नेपाल में नई सत्ता के आते ही ऐसा लग रहा है मानो भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की कवायद शुरू हो गई है। इसके तहत तीन पूर्व प्रधानमंत्रियों और दो पूर्व मंत्रियों के खिलाफ कथित धनशोधन मामले को लेकर एक विस्तृत जांच शुरू की गई है। नई सरकार के निर्देश पर जांच में जुटे अधिकारियों को वित्तीय गड़बड़ियां मिली हैं। उन्हें इन नेताओं की संपत्तियों के दस्तावेज में विसंगतियां दिखी हैं।
काठमांडो में पुल्चोक स्थित संपत्ति शुद्धिकरण अनुसंधान विभाग (डीएमएलएआइ) की ओर से नेपाल पुलिस के केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीआइबी) की मदद से पूर्व प्रधानमंत्रियों शेर बहादुर देउबा, केपी शर्मा ओली और पुष्पकमल दहाल के साथ ही पूर्व मंत्रियों आरजू राणा देउबा और दीपक खड़का के खिलाफ गहन जांच की जा रही है। मामला अब अदालत में है, सरकार की तरफ से जवाब आने पर सुनवाई शुरू होगी। यह नेपाल में नया राजनीतिक परिदृश्य है।
पिछले हफ्ते डीएमएलएआइ ने पुलिस मुख्यालय को एक पत्र भेज कर जांच में सहयोग मांगा था। इस अनुरोध पर कार्रवाई करते हुए नेपाली कांग्रेस के नेता और पूर्व मंत्री दीपक खड़का और नेकपा-एमाले अध्यक्ष व पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को पिछले दिनों उनके निवास से गिरफ्तार कर लिया गया। मामले को विस्तृत जांच के स्तर तक ले जाने से पहले संपत्ति शुद्धिकरण अनुसंधान विभाग ने लगभग छह महीनों तक शुरुआती पूछताछ की थी।
दरअसल, यह चर्चा आम थी कि अब सरकार उस पार्टी की है, जिसके मुखिया रबी लामिछाने करोड़ों रुपए के गबन और धनशोधन जैसे गंभीर मामले में जेल में थे। इस तरह की चर्चा किसी भी सरकार को स्वतः कठघरे में खड़ा कर देती है। यह कार्रवाई भी इसकी कवायद लगती है कि देश के उन दिग्गज चेहरों का मुखौटा उतारो, जो बरसों से सत्ता में थे। माना जा रहा है कि नेपाल में नया निजाम अब यह चाह रहा है कि धनशोधन और दूसरे गैरकानूनी कार्यों में कथित रूप से संलिप्त पूर्व मंत्रियों और प्रधानमंत्रियों के कृत्यों का भी पर्दाफाश हो, ताकि कोई यह न कह सके कि सत्ताधारी पक्ष के सर्वोच्च नेता लामिछाने का अतीत दागदार रहा है।
नेपाल के पूर्व उपप्रधानमंत्री एवं राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के अध्यक्ष लामिछाने पर मुख्य रूप से सहकारी संस्थाओं से करोड़ों रुपए के गबन, संगठित अपराध और धनशोधन के गंभीर मामले चल रहे हैं। पूर्व पत्रकार रहे लामिछाने पर आरोप है कि उन्होंने अवैध रूप से सहकारी समितियों का पैसा अपने निजी खाते और गोरखा मीडिया नेटवर्क के खातों में डलवाए थे। पुलिस जांच में पाया गया था कि 16 अरब रुपए लेकर नेपाल से फरार जीबी राई के साथ मिल कर सहकारी घोटालों के पीछे मुख्य साजिशकर्ताओं में से एक रबी लामिछाने थे। अक्टूबर 2024 में गिरफ्तार होने के बाद से उन पर जिला अदालतों में मामले चल रहे हैं।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, नेकपा-एमाले अध्यक्ष केपी शर्मा ओली और कांग्रेस नेताओं की गिरफ्तारियों से यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि नेपाल की जनता देखे कि इन सभी की कमीज, रबी लामिछाने की कमीज से भी गंदी है। इस जांच की शुरुआत विरोध प्रदर्शनों के ठीक अगले दिन नौ सितंबर 2025 को हुई थी। उस दिन हुई तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाओं के बाद सामने आई तस्वीरों में देउबा, खड़का और प्रचंड के घरों में जले हुए कई नोट दिखाई दिए थे।
