नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह की विदेश यात्राओं की वरीयता को लेकर काठमांडो के राजनीतिक गलियारों में चल रही कयासबाजी पर विराम लग गया है, क्योंकि उनकी भारत यात्रा पर अब मुहर लग गई है। दरअसल, भारत ने बालेन शाह को यहां आने का निमंत्रण दिया था, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया है।
नेपाल की राजनीति में भारत और खासकर बालेन शाह की विदेश नीति को लेकर इसे बड़े बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। नेपाल में अपना प्रभाव बढ़ा रहे चीन और अमेरिका बालेन की प्रथम विदेश यात्रा पर टकटकी लगाए हुए थे। वे उनकी विदेश यात्रा में अपने-अपने देश को प्राथमिकता मिलने की उम्मीद कर रहे थे।
नेपाल का प्रधानमंत्री बनने के बाद बालेन शाह की सरकार चलाने की कार्यशैली कुछ ऐसी थी कि उन्हें और उनकी विदेश नीति को समझ पाना मुश्किल था। अब जब भारत का उनका दौरा लगभग तय हो गया है, तो अमेरिका और चीन का चौकन्ना होना स्वाभाविक है। राजनीतिक विश्लेषकों की दृष्टि में यह भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत है।
प्रधानमंत्री बालेन शाह ने सत्ता संभालते ही यह संदेश दिया था कि विदेशी राजदूतों और राजनयिकों की प्रधानमंत्री कार्यालय तक सीधी पहुंच समाप्त की जाएगी और किसी भी विदेशी प्रतिनिधि से निजी मुलाकात नहीं की जाएगी। मगर अब उन्होंने अपनी शुरुआती नीति में बदलाव करते हुए करीबी सलाहकारों के माध्यम से भारत और चीन से सीधे संपर्क स्थापित करने की पहल शुरू कर दी है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने अपने करीबी सलाहकारों तथा पार्टी के वरिष्ठ नेताओं, खासकर पार्टी अध्यक्ष रवि लामिछाने और विदेश मंत्री शिशिर खनाल से चर्चा के बाद अपनी पहली विदेश यात्रा में भारत को प्राथमिकता दी है।
दरअसल, प्रधानमंत्री बालेन शाह के प्रमुख सलाहकार कुमार व्यंजनकार की जुलाई के पहले सप्ताह में नई दिल्ली की यात्रा के बाद ही उनकी भारत यात्रा के कार्यक्रम में तेजी आई। यह सब इतना गोपनीय रखा गया कि इसकी भनक नेपाल के विदेश मंत्रालय तक को नहीं लगने दी गई।
नेपाल के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बेशक बालेन शाह की भारत यात्रा की रूपरेखा गोपनीय रखी गई, लेकिन इसकी जानकारी पार्टी अध्यक्ष रवि लामिछाने को जरूर रही होगी, क्योंकि कुछ दिन पहले ही वे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के आमंत्रण पर भारत की पांच दिवसीय यात्रा पर गए थे।
नेपाल में जब भी सत्ता परिवर्तन होता है, तो वहां के नए प्रधानमंत्री की पहली विदेश यात्रा की प्राथमिकता पर भारत, चीन और अब अमेरिका की नजर जरूर रहती है। नेपाल में अपना प्रभाव बढ़ाने में लगातार सक्रियता बढ़ा रहे ये तीनों देश बालेन शाह की अपने-अपने देश की यात्रा को लेकर सक्रिय थे।
पिछले दिनों अमेरिका और चीन के राजनयिक तथा शीर्ष नौकरशाह काठमांडो पहुंचे थे, लेकिन बालेन शाह की मुलाकात किसी से नहीं हुई। उन्होंने नेपाल की आंतरिक और बाह्य समस्याओं के समाधान में व्यस्तता के बीच विदेशी प्रतिनिधियों से मिलना जरूरी नहीं समझा।
बालेन शाह की भारत यात्रा की पुष्टि के बाद नेपाल की विदेश नीति में बदलाव को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, प्रधानमंत्री बालेन शाह के भारत दौरे के पीछे जो प्रमुख कारण हो सकता है, वह यह कि भारतीय मीडिया में हाल के दिनों में उनकी सरकार को लेकर लगातार आलोचनात्मक खबरें आई हैं। कुछ रिपोर्टों में सरकार की लोकप्रियता घटने और उसके अधिक समय तक न टिक पाने के दावे किए गए, जिससे सरकार के भीतर नई कूटनीतिक पहल की आवश्यकता महसूस की गई।
