‘इल्म हासिल कर के भी मिलती नहीं है नौकरी
रहम के काबिल है बस हालत हमारी इन दिनों’
जब आपकी राजनीतिक काबिलियत किसी काम न आए तो आपके अवसान के समय को निकट मान लिया जाता है। महाराष्ट्र में भाजपा का सफल राजनीतिक प्रयोग देख कर अनुमान लगा लिया गया था कि बिहार में जल्द ही जद (एकी) के राजनीतिक अस्तित्व पर भी संकट आ सकता है। नीतीश कुमार उन क्षेत्रीय क्षत्रपों में शामिल थे, जिनकी एक केंद्रीय व राष्ट्रीय आभा बनी थी। सबसे ज्यादा बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने का कीर्तिमान बनाने वाले नीतीश कुमार अचानक से सोशल मीडिया पर एलान करते हैं कि उनकी हमेशा से राज्यसभा में जाने की इच्छा थी। राजनीतिक रूप से उल्टी दिशा में जानेवाली इस इच्छा से अनुमान लगाया जा सकता है कि नीतीश कुमार के पास अब उतनी राजनीतिक जमीन नहीं बची है कि वे ‘पलट’ सकें। बिहार के ‘टाइगर’ को दिल्ली भेजा जा रहा है। इस बदलाव को समझने की कोशिश करता बेबाक बोल।
बिहार विधानसभा के चुनावी नतीजों का दिन। नतीजे सामने आने के बाद ही पटना में पोस्टर लगे-‘टाइगर जिंदा है’। मूल रूप से यह एक हिंदी मसाला फिल्म का शीर्षक है। हिंदी फिल्मों के बाजार के मुताबिक नायक को तब तक जिंदा रखा जाता है, जब तक उसकी उपयोगिता है। बाजार में उपयोगिता बरकरार हो तो पहले मरता दिखाए गए बाघ को भी जिंदा कर दिया जा सकता है। लेकिन, उपयोगिता खत्म हो गई तो बाघ भी पर्यावरण संकट का शिकार बन सकता है।
बाघ की उपमा पर एक और बात। कोई भी जीव अपने खास क्षेत्र में ही बाघ सरीखा हो पाता है। अपने क्षेत्र से निकलते ही उस पर अस्तित्व का संकट आ जाता है। याद कीजिए, मध्य प्रदेश के कूनो अभयारण्य में अफ्रीका से लाए गए चीतों का क्या हस्र हो गया था। यहां की आबोहवा में वे एक अति नाजुक जीव साबित हुए। यहां के अभयारण्य में अफ्रीकी चीतों के संघर्ष को देख कर शायद ही कोई चुस्ती-फुर्ती के लिए चीते का उदाहरण देना पसंद करे।
ऐसा ही हाल राजनीति के साथ भी है। किसी राजनेता को जब आप उसकी मूल आबोहवा से निकाल देंगे तो उसका राजनीतिक अस्तित्व वैसे ही श्रीहीन हो जाएगा। नीतीश कुमार की राजनीति का आधार ही बिहार और वहां की खास राजनीतिक संस्कृति रही है। भाजपा के साथ रहते हुए भी उन्होंने बहुत हद तक समाजवादी राजनीतिक मूल्यों को आगे बढ़ाया। जीवन के इस मोड़ पर उन्हें बिहार से दिल्ली वह भी राज्यसभा के लिए भेजना ऐसा ही है जैसे किसी पेंग्विन को आप लू चलने वाले मैदानी इलाके में भेज दीजिए। बिहार का ‘टाइगर’ अब दिल्ली में है।
नीतीश कुमार के संदर्भ में अब इस बात की उम्मीद नहीं है कि ‘टाइगर जिंदा है 2.0’ जैसा कुछ राजनीतिक माहौल बनेगा। उनकी राजनीतिक शैली के कारण उन्हें जो ‘पलटूराम’ का उपनाम दिया गया था, अब उस पर भी विराम ही दिख रहा है। पलटने के लिए, दूसरी दिशा में मुड़ने के लिए पर्याप्त जगह या जमीन की जरूरत होती है। फिलहाल तो ऐसा लग रहा है कि नीतीश कुमार से वह जमीन ही छीन ली गई है। अब वे ऐसी संकरी जगह पर पहुंचा दिए गए हैं, जहां से पलटना नामुमकिन सा हो।
नीतीश कुमार सबसे ज्यादा बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने का कीर्तिमान बना चुके थे। इसलिए नीतीश कुमार को लेकर राजनीतिक विश्लेषक काफी भावुकता में थे। वे महाराष्ट्र की तरफ देखना भी नहीं चाह रहे थे। ज्ञान की शाखा में राजनीति एक विज्ञान ही है, जहां किसी भी तरह की भावुकता का कोई काम नहीं है।
भाजपा एक ऐसा राजनीतिक दल है जो राजनीति के इस वैज्ञानिक पहलू को बखूबी समझता है। जद (एकी) महाराष्ट्र में हुए वैज्ञानिक प्रयोग को लेकर गलतफहमी में थी कि हमारे साथ ऐसा नहीं होगा। हम अलग हैं…हमारे नीतीश कुमार अलग हैं…। भाजपा के साथ हाथ मिलाने वाले हर क्षेत्रीय दल को यही खुशफहमी रहती है कि हम अलग हैं।
भाजपा की राजनीतिक प्रयोगशाला के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने वैज्ञानिक सूत्र देते हुए कहा था-बहुत जल्द क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व खत्म हो जाएगा। महाराष्ट्र में हुए ऐसे ही राजनीतिक परीक्षण की रासायनिक गंध अभी तक फिजा में थी। समीकरण पहले कुछ ऐसा था-एक परखनली में तीन चम्मच क्षेत्रीय दल और एक चम्मच भाजपा। पहले तो लग सकता है कि तीन चम्मच वालों का वर्चस्व ही रहेगा। लेकिन रासायनिक समीकरण गणित की गिनती, दो जमा दो चार की तरह नहीं होते हैं। ऐसा ही महाराष्ट्र में भी हुआ। परखनली में भाजपा के रसायन का ऐसा असर हुआ कि क्षेत्रीय दल अपना राजनीतिक गुण खो बैठने की कगार पर पहुंच गए।
महाराष्ट्र में प्रयोग सफल होते ही प्रयोगशाला की स्थापना बिहार में हुई। नीतीश कुमार जद (एकी) को किस तरफ ले जाएंगे इस पर संशय बना रहा। अंत में नीतीश कुमार ने जद (एकी) को भाजपा की परखनली में डालना ही पसंद किया। नीतीश कुमार मुख्यमंत्री भी बने। लेकिन हर व्यवहारवादी नीतीश कुमार में ‘एकनाथ शिंदे 2.0’ ही देख रहा था।
बिहार में जिस तरह से नीतीश कुमार को दिल्ली भेजे जाने का विरोध हो रहा है, जद (एकी) के तीन शीर्ष नेताओं के खिलाफ नारे लगाए जा रहे हैं, उससे यह साफ है कि यह फैसला अचानक लिया गया और खुद नीतीश कुमार ही इसके लिए तैयार नहीं थे तो पार्टी कार्यकर्ताओं को भला कैसे इस फैसले के पक्ष में कर पाते।
बिहार विधानसभा चुनाव के पहले से ही सार्वजनिक मंचों पर नीतीश कुमार की जिस तरह की प्रतिक्रिया थी उससे सभी को अहसास था कि उन्हें इलाज की जरूरत है। लेकिन भारत की राजनीत में नेता खुद को हमेशा ‘टाइगर’ ही दिखाने की जुगत में रहते हैं। वे अपने स्वास्थ्य की सच्चाई को जनता के सामने नहीं लाते। पिछले दिनों हमने अमेरिका में देखा कि जो बाइडन और डोनाल्ड ट्रंप की सेहत के बारे में सार्वजनिक चर्चा हुई, दोनों नेताओं ने जनता के सामने अपने हालात पर पक्ष रखा। लेकिन नीतीश कुमार की सेहत पर बात करते ही भाजपा से लेकर जद (एकी) और राजग के सभी नेता बौखला कर उन्हें सेहतमंद घोषित करने में जुट जाते थे।
इसका खमियाजा नीतीश कुमार को भुगतना पड़ा। आज जनता को यह पता नहीं है कि अगर उनके प्रिय नेता को कोई बीमारी है तो उनका क्या और किस स्तर का इलाज हुआ। अगर नीतीश कुमार की सेहत के बारे में जनता को आधिकारिक रूप से पता होता तो जनता अपने प्रिय नेता के साथ खड़ी होती कि बीमार को इलाज, देखभाल और प्यार की जरूरत होती है। हमें अभी यह भी नहीं पता कि क्या उन्हें जबरन सामान्य दिखाने की कोशिश में उनकी सेहत को और ज्यादा नुकसान पहुंचा?
यह अनुमान तो हर किसी को था कि बिहार में नीतीश कुमार को हटा कर भाजपा वहां अपना मुख्यमंत्री जल्द ही बनाएगी। लेकिन उसके लिए यह समय क्यों चुना गया, जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत पर कई सवाल उठ रहे हैं? ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमले के बाद भारत की विदेश नीति बड़े सवालों के घेरे में है। चाहे खानेमेई की मौत पर शोक जताने का मसला हो या फिर रूस से तेल खरीदने की कथित इजाजत मिलने का। भारत की जमीन पर अमेरिकी प्रतिनिधि जिस तरह की धमकी भरी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, वह भी सोचनीय है।
युद्ध का असर पूरे विश्व पर पड़ रहा है और पूरी दुनिया इसे लेकर सावधान है। यहां सत्ता समर्थक इस बात पर गर्व कर रहे हैं कि हमारे यहां होली मन रही है, क्रिकेट चल रहा है, मतलब सब कुछ सही है। शायद इसी सब कुछ सही को और सही दिखाने के लिए बिहार में सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है।
इस बार सवाल इतने गहरे हैं कि नीतीश कुमार का इस्तेमाल कर भी ध्यान भटकाना मुश्किल है। तर्क दिया जा सकता है कि राज्यसभा चुनाव अभी ही होने हैं। इसके बाद भी सच यही है कि अभी केंद्रीय शक्ति की प्राथमिकता बिहार में शक्ति प्रदर्शन तो कतई नहीं होनी चाहिए। दुनिया एक बड़े संकट से जूझ रही है। इस सच का सामना करते हुए हर मोर्चे पर देश को सुरक्षित रखना ही एकमात्र प्राथमिकता हो सकती है।
