भारतीय समाज में परिवार की संरचना और मूल्यों का आधार माता-पिता की देखभाल एवं सम्मान रहा है। मगर आधुनिक समय में वैश्वीकरण, बेहतर शिक्षा और अच्छे रोजगार के लिए युवा विदेश या बड़े शहरों में जाकर बस रहे हैं। यह प्रवास अक्सर परिवारों में आर्थिक उन्नति तो लाता है, लेकिन कई मामलों में बुजुर्ग माता-पिता अकेले पड़ जाते हैं। देखभाल और भावनात्मक समर्थन का अभाव तथा अकेलेपन से बुजुर्गों की मानसिक एवं शारीरिक स्थिति दयनीय हो जाती है। हाल ही में बजट सत्र के दौरान राज्यसभा में इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया गया और विदेश जाने वाले युवाओं के लिए माता-पिता की देखभाल सुनिश्चित करने वाले सख्त नियमों की मांग की गई। सुझाव दिया गया कि विदेश जाने से पहले युवाओं से एक हलफनामा लिया जाए, जिसमें वे अपनी आय का एक निश्चित हिस्सा माता-पिता की देखभाल के लिए देने का वादा करें।

साथ ही हर छह महीने में माता-पिता से ‘संतुष्टि प्रमाण पत्र’ प्राप्त करना अनिवार्य हो, जिसमें बुजुर्ग पुष्टि करें कि उनकी देखभाल सही तरीके से हो रही है, उनके बच्चे नियमित संपर्क में हैं और आवश्यक सहायता मिल रही है। यदि ऐसा प्रमाण पत्र नहीं मिलता या शिकायत आती है, तो ऐसे युवाओं का पासपोर्ट रद्द किया जाए और उन्हें भारत वापस बुलाया जाए। इसके अलावा यह सलाह भी दी गई कि कम से कम सप्ताह में एक बार फोन पर माता-पिता का हालचाल पूछना भी बाध्यकारी होना चाहिए।

संसद में दिए गए ये सुझाव इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि पिछले वर्ष पांच सौ से अधिक ऐसे मामले सामने आए, जहां विदेश में बसे बच्चों की ओर से उपेक्षा के कारण माता-पिता की हालत बहुत खराब हो गई या उनकी मृत्यु हो गई और बच्चे अंतिम संस्कार के लिए भी नहीं लौटे। यह मुद्दा केवल भावनात्मक नहीं है, बल्कि सामाजिक और कानूनी दृष्टि से भी गंभीर है। भारत में पहले से ही ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम- 2007’ लागू है, जो युवाओं को माता-पिता की आर्थिक और भावनात्मक देखभाल के लिए जिम्मेदार बनाता है।

इस कानून के तहत बुजुर्ग न्यायाधिकरण में शिकायत कर सकते हैं और अपने बच्चों से मासिक भरण-पोषण की सहूलियत प्राप्त कर सकते हैं, जिसमें संपत्ति हस्तांतरण रद्द करने की शक्ति भी शामिल है। मगर अफसोसनाक है कि सख्त कानूनी प्रावधानों के बावजूद बुजर्गों की देखभाल और सुरक्षा पूरी तरह सुनिश्चित नहीं हो पा रही है, जिस कारण बड़ी संख्या में बुजुर्ग वृद्धाश्रम में शरण लेने को मजबूर हो रहे हैं, जबकि कई माता-पिता के बच्चे भारतीय शहरों में ही रह रहे हैं।

दूसरा, यह कानून विदेश में बसे युवाओं (एनआरआइ) पर प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो पाता, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय क्षेत्राधिकार, प्रवर्तन की कमी और संपर्क की दूरी जैसी समस्याएं आड़े आती हैं। कई एनआरआइ युवा भारत में संपत्ति या बैंक खाते रखते हैं, लेकिन माता-पिता की देखभाल की जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लेते हैं। संसद में पेश किया गया प्रस्ताव इसी कमी को दूर करने के प्रयास से जुड़ा है, जहां विदेश मंत्रालय और पासपोर्ट प्राधिकरण के माध्यम से यात्रा तथा नागरिकता से जुड़ी शर्तें लगाने का सुझाव दिया गया है।

यदि इस पर गंभीरता से विचार कर इसे व्यवस्था का हिस्सा बनाए जाए, तो विदेश जाने वाले युवाओं के लिए पासपोर्ट आवेदन या वीजा प्रक्रिया में माता-पिता की सहमति या हलफनामा अनिवार्य हो सकता है, जो उनके भविष्य को सुरक्षित बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम होगा। इस तरह के कानून की आवश्यकता इसलिए भी महसूस की जा रही है, क्योंकि भारत में बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ रही है। वर्ष 2021 के एक अनुमानित आंकड़े के अनुसार, देश में साठ वर्ष से अधिक उम्र के लोग कुल आबादी का लगभग दस फीसद हैं, और यह संख्या वर्ष 2030 तक और बढ़ने का अनुमान है। युवाओं के विदेश और शहरों में पलायन के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में बुजुर्ग अकेले रह जाते हैं, जहां स्वास्थ्य सेवाएं, सामाजिक सुरक्षा और भावनात्मक समर्थन की कमी होती है।

