नई पीढ़ी सर्वत्र चर्चा में है। वे क्या सोचते हैं, कैसा व्यवहार करते हैं, किस प्रकार की भौतिकवादी संस्कृति को अपना रहे हैं, ये परिवार से लेकर चौक-चौराहे तक चर्चा में रहता है। मगर यह चर्चा चिंता, आलोचना, गपशप तक सिमट कर रह जाती है। इस पर चिंतन करने की जरूरत तो है, मगर फुर्सत किसी को नहीं है। इसके लिए एक आसान कारण ढूंढ़ा जाता है। वह है भौतिकता का दबदबा।

इसके परिणामों का सबसे अधिक असर नई पीढ़ी पर माना जाता है, लेकिन भौतिकता से भयभीत होना अपनी अक्षमता और विफलता पर पर्दा डालना है। इतिहास के अनेक कालखंडों में समृद्धि ने आसमान छुआ, मगर उससे सामाजिक भविष्य खतरे में नहीं आया।

मूल प्रश्न यह है कि नियंत्रित भौतिकता और नैतिक उपभोग के लक्ष्य के लिए हम क्या कर रहे हैं? नियंत्रित भौतिकता का अर्थ समृद्धि में समाज की साझेदारी है। ऐसा होने से भौतिक प्रगति असंतुलित नहीं होती है और सामाजिक दबाव उस पर बना रहता है। मगर पूरी दुनिया में नवउदारवाद समाज की साझेदारी को घटा रहा है। सब कुछ बाजार तय करता है। उदाहरण सामने हैं- बाजार ने तय कर लिया कि सौंदर्य प्रसाधन उद्योग को बढ़ाना है, तो हम सब उसके उपक्रम बन गए।

वर्ष 2010 में वैश्विक सौंदर्य प्रसाधन उद्योग छत्तीस हजार करोड़ रुपए का था, जो 2025 में 61 हजार करोड़ रुपए से अधिक हो गया है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि बाजार हमारी इच्छा, उपयोगिता और मांग निर्धारित करता है। इससे स्पष्ट है कि आज लोग बाजार के लिए एक आंकड़ा बनकर रह गए हैं। बाजार हमें उपभोग की किसी भी इच्छा की पूर्ति के लिए असीमित स्वतंत्रता देता है। इसलिए यह हमारे सामाजिक संबंधों और स्वतंत्रता को भी निर्धारित करने लगा है। विज्ञान शरीर को सुविधा देने वाली खोज कर सकता है, पर सामाजिकता और संवेदनशीलता पैदा नहीं कर सकता।

ऐसे में ‘नैतिक उपभोग’ महत्त्वपूर्ण हो जाता है। इसका अर्थ है उपभोग मानवीय संवेदना और सामाजिक सरोकारों के दायरे में किया जाना। मगर बाजारवाद असीमित और शरीरवादी मानसिकता पैदा कर रहा है। इसलिए विलासितापूर्ण जीवन पर जो सामाजिक दबाव होना चाहिए उसका क्षरण हो रहा है। नवउदारवाद मनुष्य की चिंतनशील प्रकृति को बदल रहा है। इसका पहला निशाना शिक्षा है। परंपरागत शिक्षा का ध्येय सिर्फ पेट भरने के लिए सक्षम होना नहीं, बल्कि मनुष्य को सामाजिक हित से जोड़ना है।

इसी को रामचंद्र शुक्ल ने गेंहू और गुलाब के बीच संतुलन कहा था। वे समानता, न्याय और स्वतंत्र चिंतन के भाव को मानव समाज की उन्नति के लिए आवश्यक मानते हैं। नवउदारवादी व्यवस्था आलोचनात्मक विचार को खतरनाक मानती है। इसीलिए यह तकनीक तथा शरीर एवं सौंदर्य को केंद्र में रखकर अलग संस्कृति सृजन को प्रोत्साहित करती है। समाज को सामूहिक रूप से चेतना शून्य करने के लिए इसने शिक्षा की परिभाषा ही बदल दी है।

