ध्याननाथ कार्तिक एमबी द्वारा लिखित

मेरे लिए राजनीति कभी भी ताकत, पद या फिर निजी फायदे के लिए नहीं थी। यह विचारधारा, भरोसा और उन लोगों के साथ खड़े होने को लेकर थी, जो सबसे अहम मौकों पर सिद्धांतों के लिए खड़े रहे।

मैं उन लाखों युवाओं में से हूं जो राहुल गांधी के विचारधारा और साहस से प्रेरित और राजनीतिक रूप से जगे हैं। साल 2019 से मैंने उनकी राजनीति की करीब से देखा और मेरा मानना था कि वे इस देश के युवाओं के लिए एक नई लोकतांत्रित आवाज का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनके भाषण, तानाशाही के खिलाफ उनकी दृढ़ता और मुश्किल समय में लोगों के बीच चलने की उनकी तत्परता ने मुझे गहराई से प्रभावित किया।

‘नेतृत्व ने जिम्मेदारी सौंपी’

इस भरोसे ने मुझे 2024 के दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र यूनियन (DUSU) चुनावों के दौरान दिल्ली पहुंचाया, जहां मैंने एनएसयूआई के लिए काम किया और अध्यक्ष पद के उम्मीदवार रौनक खत्री के लिए जोर-शोर से प्रचार किया। उनकी जीत मेरे जैसे कई युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए गर्व का क्षण था। चुनाव के बाद जब एनएसयूआई तमिलनाडु में राज्य सचिव का पद खाली हुआ तो मैंने आवेदन किया। नेतृत्व ने मेरी लगन और संगठनात्मक कार्य की सराहना की और मुझे यह जिम्मेदारी सौंप दी।

मैंने पद को प्रतिष्ठा के लिए नहीं स्वीकारा बल्कि इसलिए कि मैं आंदोलन में विश्वास करता था। हालांकि आज भारी मन से मैंने इस पद से इस्तीफा दे रहा हूं।

‘जब हर किसी ने बनाई दूरी तब स्टालिन साथ खड़े रहे’

मेरा इस्तीफा गुस्सा, घृणा या राजनीतिक महत्वकांक्षा से प्रेरित नहीं है। यह निराशा, वैचारिक संघर्ष और उस गठबंधन और नेता के प्रति विश्वासघात की भावना से उपजा है, जो उस समय भी साथ खड़े रहे जब कोई साथ नहीं था। एक वक्त था जब कांग्रेस राजनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ गई थी और अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही थी। 2014 में पार्टी लोकसभा में 44 सीटों तक सिमट गई थी। 2019 में यह महज 52 सीटें ही जीत पाई। उस समय देश भर में कई नेताओं ने कांग्रेस से दूरी बना ली क्योंकि कोई भी डूबते ब्रांड वाली पार्टी के साथ जुड़ना नहीं चाहता था। लेकिन एक व्यक्ति ने अलग रास्ता चुना वो थे एम.के. स्टालिन

जब देश की अधिकतर मीडिया ने राहुल गांधी का मजाक उड़ाया और उन्हें पप्पू कहकर पुकारा, तब एम.के. स्टालिन उनके साथ खड़े रहे। भारत जोड़ो यात्रा के शुभारंभ के दौरान उन्होंने स्वयं राहुल गांधी तिरंगा सौंपा। उन्हें राजनीतिक रूप से ऐसा करने की जरूरत नहीं थी। उन्होंने वैचारिक रूप से ऐसा किया।

‘स्टालिन ने अपनी राजनीतिक साख दांव पर लगाया’

उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा, राहुल गांधी भाषण देशभर में हलचल मचा रहे हैं, उनकी बातें कभी-कभी जवाहर लाल नेहरू की तरह लगती हैं। यह कूटनीति नहीं थी, यह एक मुख्यमंत्री की ओर से अपनी राजनीतिक साख और पूंजी को एक ऐसे नेता पर दांव लगाना था जिसे कई लोग पहले ही नकार चुके थे।

फिर जब 23 मार्च 2023 को जब सूरत में राहुल गांधी को दोषी ठहराया गया और रातोंरात संसद से अयोग्य घोषित कर दिया गया, तो एमके स्टालिन उनके समर्थन में उठने वाली पहली प्रमुख आवाजों में से एक थे। उन्होंने इस कार्रवाई को फासीवाद बताया और इसे सभी प्रगतिशील लोकतांत्रिक ताकतों पर हमला कहा।

2024 के लोकसभा चुनावों में भी, जहां इंडिया गठबंधन के कई नेताओं ने राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में खुले तौर पर पेश करने में संकोच किया, तो एक बार फिर एमके स्टालिन ने साहसपूर्वक घोषणा की कि राहुल गांधी मेरे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं।

