह के पहिये घिसने लगते हैं, तो मन में एक अजीब शोक उतरने लगता है।

मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक, बुढ़ापे की चिंता अक्सर अपनी स्वायत्तता को खोने से जुड़ी होती है। बचपन में होने वाले भय का एक दिलचस्प और दर्दनाक विलोम है यह। एक बच्चा अंधेरे में खो जाने से डरता है। बुजुर्ग समाज की भीड़ में ओझल हो जाने से और अपनों पर ही ‘बोझ’ बन जाने से डरता है। जिस दुनिया में सिर्फ नवीन, शक्तिशाली और गतिमान को पूजा जाता है, वहां ‘पुराना’ अक्सर हाशिये पर धकेल दिया जाता है।

उम्र का लिहाज पहले हमारी संस्कृति का हिस्सा था

उम्र का लिहाज पहले हमारी संस्कृति का हिस्सा था, वृद्ध लोगों की इज्जत करना बचपन से ही सिखाया जाता था। पश्चिम की संस्कृतियां यौवन की तारीफ करते नहीं थकतीं। वृद्ध वहां अनुपयोगी हो जाता है। अर्थव्यवस्था पर एक बोझ और किसी काम के लिए अनुपयुक्त। अक्सर हम झुर्रियों से सिर्फ इसलिए नहीं डरते कि वे खराब दिखती हैं, बल्कि इसलिए कि वे समाज के लिए हमारी ‘अनुपयोगिता’ का प्रतीक बन जाती हैं।

साहित्य ने हमारे इस डर बखूबी बयान किया है। आस्कर वाइल्ड के कालजयी उपन्यास ‘द पिक्चर आफ डोरियन ग्रे’ में डोरियन का डर मौत से ज्यादा ‘बदलाव’ को लेकर है। वह जानता है कि उसकी शक्ति उसकी शीशे जैसी चिकनी त्वचा में है। उसका चित्र, जो लगातार बूढ़ा और बदसूरत होता जाता है, इसी बात का प्रतीक है कि हम अपने भीतर के डर को चाहे कितना भी छिपा लें, समय की सुइयां किसी के लिए नहीं रुकतीं।

शेक्सपियर के ‘किंग लियर’ की त्रासदी सिर्फ सत्ता को नहीं, बल्कि उस गरिमा को खोने में है, जो उसे समाज में ‘प्रासंगिक’ बनाए रखती थी। उसकी चीख दरअसल संज्ञानात्मक पतन और स्मृति के धुंधलाने का वह डर है, जो हर इंसान को सताता है। मुक्तिबोध की कविताओं में बुढ़ापा एक ‘अंधेरे’ की तरह आता है और यह ‘समझौते’ का पर्याय है, जिससे वे सबसे ज्यादा डरते हैं।

साहित्य हमारे जख्मों को दिखाता है, धर्मग्रंथ उन पर मरहम लगाते हैं

जहां साहित्य हमारे जख्मों को दिखाता है, वहीं धर्मग्रंथ उन पर मरहम लगाते हैं। कई बार वे ढलते शरीर को एक ‘टूटते हुए मकान’ के रूप में नहीं, बल्कि एक परिपक्व होते आत्म के रूप में देखते हैं। बाइबिल के ‘एक्लेसिएस्टेस’ में बुढ़ापे का वर्णन बहुत ही बेबाक और सच्चा है। वहां शरीर को एक ऐसे घर की तरह बताया गया है, जिसकी खिड़कियां (आंखें) धुंधली हो गई हैं और पहरेदार (हाथ) कांप रहे हैं।

मगर इसे दुख की तरह नहीं, बल्कि एक ‘पवित्र उल्टी गिनती’ की तरह पेश किया गया है। वृद्ध का दिखना राजकुमार सिद्धार्थ के लिए वैराग्य और नवीन अंतर्दृष्टि का कारण बना। बुढ़ापा उनके लिए ‘अनित्यता’ या अनिक्क का संदेश लेकर आता है।

आज का मनोविज्ञान बुढ़ापे के बारे में एक सकारात्मक कहानी भी सुनाता है। जिसे हम ‘कमी’ समझते हैं, वह अक्सर एक बहुत बड़ी ‘उपलब्धि’ होती है। जैसे-जैसे लोगों की उम्र बढ़ती है, लोग उन रिश्तों को छोड़ देते हैं, जो केवल औपचारिक या दिखावे मात्र के होते हैं। वे अपना समय और ऊर्जा केवल उन लोगों पर खर्च करते हैं, जिनसे उन्हें सच्चा प्रेम मिलता है।

बुढ़ापे में भले ही सीखने की गति कम हो जाए, लेकिन जीवन भर का संचित अनुभव एक ऐसी बुद्धिमत्ता को जन्म देता है, जो युवाओं के पास नहीं होती। यह समस्याओं को सुलझाने की वह जादुई क्षमता है, जो केवल वक्त के साथ आती है। समाजशास्त्री लार्स टार्नस्टैम के अनुसार, बुढ़ापे में व्यक्ति भौतिकवादी दुनिया से ऊपर उठकर एक ‘ब्रह्मांडीय’ नजरिया अपना लेता है। वह अब खुद को केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि इस अनंत ब्रह्मांड का एक हिस्सा मानने लगता है।

देखा जाए तो, बुढ़ापा सिर्फ बंद होते दरवाजों और खिड़कियों का नाम नहीं, बल्कि एक नए नजरिए के खुलने का भी संकेत है। यह वह समय है, जब हम ‘नायक’ बनने की होड़ को एक तरफ सरका कर जीवन के द्रष्टा बन जाते हैं।

अथर्ववेद की प्रार्थना ‘पश्येम शरद: शतम्’ (हम सौ शरद ऋतुएं देखें) हमें सिखाती है कि लंबी उम्र एक सजा नहीं, बल्कि एक अवसर है। अगर जीवन एक उपन्यास जैसा है, तो बुढ़ापा उसका अंतिम अध्याय नहीं, बल्कि उसका सार है- वह क्षण, जहां कहानी के सभी बिखरे हुए तार एक सुंदर स्वरूप में जुड़ जाते हैं। बालों का सफेद होना सिर्फ रोशनी का कम होना नहीं, बल्कि आत्मा का स्वच्छ होना भी है।

बुढ़ापा नए डर लाता है और नए अवसर भी। यह पूरी तरह हम पर निर्भर करता है कि हम चुनते क्या हैं। बुढ़ापा इस बात का सबूत है कि हमने दिन की तपिश को झेला है, ताकि सांझ की शीतलता तक पहुंच सकें। भागदौड़ से निकलकर अब हम लहरों की उस लय में भी शामिल हो जाते हैं, जहां शांति ही संगीत है। झुर्रियों से भरी देह और क्लांत मन के पास भी शायद इस चयन की ऊर्जा तो बचती ही है।

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