अब ज्ञान को आर्थिक दृष्टि से परखा और तौला जाने लगा है। जिस ज्ञान से उत्पादन-वितरण और उपभोग में लाभ हो, उसी को प्राथमिकता दी जाने लगी है। तभी तो जापान ने वर्ष 2015 में विश्वविद्यालयों से कहा कि समाज शास्त्र और साहित्य के दायरे को कम किया जाए। इसके दस साल बाद न्यूजीलैंड ने मार्सडेन फंड से सामाजिक विज्ञान को मिलने वाली सहायता को समाप्त कर दिया। पश्चिम का कोई भी देश अमेरिका हो या ब्रिटेन इसका अपवाद नहीं है। सामाजिक विज्ञान अब सिर्फ दिन-प्रतिदिन की जरूरतों की जानकारी का विषय बनता जा रहा है।

सामाजिक विज्ञान को आर्थिक संदर्भ में जब मापा जाएगा, तब इसका उत्तर शून्य होगा। यह मन और मस्तिष्क को आलोचनात्मक दृष्टिकोण से चीजों को परखने की क्षमता एवं साहस पैदा करता है, जिसे बाजार नापसंद करता है। आज हम संक्षेप में जानकारियों की प्रचुरता और ज्ञान की दुर्लभता के युग में प्रवेश कर रहे हैं। भारत ने इस खतरे को पहचाना है। जहां दुनिया भर में सामाजिक विज्ञान पर शोध में मितव्ययिता बरतने की सरकारी नीति है, वहीं भारत में सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में बजट बढ़ाया जा रहा है।

शोध करने वाली संस्था भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद का बजट जो वर्ष 2019 में 157 करोड़ रुपए था, उसे बढ़ाकर वर्ष 2024 में 238 करोड़ रुपए कर दिया गया। यह मौजूदा सरकार की ओर से नवउदारवाद की आधारभूत मान्यताओं को चुनौती देने की तरह है। देश की नई शिक्षा नीति एक अवसर है ज्ञान के महत्त्व को पुनर्स्थापित करने का। इसमें भारत का इतिहास हमें राह दिखाता है।

जब भौतिकता का ज्ञान पर हमला होता है, तब ज्ञान की समांतर धारा का प्रस्फुटन होता है, जो स्थापित संरचनाओं से बाहर होता है। मध्यकाल में संत रविदास, ज्ञानदेव और नामदेव से लेकर, एकनाथ, समर्थ रामदास जैसे लोगों ने समाज को शिक्षित किया, भटकाव से रोका। समाज की सोच-समझ और इसके साझे मूल्यों को संबल देने का काम राज्याश्रय से बाहर रहकर तुलसी, सूर, रामानुज, नागार्जुन, प्रेमचंद, दिनकर, फणीश्वर नाथ रेणु जैसे लोगों ने कालजयी रचनाओं के जरिए किया। इसमें न्याय, स्वतंत्रता और समानता तीनों का व्यक्तित्व में शामिल होने का प्रयास है।

भारत की ज्ञान परंपरा पश्चिम की समकालीन नवउदारवादी परंपरा का सकारात्मक विकल्प है। कुछ वर्ष पहले प्रकाशित ‘द लास्ट एज आफ रीजन’ नामक पुस्तक में भारतीय ज्ञान शैली के वर्णन में एक कहानी का उल्लेख है। बंगाल के नादिया में शिक्षक रामनाथ ने एक शिक्षण केंद्र खोला। उनकी प्रसिद्धि बढ़ने पर राजा शिवचंद्र वहां गए और एक-एक करके विद्यार्थियों, रामनाथ और उनकी पत्नी के समक्ष सहायता की पेशकश की। मगर सबने सहायता लेने से मना कर दिया। यह कहानी सांकेतिक है, लेकिन नवउदारवाद की वैकल्पिक धारा बनने की प्रेरणा देती है।