जब राहुल गांधी ने खुद मिठाई खरीदी और स्नेहपूर्वक कहा, “मैं जिन कई राजनीतिक नेताओं को जानता हूं, उनमें स्टालिन मेरा भाई है।” यह रिश्ता विश्वास, वफादारी और गठबंधन धर्म का प्रतीक था।

यही कारण है कि हाल के राजनीतिक घटनाक्रम ने मुझे बेहद परेशान कर दिया है।

मैंने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को यह कहते सुना कि डीएमके ने भी कुछ मौंकों पर कांग्रेस से राजनीतिक असहमति जताई थी या पार्टी को धोखा दिया था। पर मुझे नहीं लगता कि इसे अभी के हालात के बराबर माना जा सकता है।

राजनीति में कोई भी स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होता

राजनीतिक मतभेद आम बात है, खासकर भाजपा और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली मौजूदा सरकार के दौर में। राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि कोई भी स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होता। यही राजनीतिक वास्तविकता है।

लेकिन मुझे यह कुछ और लगता है। यह सिर्फ राजनीति नहीं है, बल्कि यह भरोसा, भावना और उस रिश्ते का मामला है जो एमके स्टालिन ने कांग्रेस के बुरे दौर में राहुल गांधी के साथ जोड़ा था। जब कई नेता उनसे दूर भाग रहे थे, तब स्टालिन वफादारी के साथ उनके साथ खड़े रहे।

इसीलिए यह आम राजनीति बदलाव जैसा नहीं लगता। यह मेरे जैसे कई जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं के लिए व्यक्तिगत, भावनात्मक और पीड़ादायक है।

अगर कांग्रेस वास्तव में टीवीके के साथ गठबंधन करना चाहती थी, तो उसे यह राजनीतिक निर्णय 2026 के विधानसभा चुनाव के पहले और डीएमके साथ राजनीतिक लाभ हासिल करने से पहले लेना चाहिए था। डीएमके के माध्यम से एक राज्यसभा सीट और 28 विधायक सीटें हासिल करने के बाद अब गठबंधन छोड़ना घोर अवसरवादी और स्वार्थी लग रहा है।

टीवीके ही क्यों?

इससे भी अहम सवाल अब यह उठता है कि टीवीके ही क्यों? टीवीके ने आखिर किस तरह से खुद को डीएमके से राजनीतिक या वैचारिक रूप से खुद को श्रेष्ठ साबित किया?

करूर भगदड़ जैसी दुखद घटना के दौरान भी टीवीके नेतृत्व काफी हद तक चुप रहा, जहां पीड़ितों को सांत्वना के बुनियादी शब्द महीनों बाद दिए गए। यहां तक कि वरिष्ठ कांग्रेस नेता और कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष डीके शिवकुमार ने भी सार्वजनिक रूप से जोसेफ विजय को एक अपरिपक्व नेता बताया था।

तो फिर यह अचानक बदलाव क्यों?

एक जमीनी कार्यकर्ता और राहुल गांधी का फालोअर होने के नाते, मैं व्यक्तिगत रूप से महसूस करता हूं कि कांग्रेस नेतृत्व ने स्टालिन को धोखा दिया है और केवल इस बात को साबित करने के लिए टीवीके की ओर रुख किया है कि दक्षिण भारत कांग्रेस का समर्थन करता है, कर्नाटक, तेलंगाना, केरल और अब प्रस्तावित टीवीके कांग्रेस गठबंधन।

यह वैचारिक राजनीति से कम और एक प्रतीकात्मक बयान देने की कोशिश की तरह अधिक प्रतीत होती है कि राहुल गांधी दक्षिण भारत के प्रधानमंत्री पद के चेहरे हैं। मेरे विचार से यह सिद्धांतवादी राजनीति नहीं है।

“मेरे लिए विचारधारा राजनीतिक पद से अधिक अहम”

मुझे नहीं पता ये फैसले राहुल गांधी की जानकारी और मंजूरी से हो रहे हैं या नहीं, पर मेरा पक्का मानना है कि एक सच्चे फालाअर का काम सिर्फ आंख बंदकर के बात मानना नहीं होता। जब भी कुछ नैतिक या राजनीतिक रूप से गलत लगे तो एक अनुयायी को अपने नेता से सवाल जरूर करना चाहिए।मुझे लग रहा कि मैं आज ठीक यही कर रहा हूं।

मेरे इस्तीफा का मतलब यह नहीं कि मैं राहुल गांधी से नफरत या उनका विरोध करता हूं। मैं उस विचारधारा का सम्मान करता रहूंगा, जिससे मैं पहली बार आकर्षित हुआ था। लेकिन मेरे लिए विचारधारा राजनीतिक पद से अधिक अहम रहेगी।

पद दिए और लिए जा सकते हैं, लेकिन सिद्धांत किसी भी व्यक्ति को हमेशा के लिए परिभाषित करते हैं।

लेखक एनएसयूआई तमिलनाडु के पूर्व राज्य सचिव हैं।

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