हर संवाद में शब्द हों, यह जरूरी नहीं। कभी-कभी संवाद स्वयं के और दूसरे छोर पर जो है, उसके मौन के बीच एक तरह का अवलोकन होता है। ऐसा संवाद भाषा की सीमाओं को लांघकर अंतस की ऐसी गहराइयों तक पहुंचता है, जिसकी खबर भी नहीं लग पाती। प्रकृति के साथ कुछ इसी तरह का संवाद होता है। हम शोर के युग में जीते हैं, जहां हर पल कुछ न कुछ सुनाई देता है। सन्नाटा हमसे छीन लिया गया है। एकांत किसी शातिर चोर की सेंधमारी में लुट गया है। मन को कभी विश्राम नहीं मिलता। उसे बार-बार छेड़ा जाता है, उकसाया जाता है। जैसे तांगे से बंधे किसी थके हुए घोड़े को जबरदस्ती दौड़ाया जा रहा हो।
इस संस्कृति में उत्पादकता इतनी कीमती हो गई है कि स्थिरता को ही आलस्य समझ लिया गया है। चुपचाप बैठने को समय की आपराधिक बर्बादी कहा जाता है। मगर इस शोर के नीचे हमारा कोई आवश्यक और कीमती हिस्सा क्लांत होने लगता है। वह हिस्सा, जो सपनों से बना है, जो बचपन की यादों में छिपा है और जो बस सिर्फ प्रकृति की गोद में ही सांस लेता है। हम भूल गए हैं कि थकान केवल शरीर की नहीं, मन की भी होती है।
प्रकृति के साथ मौन संवाद का अर्थ जीवन से पलायन करना नहीं है। मनोवैज्ञानिक थकान की, तंत्रिका-तंत्र की निरंतर सतर्कता की बात करते हैं, जो हमें हमेशा सतर्क स्वरूप में रखती है, थका डालती है। मगर इन तकनीकी शब्दों के आने से बहुत पहले मनुष्य जानता था इसका इलाज। हम जंगलों, नदियों, पर्वतों की ओर जाते थे। प्रकृति की शांत उपस्थिति में मन की पकड़ ढीली पड़ने लगती है। सांसें गहरी होती हैं, अंतस में थोड़ी जगह बनती हुर्इं महसूस होती है। दिन भर की चिंताएं, अधूरी बातें, अनकहे शब्द-जो कुछ भी बिखरा हुआ था, वह खुद को समेटने लगता है। प्रकृति कोई अपेक्षा नहीं रखती है। नदी हमारी राय नहीं मांगती। वह बस बहती रहती है। पंछी हमें किसी तरह का दिखावा करने को नहीं कहते। वे गाते हैं अपनी ही स्वाभाविक खुशी में। फूल खिलता है बिना तारीफ की प्रतीक्षा किए। बाहरी दबाव न हों, तो मन खुद ही चंगा होने लगता है, जैसे किसी घाव पर मरहम लगने से दर्द कम होने लगता है।
जो कुछ भी अतिरिक्त है वह इस मौन संवाद में घुल जाता है। बस आवश्यक बचा रह जाता है। अचानक महसूस होता है कि हमारा मानसिक शोर कितना अनावश्यक है, बेहोशी के क्षणों में बटोर लिया गया है, साझी विरासत में मिला गया है- दूसरों की अपेक्षाएं, समाज की अंधाधुंध भाग-दौड़, खुद से गढ़ी हुई कहानियां- कितना बोझ है इनमें। प्रकृति के साथ मौन संवाद में कुछ ऐसा सुनाई पड़ता है, जो सूक्ष्म और महीन है। एक झीनी-सी आंतरिक स्पष्टता दिखती है, जो अनावश्यक जिम्मेदारियों के नीचे कहीं दब गई थी। यह बचपन में हमारे पास थी, जब हम बिना किसी कारण खिलखिलाते थे, शोर से सहम जाते थे, द्वेष से मुक्त थे। जब मन निर्मल था, नकारात्मकता से मुक्त था।
