पिछले सप्ताह एक ऐसी घटना घटी जिसको लेकर सारे देश को शर्मिंदा होना चाहिए। ओडिशा के केओंझर जिले में एक गरीब आदिवासी अपनी बहन की लाश को कब्र में से निकाल कर उसे अपने कंधों पर रख कर उस बैंक तक ले गया जहां उसके खाते में उन्नीस हजार रुपए थे। वहां पहुंचने के बाद उसको कहा गया कि पैसे तभी मिलेंगे, जब बहन का मृत्यु प्रमाणपत्र पेश होगा। जाहिर है कि एक आदिवासी गांव में इस तरह के दस्तावेज मुश्किल से मिलते होंगे, तो बैंक के अफसरों से बहस करने के बाद जीतू मुंडा तंग आकर अपनी बहन का कंकाल लेकर बैंक पहुंच गया।

बहन के कंकाल को जब वह लेकर जा रहा था, तो रास्ते में कई लोगों ने इस बेहाल व्यक्ति का वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर डाला और यहां से फिर समाचार चैनलों पर यह वीडियो पहुंचा। मैंने उसको जब देखा, तो इतनी शर्मिंदा हुई कि इसके बारे में मैंने ‘एक्स’ पर लिखा यह कहते हुए कि इतनी छोटी रकम के लिए किसी गरीब आदमी को क्यों इतनी तकलीफ उठानी पड़ी। यह चर्चित हुआ, लेकिन हिंदुत्ववादियों को इसमें देश को बदनाम करने की साजिश दिखी और मुझे गालियां देते हुए कहने लगे कि मेरे जैसे पत्रकार हमेशा भारत को बदनाम करने में लगे रहते हैं।

मेरी राय में देश के असली गद्दार वे लोग हैं जो स्वीकार करना नहीं चाहते हैं कि देश की तरक्की जरूर हुई है, लेकिन यह तरक्की उन तक नहीं पहुंची है अभी तक जिनको तरक्की की सबसे ज्यादा जरूरत है और वह इसलिए कि हमारे शासक इतनी दूरी बना चुके हैं आम जनता से कि जानते ही नहीं हैं कि उनके नियम-कानून इतने पेचीदा हैं कि ये अनपढ़-गरीब लोगों की सहायता करने के बदले उनको हानि पहुंचाते हैं। मृत्यु प्रमाणपत्र हासिल करना आसान नहीं है शिक्षित मध्य वर्ग के लोगों के लिए भी, तो कल्पना कीजिए कि कितना मुश्किल होता होगा उन लोगों के लिए जो अशिक्षित हैं।

प्रधानमंत्री ठीक हैं जब कहते हैं कि उनके दौर में बैंकों के दरवाजे उन लोगों के लिए खोले गए हैं, जिन्होंने बैंक के अंदर झांक कर नहीं देखा था कभी, लेकिन अब नौबत आई है उन चीजों के बारे में सोचने की, जिनके बारे में शायद ही हमारे शासक सोचते हैं। मेरे जैसे शिक्षित लोगों के लिए भी केवाईसी के बारे में जब बैंक से मांग आती है, तो बिना किसी की मदद लिए मैं बैंक को यह जानकारी दे नहीं पाती हूं। जो हाल ओडिशा के जीतू मुंडा का हुआ था, वह हाल कई लाख भारतीयों का होता है रोज जब भी किसी सरकारी काम के लिए निकलते हैं।

इस बदनसीब आदिवासी की कहानी में बहुत कुछ और भी है जिनकी तरफ हमारे राजनेता जब तक ध्यान नहीं देंगे, विकास की गाड़ी जहां है आज, वहीं अटकी रहेगी। पिछले सप्ताह अर्थशास्त्री रुचिर शर्मा ने इंडियन एक्सप्रेस अड्डा कार्यक्रम में स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत की तरफ अब दुनिया के निवेशक देख ही नहीं रहे हैं, इसलिए कि अभी भी कारोबार करने के लिए इतनी लालफीताशाही से जूझना पड़ता है कि निवेशक तंग आकर उन देशों में चले जाते हैं जहां नियम-कानून पेचीदा नहीं हैं।