इसके अलावा नेपाल की मौजूदा सरकार पर घरेलू स्तर पर भी राजनीतिक दबाव बढ़ रहा है। भूमिहीनों के पुनर्वास, पासपोर्ट छपाई विवाद, गणेश नेपाली आत्मदाह प्रकरण तथा अन्य प्रशासनिक मुद्दों पर सरकार को लगातार आलोचना का सामना करना पड़ा है।
ऐसे में माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री बालेन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी सक्रियता बढ़ाकर संतुलन बनाने की कोशिश में हैं, जिसकी शुरुआत के क्रम में भारत यात्रा भी शामिल है। उनकी भारत यात्रा का उद्देश्य दो तरफा है।
दोनों देशों के बीच कई ऐसे मुद्दे हैं, जिनका समाधान बातचीत के जरिए ही संभव है। भारत और नेपाल के बीच संबंध चूंकि मैत्रीपूर्ण हैं, रोटी-बेटी का रिश्ता है, भौगोलिक दृष्टि से भी नेपाल भारत के बेहद करीब है। ऐसे में दोनों देश कभी नहीं चाहेंगे कि वे एक-दूसरे से दूरी बनाकर रहें।
दोनों देशों के बीच अभी जिन ताजा मसलों पर चर्चा की संभावना है, उनमें सीमा विवाद, हवाई मार्ग और जलविद्युत परियोजनाएं प्रमुख हैं।
द्विपक्षीय बातचीत में सीमा विवाद पर उत्तराखंड का भू-क्षेत्र लिपुलेख, लिंपियाधुरा और कालापानी का मुद्दा प्रमुख हो सकता है। मानसरोवर मार्ग से भारत-चीन के बीच व्यापारिक समझौते पर नेपाल को आपत्ति है।
नेपाल के पश्चिमी हवाई क्षेत्र पर भी बातचीत संभव है, जहां से पोखरा और भारतीय सीमा से सटे भैरहवा हवाई अड्डे के लिए नए रूट पर बात हो सकती है। जलविद्युत परियोजनाओं और नेपाल से बिजली निर्यात के समझौते की समीक्षा भी संभव है।
प्रधानमंत्री के रूप में बालेन शाह ने जो सख्त रुख अख्तियार किया था, अब उसमें कई बदलाव देखे जा रहे हैं। केवल विदेश नीति ही नहीं, बल्कि आर्थिक सुधारों पर भी उन्होंने काम शुरू कर दिया है।
देखने में आया है कि कई मामलों में वित्त मंत्रालय को दरकिनार कर बालेन शाह सीधे निजी क्षेत्र से संवाद कर रहे हैं। पिछले कुछ हफ्तों में उन्होंने उद्योगपतियों, निर्माण व्यवसायियों, ऊर्जा उत्पादकों, होटल व्यवसायियों, महिला उद्यमियों, जूता उद्योग, शेयर बाजार से जुड़े प्रतिनिधियों और प्रतिभूति बोर्ड के साथ लगातार बैठकें की हैं।
शेयर बाजार से जुड़े प्रतिनिधियों से मुलाकात के दौरान बालेन शाह ने स्वीकार किया कि सरकार की नीतियों के कारण निवेशकों के भरोसे में कमी आई है। प्रधानमंत्री पहले अपने निर्णय को ही अंतिम और बेहतर मान रहे थे, मगर अब उनके फैसलों में भी बदलाव देखने को मिला है।
इसी क्रम में उन्होंने हाल ही में राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी के अध्यक्ष राजेंद्र और अन्य नेताओं से भी मुलाकात कर समसामयिक राजनीतिक मसलों पर विस्तार से चर्चा की।
इसके अलावा, निजी शिक्षा और स्वास्थ्य संस्थानों पर लगाए गए तीन फीसद समता कर को लेकर व्यापक विरोध के बाद प्रधानमंत्री बालेन शाह ने पहले सोशल मीडिया के माध्यम से इसे वापस लेने की घोषणा की और बाद में मंत्रिपरिषद ने भी इस निर्णय को औपचारिक मंजूरी दे दी।
इन सभी घटनाक्रमों के बीच नेपाल की राजनीति में यह चर्चा तेज है कि प्रधानमंत्री बालेन शाह अब अपनी शुरुआती नीतियों से हटकर अलग रास्ता अपनाने, हर मामले में सक्रिय रहने तथा प्रत्यक्ष एवं स्वतंत्र कूटनीतिक प्रयासों को तेज करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नेपाल की कूटनीति में यह बदलाव आर्थिक समृद्धि, द्विपक्षीय स्पष्टता और संस्थागत संबंधों पर केंद्रित है। नए नेतृत्व के तहत नेपाल अपनी विदेश नीति को पुराने तौर-तरीकों से बदलकर राष्ट्रीय हितों और विकास पर केंद्रित करने का प्रयास कर रहा है।