पूर्व ऊर्जा मंत्री खड़का को नौ सितंबर की घटनाओं के दौरान उनके घर से बरामद पैसों की जांच के सिलसिले में हिरासत में लिया गया। हालांकि, अधिकारियों ने अन्य आरोपियों के खिलाफ चल रही जांच के बारे में और जानकारी का खुलासा नहीं किया है। पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा की पत्नी आरजू राणा देउबा सितंबर में हुए विरोध प्रदर्शनों तक विदेश मंत्री के पद पर थीं। मगर इस समय वह स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों के उपचार के लिए हांगकांग में हैं। देउबा के बेटे जयवीर सिंह देउबा और उनके रिश्तेदार भूषण राणा देश से बाहर हैं।
28 सितंबर, 2025 को विभाग ने ज्वालाखेल स्थित राणा के घर पर छापा मारा और वहां से कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण तथा दस्तावेज जब्त किए। कुछ दिनों बाद उनके रिश्तेदारों के यहां भी छापे मारे गए। नई सरकार की कार्रवाई से लगता है कि देउबा परिवार की मुश्किलें अभी कम नहीं होने वाली हैं।
आठ से 13 सितंबर, 2025 को आंदोलन के समय हुए उग्र प्रदर्शन में देशभर में 76 लोगों की जान चली गई थी। जबकि दो हजार से ज्यादा लोग घायल हुए थे। इस तोड़फोड़ और आगजनी में करीब 85 अरब रुपए की सरकारी संपत्ति का नुकसान हुआ था। संसद तक को लाक्षागृह बना दिया गया। अंततः पिछले साल नौ सितंबर को तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और उनके सभी मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा था।
इस पूरे मामले की जांच पर बने कार्की कमीशन की जो रिपोर्ट आई, उसमें लामिछाने को बचाने की कोशिश साफ-साफ दिखती है। नेपाल पुलिस के अधिकारी भी कार्की कमीशन की रिपोर्ट को पूरी तरह से एकतरफा मानते हैं। सबसे गंभीर आरोप यह कि नक्खू जेल में भगदड़ और कैदियों के भागने की वजह लामिछाने थे, जो सहकारी ठगी, संगठित अपराध और धनशोधन के मामले में बंद थे। उस शख्स को जबरदस्ती छुड़ा ले जाने के क्रम में गोलीकांड हुआ, जिसमें दस कैदी मारे गए।
कार्की कमीशन कैसे लामिछाने को जिम्मेदारी से मुक्त कर सकता है? वैसे भी जिस पार्टी के बूते बालेंद्र शाह नेपाल के प्रधानमंत्री बने हैं, उसके मुखिया के खिलाफ कार्रवाई की हिमाकत वे कैसे कर सकते हैं? माना जा रहा है कि अभी लामिछाने पर जितने मामले चल रहे हैं, उनसे उन्हें बरी कराने की कोशिश बालेंद्र सरकार कर सकती है। दरअसल, लामिछाने पर आपराधिक मामले नहीं चल रहे होते, तो बालेंद्र शाह को काठमांडो के महापौर पद से सीधे प्रधानमंत्री की सर्वोच्च कुर्सी नसीब नहीं होती।
नेपाल में युवाओं के उग्र विरोध प्रदर्शन के दौरान वहां की सेना की भूमिका पर भी सवाल है। कार्की कमीशन की रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया कि सेना ने भीड़ को मुख्य रूप से गृह मंत्रालय की ओर बढ़ने से रोकने की बहुत कम कोशिश की। जबकि मंत्रालय का रास्ता उस इलाके से होकर गुजरता है, जहां सेना की बटालियन है।
सत्ता में आ जाने के बाद भी बड़ी चुनौती नेपाल की घरेलू समस्याओं को निपटाना है। राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने चुनावों से पहले सौ वादों की एक सूची जारी की थी और संकल्प किया था कि सत्ता में आने पर वह इन्हें लागू करेगी, लेकिन ऐसे आरोप लग रहे हैं कि शपथ के बाद ही बालेंद्र सरकार बदले की राजनीति पर उतर आई है।
नेपाल में नई सरकार के समक्ष दूसरा मोर्चा है विदेश नीति का। नेपाल को चीन और भारत के साथ अमेरिका से कैसे संतुलन साध कर चलना है, यह एक विकट सवाल है। पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली जाते-जाते लिपुलेख-लिम्पियाधुरा का ऐसा विवाद छोड़ गए हैं कि इसे समेटना चंद दिनों पहले आई नई सरकार के लिए मुश्किल है। जबकि जून 2026 में लिपुलेख से व्यापार के लिए भारत-चीन पूरी तैयारी कर चुके हैं। अभी कई चुनौतियां सामने हैं और फिलहाल आगे की डगर कठिन नजर आती है।