कई मामलों में माता-पिता अपने बच्चों को विदेश भेजने के लिए अपनी जमीन-जायदाद तक बेच देते हैं, अपनी सारी बचत उसमें लगा देते हैं और कहीं कमी रह जाए तो बैंकों से कर्ज लिया जाता है। मगर कई दफा उन्हें बदले में अकेलापन और उपेक्षा ही मिलती है। यह न केवल व्यक्तिगत स्तर पर दुखद है, बल्कि समाज में पारिवारिक मूल्यों के क्षरण को भी दर्शाता है। भारतीय संस्कृति में ‘मातृ-पितृ भक्ति’ को सर्वोच्च माना जाता है, लेकिन आर्थिक महत्त्वाकांक्षा और पश्चिमी जीवनशैली के प्रभाव से ये मूल्य कमजोर पड़ रहे हैं। संसद में दिया गया सुझाव इसी सांस्कृतिक संकट पर ध्यान आकर्षित करता है और याद दिलाता है कि युवाओं की सफलता के पीछे माता-पिता का त्याग भी होता है, इसलिए उनकी सेवा अनिवार्य होनी चाहिए।

हालांकि, इस प्रस्ताव पर बहस भी छिड़ी हुई है। कुछ लोग इसे सकारात्मक मानते हैं, क्योंकि यह बुजुर्गों के अधिकारों की रक्षा से जुड़ा है और बच्चों में जिम्मेदारी की भावना जगाने वाला है। सोशल मीडिया पर कई लोग इसका यह कहकर समर्थन कर रहे हैं कि इस तरह का कानून जरूरी है, ताकि माता-पिता का भविष्य सुरक्षित रहे। दूसरी ओर, कुछ आलोचक इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अतिक्रमण मानते हैं। वे कहते हैं कि पासपोर्ट रद्द करना या प्रमाण पत्र की बाध्यता जैसे कदम बहुत कठोर हैं, जो प्रवास की स्वतंत्रता को प्रभावित करेंगे। अंतरराष्ट्रीय कानूनों में पासपोर्ट रद्द करने के लिए केवल गंभीर अपराध या राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार होते हैं, न कि पारिवारिक मामलों पर। एनआरआइ समुदाय का एक हिस्सा भी इसे भेदभावपूर्ण मानता है, उनका तर्क है कि भारत में रहने वाले युवा जो माता-पिता की उपेक्षा करते हैं, उनके खिलाफ ऐसी सख्त कार्रवाई नहीं होती है।

इसके बावजूद इस प्रस्ताव की व्यावहारिकता पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। यदि सरकार इस तरह के प्रावधान लागू करती है, तो विदेश मंत्रालय को एनआरआइ से जुड़े डेटाबेस को मजबूत करना होगा, भारतीय दूतावासों के माध्यम से प्रमाण पत्र सत्यापन की व्यवस्था करनी होगी और शिकायतों के लिए एक तंत्र बनाना होगा। यह प्रक्रिया जटिल हो सकती है, लेकिन डिजिटल प्रणाली और आधार जैसी सुविधाओं से इसे संभव बनाया जा सकता है। मिसाल के तौर पर माता-पिता एक आनलाइन पोर्टल पर प्रमाण पत्र दर्ज कर सकते हैं या दूतावास में जमा कर सकते हैं। यदि प्रमाण पत्र नहीं मिलता है, तो पासपोर्ट नवीनीकरण रुक सकता है या यात्रा प्रतिबंध लग सकता है। यह कदम युवाओं को अपने माता-पिता से नियमित संपर्क बनाए रखने के लिए प्रेरित करेगा और उनकी सुरक्षा का एहसास दिलाता रहेगा।

इस मुद्दे पर संसद में उठाया गया सवाल केवल कानूनी नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भी अहम है। यदि ऐसा कानून बनता है, तो यह सुनिश्चित करेगा कि विदेश में सफलता पाने वाले युवा अपने माता-पिता को कभी न भूलें। बुजुर्गों का सम्मान और सुरक्षा राष्ट्र की प्रगति का आधार है, और उनकी उपेक्षा सामाजिक मूल्यों के लिए घातक साबित हो सकती है। इसलिए इस प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए, ताकि बुजुर्ग माता-पिता का भविष्य सुरक्षित हो और परिवार की एकता बनी रहे। यह कदम न केवल बुजुर्गों की रक्षा करेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को जिम्मेदारी का पाठ भी पढ़ाएगा।