Jansatta Opinion: पिछले दिनों अरुणाचल प्रदेश की घाटियों से गूंजी एक नन्ही बच्ची कार्गा टिंकल गोंगो की तोतली आवाज ने पूरे देश के अंतर्मन को झकझोर कर रख दिया था। अपने मासूम चेहरे, खिलखिलाती मुस्कान और तुतलाती जुबान में उसने हाथ जोड़कर पूरे अधिकार से राष्ट्रगान गाया और फिर सहज भाव से यह गुहार लगाई कि ‘हमको चीनी मत बोलो, इंडिया बोलो’।

उसकी अनुगूंज अभी शांत भी नहीं हुई थी कि छह सितंबर की रात दिल्ली में मणिपुर के प्रख्यात गिटारवादक चोंगथाम विक्रम सिंह की हत्या ने एक बार फिर पूर्वोत्तर के लोगों को दुख पहुंचाया। इस घटना के विरोध में मणिपुर की युवा पीढ़ी में गहरा आक्रोश है।

समय-समय पर पूर्वोत्तर के लोगों को लेकर उत्तर भारत के कुछ अल्पज्ञ लोगों की मानसिकता विचलित करती है। जबकि पूर्वोत्तर के लोग न केवल इस देश से, बल्कि यहां की भाषा से भी प्यार करते हैं। मणिपुरी साहित्य का हिंदी में अनुवाद करने वाले कम नहीं हैं। इसी वर्ष जनवरी माह में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास नई दिल्ली द्वारा अरुणाचल प्रदेश की राजधानी ईटानगर में वहां के लेखकों के साथ एक नवलेखन कार्यशाला आयोजित हुई थी।

वहां अरुणाचल का लगभग हर व्यक्ति भलीभांति हिंदी बोल रहा था, समझ रहा था। मणिपुर में भी हिंदी प्रेमियों की कमी नहीं। वहां विश्वविद्यालय में हिंदी का अध्ययन हो रहा है। वहां के लोग विशुद्ध रूप से अपने आप को हिंदुस्तान से ही जुड़ा महसूस करते हैं, लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि उत्तर भारत के कुछ लोग नादानीवश वहां के लोगों के रंगरूप को देखकर कुछ और दुराग्रह पाल लेते हैं।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जिसकी नींव विविधता के सम्मान पर टिकी है। यहां भाषा, खान-पान, वेशभूषा और शारीरिक बनावट हर कुछ सौ किलोमीटर पर बदल जाती है। इसके बावजूद, यह अफसोस की बात है कि जब उत्तर-पूर्व का कोई नागरिक देश के अन्य राज्यों, विशेषकर दिल्ली, मुंबई, बंगलुरु या कोलकाता जैसे महानगरों में कदम रखता है, तो उसे अक्सर तिरछी और अजनबी नजरों का सामना करना पड़ता है।

चेहरे की बनावट, विशेषकर ‘मंगोली’ नैन-नक्श के कारण उन पर कुछ अपमानजनक टिप्पणियां करना एक आम विकृति बन चुकी है। किराए पर मकान ढूंढ़ने से लेकर शैक्षणिक संस्थानों, कार्यस्थलों और सार्वजनिक परिवहन तक, पूर्वोत्तर के युवाओं को लगातार यह अहसास कराया जाता है कि वे ‘यहां के नहीं हैं’! जब उन्हें विदेशी कहकर पुकारा जाता है, तो उनके भीतर एक गहरी मनोवैज्ञानिक टूटन पैदा होती है।

अरुणाचल प्रदेश, जिसे ‘उगते सूरज की भूमि’ कहा जाता है, भारत का वह सीमांत प्रहरी है, जो देश की सीमाओं की रक्षा में दिन-रात अडिग खड़ा रहता है। यहां के लोग प्रतिकूल परिस्थितियों, कठोर मौसम और पड़ोसी देशों की विस्तारवादी गिद्ध-दृष्टि के बावजूद पूरे गर्व से सीना तानकर भारतीय होने का जयघोष करते हैं। अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और पूरा पूर्वोत्तर क्षेत्र देश की सुरक्षा व्यवस्था का सबसे संवेदनशील और महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।

असम का बिहू, नगालैंड का हार्नबिल, मणिपुर की रासलीला, मिजोरम का चेराव और अरुणाचल के जीवंत जनजातीय उत्सव भारत की सांस्कृतिक पूंजी को अद्वितीय बनाते हैं। पूर्वोत्तर के लोग जब सीमा पर भारतीय सेना के साथ मिलकर ‘जय हिंद’ का नारा लगाते हैं, तो उनकी देशभक्ति पर संदेह करना या उन्हें सिर्फ उनके चेहरे के आधार पर ‘पराया’ समझ लेना राष्ट्र के प्रति एक नैतिक अपराध के समान है।