मौन में प्रकृति हमारा मनोरंजन नहीं करती, वह हमारे भीतर छिपे सच को सामने लाती है। हवा में कांपता पत्ता हमारी क्षणभंगुरता का आईना बन जाता है। हम भी वैसे ही हैं, जैसी ये पत्तियां! पर्वत की स्थिरता हमारे निरंतर संघर्ष की व्यर्थता दिखाती है। भागते-हांफते इंसान पर वे एक मूक बयान हैं। कुदरत के साथ ये शांत मुलाकातें भावुक नहीं, परिवर्तनकारी होती हैं। वे अपमान किए बगैर विनम्रता सिखाती हैं, स्वामित्व का भाव जताए बिना संबंधित होने का अर्थ समझाती हैं। बगैर डांट-डपट के शिष्टता सिखाती हैं। इस मौन संवाद में थोड़ा बैठें, तो एक गहरे संबंध का बोध होता है- वृक्ष केवल फर्नीचर बनाने वाला काठ नहीं रहता, नदी केवल उपयोगी पानी नहीं रह जाती, जंगल केवल संसाधन नहीं रहता। प्रकृति के साथ परिचय हमें सबकी परवाह करना सिखाता है। यह गहरा जुड़ाव बौद्धिक जानकारी से नहीं, प्रकृति की शांत उपस्थिति से जन्म लेता है।
हमारा पर्यावरणीय संकट केवल तकनीकी नहीं, बल्कि संबंध की विफलताएं हैं, यह याद रखना जरूरी है। हमने कुदरत का शोषण करना सीख लिया है, पर उसे सुनना भूल गए। हम जंगल काटते हैं बगैर प्रकृति की सांस को महसूस किए। नदियों में जहर डालते हैं, बिना उनकी पीड़ा समझे। प्रकृति का मौन सान्निध्य इन दूरियों को कम करता है। यह याद दिलाता है कि धरती मानवीय महत्त्वाकांक्षाओं की युद्धभूमि नहीं, बल्कि एक जीती-जागती, सुंदर वास्तविकता है और हम उसका अभिन्न हिस्सा हैं। हमारी सांसें उसके साथ जुड़ी हैं, हमारा रक्त, मांस-मज्जा उससे ही बना है।
इस मूक संवाद के लिए कुछ सरल अभ्यास उपयोगी हो सकते है। हमें दुर्गम तीर्थयात्राओं की जरूरत नहीं। एक पार्क की बेंच, आकाश का नन्हा-सा टुकड़ा, सुबह का शांत बरामदा ही काफी है। हम थोड़ी देर के लिए छोटी-बड़ी स्क्रीन छोड़ दें। बैठें। अपनी तस्वीरें न लें, सोशल मीडिया में न उलझें। सुबह पक्षियों की आवाजें सुन लें। बोरियत आती है, तो उसे आने-जाने दें। धीरे-धीरे कुछ बदलने लगता है। जो पहले खाली लगता था, वह अब किसी अनुभूति में परिवर्तित होने लगता है।
मन में जगह बनती है, जैसे बादलों के हटने पर आकाश साफ हो जाता है। अभिव्यक्ति की आदिम हठी आदत को ऐसा मौन क्रांतिकारी प्रतीत होता है। उत्पादन के जुनूनी अर्थतंत्र में किसी वृक्ष के नीचे चुपचाप बैठना एक बगावत है। मगर समय का यह ऐसा सदुपयोग है, जिसे मापा नहीं जा सकता। प्रकृति का साथ का हमें अपनी सही औकात दिखाता है- हम इतने छोटे हैं, ब्रह्मांड इतना बड़ा, यह याद दिलाता है। मौन अनुपस्थिति या पलायन नहीं, वह वास्तविक अर्थ में एक गहरी उपस्थिति है, एक सामीप्य है, जहां धरा कुछ न कहकर भी सबसे स्पष्ट बोलती है। बस हम ही नहीं सुनते।
