सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली एक जीवंत लोकतांत्रिक समाज का मजबूत आधार है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (एनईपी) ने इसे परिवर्तित, सुधारे गए और अधिक सक्षम बनाने के लिए अनेक प्रावधान किए हैं। चाहे सरकार द्वारा संचालित स्कूल हों या निजी संस्थान, शिक्षा सब तक समान रूप से पहुंचनी चाहिए। शिक्षा शास्त्रियों का मानना है कि सरकारी और निजी, दोनों क्षेत्रों में योजनाबद्ध तरीके से काम करने की संस्कृति एक जैसी होनी चाहिए। अगर शिक्षा प्रणाली और प्रबंधन में एकरूपता आ जाए, तो वर्ग-भेद मिट जाएंगे। शिक्षा के मंदिरों का स्वरूप भी लगभग एक समान होना चाहिए। निजी विद्यालयों पर नियमों की भरमार हो और सरकारी स्कूलों में उनकी अनदेखी हो, यह स्वीकार्य नहीं। अगर निजी स्कूल संसाधनों या नियमों के अभाव में कमजोर पड़ते हैं, तो उनकी मान्यता रद्द हो सकती है। उसी प्रकार, सरकारी विद्यालयों में नियमों की अवहेलना पर उनकी मान्यता रद्द करने का प्रावधान अनिवार्य होना चाहिए।

एनईपी-2020 शिक्षा प्रणाली में गुणात्मक और योजनाबद्ध तरीके का भरोसा दिलाती है। पांच वर्ष बीतने के बावजूद इसके उज्ज्वल परिणाम अभी देखना शेष है, लेकिन यह स्कूलों, संस्थानों, शिक्षकों, अधिकारियों, समुदायों और हितधारकों को सशक्त बनाने तथा संसाधनों से परिपूर्ण रखने वाली संस्कृति विकसित करने का वादा करती है। साथ ही, जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए पारदर्शी सार्वजनिक स्व-प्रकटीकरण पर जोर दिया गया है। शिक्षा संस्थानों में उपयोगी संसाधनों का समुचित उपयोग सभी को लाभान्वित करता है। स्कूल प्रबंधन में खेलकूद के साधन, कक्षाओं की उपलब्धता और स्थानीय नागरिकों का जुड़ाव शिक्षा व्यवस्था को ऊर्जावान बनाता है। मगर बच्चों के लिए आवश्यक संसाधनों के अभाव में बीच में पढ़ाई छोड़ने की समस्या बनी रहती है। विशेष रूप से छात्राओं के लिए स्कूल समय के दौरान निजी जरूरतों की व्यवस्था पर गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है।

भारत जैसे विकासशील देश के अधिकांश स्कूलों में- चाहे वे केंद्र या राज्य सरकार के हों या निजी- छात्राओं के लिए पर्याप्त शौचालयों का अभाव है। मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता की मूलभूत सुविधाओं का न होना छात्राओं को शिक्षा से दूर कर देता है। अगर शौचालयों के साथ-साथ सैनिटरी पैड और माहवारी स्वच्छता के मौलिक अधिकार पर ध्यान न दिया जाए, तो छात्राओं की स्कूल से दूरी बढ़ती जाएगी। आमतौर पर देखा जाता है कि सरकारी स्कूलों में स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा सैनिटरी पैड मशीनें लगाई जाती हैं, लेकिन कुछ समय बाद खराब होने पर ये सरकार की प्राथमिकता सूची से बाहर हो जाती हैं। अनेक मामलों में शौचालय ताले में बंद रहते हैं, जिससे छात्राओं को खुले में शौच के लिए मजबूर होना पड़ता है। यह न केवल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, बल्कि सामाजिक कुप्रथा को भी बढ़ावा देता है।

विचित्र है कि भारत में ऐसे जरूरी मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट या अन्य न्यायालयों को सक्रिय होना पड़ता है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षण प्रबंधन शिक्षा-शास्त्रियों और उच्च वेतनभोगी नौकरशाहों की सोच का हिस्सा क्यों नहीं बन पाता? सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में स्कूलों में छात्र-छात्राओं के लिए अलग-अलग शौचालयों का निर्माण अनिवार्य किया है, ताकि छात्राएं अपने मौलिक अधिकारों का उपयोग कर सकें। यह सुविधा मध्य, माध्यमिक और उच्च शिक्षा स्तर पर समान रूप से लागू होनी चाहिए। फिर भी, जमीनी स्तर पर कार्यान्वयन कमजोर है।

सरकार को प्रत्येक स्कूल में छात्राओं को जैविक रूप से अपघटनीय सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने चाहिए। स्कूल प्रबंधन सरकारी हो या गैर-सरकारी, अगर शौचालय या स्वच्छता संबंधी सुविधाएं प्रदान करने में असफल रहता है, तो उनकी जवाबदेही तय करते हुए मान्यता रद्द की जानी चाहिए। नई शिक्षा नीति केवल पढ़ने-लिखने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। प्रबंधन के दृष्टिकोण से इसके मसविदे पर पुनर्विचार आवश्यक है। छात्राओं के लिए माहवारी स्वच्छता को नीति का प्रभावी हिस्सा बनाना होगा।

नई शिक्षा नीति- 2020 ने स्कूलों को संसाधन-संपन्न बनाने और जवाबदेही सुनिश्चित करने का वादा किया है, लेकिन छात्राओं की इन बुनियादी जरूरतों पर ठोस प्रावधानों का अभाव है। अगर इस संवेदनशील विषय पर ध्यान न दिया गया, तो बीच में पढ़ाई छोड़ने की समस्या तो बढ़ेगी ही, साथ ही लिंग भेदभाव गहरा जाएगा। छात्राएं शिक्षा से वंचित रहेंगी, जो राष्ट्र निर्माण के लिए घातक होगा। सरकार, शिक्षा विभाग और स्थानीय प्रशासन को जरूरी कदम उठाने चाहिए। प्रत्येक स्कूल में छात्राओं के लिए अलग, स्वच्छ और कार्यशील शौचालय अनिवार्य किए जाने की जरूरत है।

अनेक अध्ययनों में यह तथ्य उजागर हो चुका है कि स्वच्छ शौचालय और पेयजल के अभाव के कारण बहुत सारी लड़कियां अपनी स्कूली पढ़ाई बीच में ही छोड़ देती हैं। इसके अलावा, माहवारी से जुड़ी परेशानियों को लेकर भी समाज में लोग सहज नहीं होते और इसका खमियाजा महिलाओं और लड़कियों को उठाना पड़ता है। ऐसी स्थिति में जैविक रूप से अपघटनीय सैनिटरी पैड स्कूल प्रबंधन द्वारा मुफ्त उपलब्ध कराया जाना चाहिए। मशीनों के रखरखाव के लिए नियमित निगरानी और कोष सुनिश्चित करने की जरूरत है। मान्यता रद्द करने जैसे सख्त प्रावधान लागू किए जाने चाहिए। जागरूकता अभियान चलाकर मासिक धर्म को संकीर्ण सोच से मुक्त किए जाने की जरूरत है। यदि एनईपी को इन मुद्दों से समृद्ध किया जाए, तो यह वास्तव में समावेशी और सशक्तीकरण लाने वाली बनेगी। आधी आबादी को शिक्षा का पूर्ण अधिकार दिलाने के लिए अब ठोस कार्रवाई जरूरी है।

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