पूर्वोत्तर के प्रति मुख्यधारा के समाज में व्याप्त इस भेदभाव की जड़ें नफरत से ज्यादा गहरी अज्ञानता में हैं। हमारी शिक्षा प्रणाली और सामाजिक विमर्श में पूर्वोत्तर को कभी वह स्थान मिला ही नहीं, जिसका वह हकदार था। दशकों तक हमारे स्कूली इतिहास और भूगोल की किताबों में सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर गंगा-यमुना के मैदानों तक का विवरण तो विस्तार से पढ़ाया गया, लेकिन अहोम साम्राज्य, लचित बोरफुकन का पराक्रम, रानी गाइदिनल्यू का संघर्ष, ब्रिटिश सेना को रोकने वाले तिरोत सिंग और माटीमुर्ती कनकलता बरुआ के बलिदानों को एक-दो पन्नों में समेट दिया गया।

दिल्ली या मध्य भारत में बैठे औसत नागरिक को यह तक ठीक से ज्ञात नहीं होता कि पूर्वोत्तर के आठ राज्यों, जिन्हें ‘अष्टलक्ष्मी’ भी कहा जाता है, उनकी राजधानियां, भाषाएं और जनजातीय परंपराएं क्या हैं। जब तक देश का समाज यह नहीं समझेगा कि भारत सिर्फ आर्य और द्रविड़ बनावट तक सीमित नहीं है, बल्कि ‘मंगोलायड’ और ‘आस्ट्रो-एशियाटिक’ नस्लें भी इस मिट्टी की उतनी ही सच्ची संतानें हैं, तब तक कार्गा टिंकल जैसी बच्चियों को अपने भारतीय होने का प्रमाण देना पड़ेगा।

वर्ष 2014 में दिल्ली के लाजपत नगर में अरुणाचल प्रदेश के 19 वर्षीय छात्र निडो तानिया की उसके बालों और नैन-नक्श पर फब्तियां कसने के बाद पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी। कोविड-19 महामारी के दौरान पूर्वोत्तर के नागरिकों के साथ हुए दुर्व्यवहार, उन्हें किराए के घरों से निकाले जाने और उन पर छींटाकशी किए जाने की घटनाएं यह साबित करती हैं कि हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा आज भी गंभीर पूर्वाग्रहों का बंधक है।

राष्ट्र की अवधारणा किसी चेहरे की लंबाई, आंखों के आकार या त्वचा के रंग से तय नहीं होती। राष्ट्र का निर्माण उन साझा मूल्यों, संविधान और भावनात्मक जुड़ाव से होता है, जो नागरिकों को एक सूत्र में पिरोते हैं। विडंबना देखिए कि जब ओलंपिक या अंतरराष्ट्रीय खेलों में मैरी काम, मीराबाई चानू या लवलीना बोरगोहेन देश के लिए पदक जीतकर तिरंगा लहराती हैं, तब सभी भारतीय गर्व से सीना फुलाते हैं, लेकिन जैसे ही वे मंच से नीचे उतरती हैं, उसी क्षेत्र के एक आम छात्र को दिल्ली या बंगलुरु की सड़कों पर अपनी पहचान के लिए जूझना पड़ता है।

यह अब जरूरी हो गया है कि प्राथमिक से लेकर उच्च स्तर तक की पाठ्यपुस्तकों में पूर्वोत्तर के इतिहास, स्वतंत्रता सेनानियों, लोककथाओं और भूगोल को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए। ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ जैसी पहलों को केवल सरकारी आयोजनों तक सीमित न रखकर स्कूलों, विश्वविद्यालयों और युवा मंडलों के बीच नियमित विनिमय कार्यक्रमों के रूप में जमीनी स्तर पर लागू किया जाए।

भारतीय सिनेमा और धारावाहिकों में पूर्वोत्तर के कलाकारों को रूढ़िवादी किरदारों से बाहर निकालकर मुख्यधारा की भूमिकाओं में समान अवसर दिया जाए। कार्गा टिंकल गोंगो की तोतली जुबान ने देश को जो संदेश दिया है, वह एक चेतावनी भी है और एक विनम्र आह्वान भी। अब समय आ गया है कि हम अपनी संकीर्ण दृष्टि को त्यागें। कार्गा टिंकल की मासूम पुकार का वास्तविक सम्मान तभी होगा, जब किसी भी भारतीय को यह साबित न करना पड़े कि वह विदेशी नहीं, बल्कि इस भारत भूमि का सच्चा सपूत है। मणिपुर के जाने-माने गिटारवादक विक्रम सिंह इसी देश के नागरिक थे।

उनके साथ दिल्ली में जो हुआ, वह एक तरह से अलगाव को बढ़ावा देता है। एक व्यक्ति या उसका समाज अगर किसी भी समुदाय के प्रति पूर्वाग्रह या दुराग्रह रखता है, तो इसका नुकसान केवल उसे नहीं, बल्कि उसके समाज और देश को भी उठाना पड़ता है।

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चुनाव नजदीक देख समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव लगभग रोज ही जनता से नए-नए वादे करने में जुट गए हैं और इसी क्रम में उन्होंने यह भी कहा है कि जब वह सत्ता में आएंगे तो बौद्ध तीर्थस्थलों का विकास करेंगे। लेकिन उनके इस वादे को लेकर उत्तर प्रदेश की जनता और विशेषकर दलित-शोषित समाज को यह विचार अवश्य करना चाहिए कि सपा का अतीत क्या रहा है और बौद्ध तीर्थस्थलों के प्रति उनका रवैया पूर्व में क्या रहा है? पढ़िए पूरी खबर…