पीएम बोले थे- निवेशकों के लिए लालफीताशाही के बदले लाल कालीन बिछाई जाएगी

नरेंद्र मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने थे, तो याद है मुझे कि जब वाशिंगटन में निवेशकों से मिले थे, तो उन्होंने उनको आश्वासन दिया था कि उनके दौर में भारत ऐसा देश बनेगा जिसमें निवेशकों के लिए लालफीताशाही के बदले लाल कालीन बिछाई जाएगी। अफसोस कि ऐसा हुआ नहीं है और वह इसलिए कि हमारे सरकारी अधिकारी अच्छी तरह जानते हैं लालफीताशाही की उलझनों से कितने पैसे बन सकते हैं सबके लिए। लालफीताशाही के चक्रव्यूह से ऊपर से नीचे तक पैसे बनते हैं सरकारी कर्मियों के, लेकिन जो नुकसान होता है देश का, वह बेहिसाब है।

वापस लौटना चाहती हूं जीतू मुंडा की कहानी पर, क्योंकि इस एक कहानी के पहलू अनेक हैं। पहला तो यह कि जब गरीब आदिवासियों के लिए अनिवार्य किया जाता है नियम-कानून पालन करना, तो कम से कम इतना तो होना चाहिए कि पंचायतों तक इन नियमों की जानकारी हो। सरपंच को अगर मालूम होता कि मृत्यु प्रमाणपत्र कैसे मिलता है और कहां से, तो जीतू मुंडा को बैंक में इतनी तकलीफ नहीं उठानी पड़ती। इस कहानी का दूसरा पहलू यह है कि इससे मालूम पड़ता है कि गरीबी कितनी है अपने देश में कि उन्नीस हजार रुपए इतने महत्त्व रखते हैं। प्रधानमंत्री कभी कहा करते थे कि उनकी राय में भारत के गरीब होने का कोई कारण नहीं है।

सच पूछिए तो ऐसा मैं भी मानती हूं। मैंने कई बार लिखा है कि अगर हमारे शासकों ने समाजवाद के नाम पर गलत आर्थिक रास्ता न लिया होता, तो शायद भारत आज थाईलैंड और मलेशिया जैसे देशों की श्रेणी में पहुंच गया होता। यह भी याद रखना चाहिए कि कभी भारत का आर्थिक हाल चीन से अच्छा था। फिर डेंग शियाओ पिंग बने हमारे पुराने दुश्मन देश के नेता और उन्होंने तय किया कि समृद्धि जैसे भी आए उसको लाया जाए, चाहे कम्युनिस्ट विचारधारा को कूड़ेदान में फेंकना हो। ऐसा ही किया उन्होंने। चीन की अर्थव्यवस्था में विदेशी निवेशकों के लिए दरवाजा खोला गया। देखते ही देखते चीन बदल गया और आज विश्व की दूसरी बड़ी आर्थिक शक्ति बन गया है।

रही बात हमारी, तो गरीबी हटाने के नाम पर हम आज भी समाजवादी विचारधारा से जुड़े रहे हैं, जिसका असली लाभ मिलता है सरकारी अफसरों और राजनेताओं को, जिनको न कारोबार चलाना आता है और न ही उनको चलाना चाहिए। मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में परिवर्तन लाने के आसार दिखाए थे, लेकिन फिर लौट आए वही पुराने रास्ते पर।

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सुबह के 7 बजने से पहले ही 25 साल की सर्मिष्ठा साहू अपने दिन की शुरुआत कर देती हैं। ओडिशा के खुर्दा जिले के बनमालीपुर गांव जाने से पहले वो पूरी तैयारी कर लेती हैं। यानी बैग में दो पानी की बोतलें, कुछ ओआरएस के पैकेट, जरूरी कागजात और जनगणना विभाग से मिली एक कैप। तेज धूप और गर्मी से लड़ने के लिए ये सब उनके रोज के साथी हैं। सर्मिष्ठा बताती हैं, “जब देश में पिछली जनगणना हुई थी, तब मैं सिर्फ 10 साल की थी। अब इस काम का हिस्सा बनना अच्छा लगता है। 15 मई तक सर्वे पूरा करने का दबाव है, लेकिन यह राष्ट्रीय जिम्मेदारी है, और हमें इसे करना ही है।” पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक