किसी भी राष्ट्र के विकास की सबसे मजबूत नींव उसकी शिक्षा व्यवस्था होती है। विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा, जब देश का प्रत्येक बच्चा विद्यालय तक पहुंचे, नियमित रूप से अध्ययन करे और अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करे। इसलिए अब केवल सौ फीसद नामांकन ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि सौ फीसद ठहराव और शून्य ‘ड्रॉपआउट’ यानी बीच में एक भी बच्चा स्कूल न छोड़े, इसे राष्ट्रीय लक्ष्य बनाया जाना चाहिए।
हाल ही में नीति आयोग द्वारा भारत की स्कूली शिक्षा व्यवस्था पर जारी रिपोर्ट में झारखंड से एक अत्यंत उत्साहजनक समाचार सामने आया। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2014-15 में झारखंड में प्राथमिक स्तर पर ‘ड्रॉपआउट’ दर 6.41 फीसद थी, जो वर्ष 2024-25 में घटकर शून्य हो गई है।
इसी प्रकार माध्यमिक स्तर पर यह दर 23.2 फीसद से घटकर केवल 3.5 फीसद रह गई है। यह उपलब्धि केवल झारखंड की नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणा का विषय है। इससे यह सिद्ध होता है कि अगर सरकार, प्रशासन, विद्यालय और समाज मिलकर योजनाबद्ध ढंग से कार्य करें, तो बीच में स्कूल छोड़ने जैसी गंभीर समस्या पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भी प्रत्येक बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने तथा उसे विद्यालय में बनाए रखने पर विशेष बल देती है। इसके बावजूद देश के सामने आज भी विद्यालय छोड़ने वाले बच्चों की समस्या गंभीर बनी हुई है। अगर सकल नामांकन अनुपात यानी जीईआर के आंकड़ों पर दृष्टि डालें, तो यह चिंता और बढ़ जाती है। कक्षा छह से आठ तक जीईआर लगभग 90.9 फीसद है, जबकि कक्षा नौ-दस में यह घटकर 79.3 फीसद रह जाता है। कक्षा 11-12 तक पहुंचते-पहुंचते यह केवल 56.5 फीसद रह जाता है।
स्पष्ट है कि बड़ी संख्या में बच्चे, विशेष रूप से कक्षा आठ के बाद शिक्षा व्यवस्था से बाहर हो जाते हैं। यह स्थिति शिक्षा के साथ-साथ देश के सामाजिक और आर्थिक विकास से भी सीधे जुड़ी हुई है।
राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण सहित विभिन्न अध्ययनों से स्पष्ट होता है कि बच्चों के स्कूल छोड़ने के अनेक कारण हैं। गरीबी, बाल श्रम, बाल विवाह, प्रवासी मजदूर परिवारों का लगातार स्थान परिवर्तन, विद्यालयों की दूरी, आधारभूत सुविधाओं का अभाव, गुणवत्तापूर्ण शिक्षकों की कमी और शिक्षा के प्रति जागरूकता का अभाव इसके प्रमुख कारण हैं। झारखंड की सफलता यह संदेश देती है कि अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक प्रतिबद्धता और सामाजिक सहभागिता साथ आएं तो परिवर्तन संभव है। आवश्यकता इस बात की है कि राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश सहित उन सभी राज्यों में विशेष अभियान चलाए जाएं, जहां विद्यालय छोड़ने वाले बच्चों की संख्या अभी भी चिंताजनक है।
बीच में स्कूली पढ़ाई छोड़ने की समस्या पर काबू पाने के लिए सबसे पहले विद्यालयों के आधारभूत ढांचे को मजबूत करना होगा। प्रत्येक बच्चे के लिए पूर्व-प्राथमिक से कक्षा बारह तक सुरक्षित, आकर्षक और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी। सरकारी विद्यालयों की विश्वसनीयता को फिर से स्थापित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। विद्यालयों में पर्याप्त कक्षाएं, प्रशिक्षित शिक्षक, पुस्तकालय, प्रयोगशालाएं, खेल सुविधाएं, स्वच्छ पेयजल, अलग शौचालय तथा डिजिटल संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी। जहां विद्यालय नहीं हैं, वहां नए विद्यालय स्थापित किए जाएं और आवश्यकता के अनुसार छात्रावासों का निर्माण किया जाए। विशेष रूप से बालिकाओं के लिए सुरक्षित छात्रावास और सुगम परिवहन की व्यवस्था अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि अनेक बालिकाएं केवल दूरी और सुरक्षा के कारण अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ देती हैं।
प्रवासी मजदूरों के बच्चों की शिक्षा भी एक बड़ी चुनौती है। ऐसे बच्चों के लिए वैकल्पिक और नवीन शिक्षा केंद्र, लचीली अध्ययन व्यवस्था तथा सामुदायिक सहयोग की आवश्यकता है। स्वयंसेवी संस्थाओं और स्थानीय समाज की भागीदारी से ऐसे बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से फिर जोड़ा जा सकता है। नामांकन के बावजूद कोई बच्चा लगातार अनुपस्थित रहता है, तो उसके अभिभावकों से संपर्क करके विद्यालय छोड़ने के कारणों का समाधान खोजना चाहिए। अगर किसी कारणवश कोई बच्चा विद्यालय छोड़ देता है, तो उसकी वापसी भी सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए। ऐसे विद्यार्थियों के लिए विशेष कक्षाएं, सेतु पाठ्यक्रम तथा अतिरिक्त अध्ययन की व्यवस्था की जानी चाहिए, जिससे वे बिना किसी संकोच के फिर अपनी कक्षा के अनुरूप अध्ययन प्रारंभ कर सकें। सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित वर्गों के बच्चों के लिए विशेष प्रयास आवश्यक हैं। ऐसे क्षेत्रों में सामुदायिक साक्षरता केंद्र, लचीले समय की अध्ययन कक्षाएं तथा विशेष शिक्षण केंद्र संचालित किए जा सकते हैं, जहां बच्चे अपनी परिस्थितियों के अनुसार पढ़ाई जारी रख सकें। इससे उनका विद्यालय से संबंध बना रहेगा और भविष्य में उनकी नियमित शिक्षा भी बाधित नहीं होगी।
विकसित भारत का निर्माण केवल आर्थिक प्रगति से नहीं होगा। इसके लिए शिक्षित, कुशल, संवेदनशील और जागरूक नागरिकों का निर्माण आवश्यक है। प्रत्येक विद्यालय, प्रत्येक शिक्षक, प्रत्येक अभिभावक और पूरे समाज को यह संकल्प लेना होगा कि कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित नहीं रहेगा। झारखंड ने यह सिद्ध कर दिया है कि बीच में स्कूल छोड़ने की दर को शून्य करना कोई असंभव लक्ष्य नहीं है। यह उपलब्धि पूरा देश हासिल कर सकता है। अब समय आ गया है कि ‘हर बच्चा विद्यालय में, हर बच्चा शिक्षा में और कोई भी बच्चा स्कूल से बाहर नहीं’ केवल एक नारा न रहकर राष्ट्रीय संकल्प बने। विकसित भारत की यात्रा का सबसे सशक्त आधार यही होगा।
