प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के शासन की अवधि का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। मगर दोनों शासन के दिनों या वर्षों की गिनती के कारण नहीं, बल्कि अपनी अलग-अलग दृष्टियों के कारण इतिहास के न्यायालय में आमने-सामने हैं।

कुछ लोग इसे नेहरू को छोटा दिखाने का प्रयास मानते हैं, पर ऐसा सोचना अनुचित है। इतिहास तर्क से अधिक तथ्यों, भावना की जगह विवेक को मापदंड बनाता है। लोकतंत्र तो तुलना का ही अर्थशास्त्र है। यही इसे जीवंत बनाए रखता है।

मगर समस्या तब हो जाती है, जब अविवेकवादियों की फौज तुलना को नारेबाजी मान लेती है। भारत के लोग ऐतिहासिक रूप से भावना प्रधान रहे हैं। यह कोई नई या अजीब बात नहीं है।

सूरदास के भ्रमरगीत में एक प्रसंग भगवान कृष्ण के मित्र उद्धव और ब्रज की गोपियों के बीच का है। उद्धव ज्ञान और विवेक के मार्ग पर चलने के लिए जाने जाते थे। वे गोपियों को इसकी शिक्षा देने गए।

इस पर गोपियों ने कहा, ‘ऊधो, मन माने की बात।’ इसका तात्पर्य है कि तथ्य और तर्क अपनी जगह सही हैं, पर मन को जो अच्छा लगता है, हम वही करते हैं। मगर लोकतंत्र में ‘मन माने की बात’ नहीं, आलोचनात्मक भाव होना चाहिए। यही व्यवस्था को अंदर से उपज रही विसंगतियों से बचाता है।

मोदी और नेहरू के बीच सबसे अधिक अंतर स्वतंत्रता के अधिकारों पर किया जाता है। सबसे रोचक पहलू यह है कि व्यक्तिगत जिंदगी से लेकर सरकार के खिलाफ कुछ भी बोलने वाले सार्वजनिक मंचों, टीवी स्टूडियो और संसद में यह सब बोलने की स्वतंत्रता का निष्कंटक उपयोग कर अंत में जरूर कहते हैं कि बोलने की आजादी नहीं है। ऐसे लोग नेहरू युग को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का स्वर्णिम काल मानते हैं। या तो वे तथ्यों से अवगत नहीं हैं या नेहरू के प्रति आसक्ति में डूबे हैं।

स्वतंत्रता सेनानी वी.डी. त्रिपाठी संविधान सभा के सदस्य और सुभाषचंद्र बोस द्वारा स्थापित फॉरवर्ड ब्लॉक के सचिव थे। विडंबना देखिए, उन्हें सुभाषचंद्र बोस की जयंती के दिन ही 1948 में गिरफ्तार कर लिया गया।

संविधान सभा में एच.वी. कामत ने जब 27 जनवरी 1948 को इस मुद्दे को उठाया, तब उन्हें नेहरू की बोस के प्रति नापसंदगी समझ में आई। यही नापसंदगी और वैचारिक असहिष्णुता बाद के वर्षों में नेहरूवादी विचारधारा बन गई।

तभी तो बोस की प्रतिमाएं दिल्ली में नहीं लगाए जाने पर मार्च 1965 में संसद में हेम बरुआ ने कहा था कि बोस को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। वर्ष 2022 में मोदी ने उन्हें इंडिया गेट पर सम्मान दिया। इतिहास को सर्वसमावेशी बनाना किसी को छोटा करना नहीं होता है।

आलोचनाओं को सुनने की क्षमता का जितना ऊंचा सूचकांक होता है, राजनेता की नैतिक ताकत उतनी ही बढ़ती है। गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी भारत को ‘राष्ट्रमंडल’ का सदस्य बनाए जाने के विरोधी थे।

उन्होंने मुंबई में मिल मजदूरों के बीच एक कविता पढ़ी, जिसकी एक पंक्ति थी, ‘कामनवेल्थ का दास है नेहरू।’ इसके लिए उन्हें दो साल जेल में काटने पड़े। नेहरू और मोदी में बड़ा वैचारिक अंतर है। नेहरू की यूरोप की अतिशय सामाजिकता ने उन्हें भारत की अंतरात्मा से दूर कर दिया।

संविधान सभा में सदस्यों ने वायसराय का वेतन घटाने की मांग की, जिसे नेहरू ने नकार दिया। 30 अगस्त 1948 को कामत की टिप्पणी थी, ‘क्या मैं यह मान लूं कि महात्मा गांधी के उच्च विचारों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है?’

यह तब की बात है, जब देश की बड़ी आबादी भुखमरी की शिकार थी। एक और कचोटने वाली बात है। वायसराय माउंटबेटन 21 जून 1948 को ब्रिटेन वापस चले गए। उन्होंने अनैतिक रूप से कार्यकाल के तीन महीने में ही पूरे वित्तीय वर्ष का भत्ता स्वाहा कर दिया।

संविधान सभा में महावीर त्यागी और कामत क्रोधित थे। नेहरू का जवाब था, ‘वायसराय ने भारत की गहन और विस्तृत यात्रा की है।’ बाद में ऐसा बोलने वालों का अकाल पड़ता चला गया। भारतीय जनता पार्टी एक वैचारिक विकल्प है और उसी के गर्भ से राजनीतिक विकल्प बनी है। इसलिए भारत को देखने का दोनों का नजरिया अलग-अलग होना स्वाभाविक है।

ऐसा नहीं है कि भारत की संस्कृति से नेहरू अपरिचित थे। वे वेद, उपनिषद, बुद्ध और महावीर को उद्धृत करते थे, पर उनका अल्पसंख्यक तुष्टीकरण दूध को मट्ठा बनाता रहा। स्वतंत्रता के बाद भारत की पहचान के लिए जो सांस्कृतिक उत्थान की अपेक्षा थी, उस पर पानी फिर गया। सोमनाथ मंदिर के निर्माण पर राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद से उनका टकराव इसका उदाहरण है।

उसी दिशा में संस्थाएं और बुद्धिजीवी खड़े हुए। ‘राजा से अधिक प्रतिबद्धता दिखाने वालों’ से नेहरू बच नहीं पाए। संस्थागत कमजोरियां और नारेबाजों की टोली कभी-कभी व्यवस्था की उपलब्धियों को झाड़-पोंछकर बराबर कर देती है।

मोदी भारत को एक सभ्यताई राष्ट्र के रूप में देखते हैं। इसलिए पिछले एक दशक में भारत अपनी प्राचीनता, बौद्धिक संपन्नता की विरासत और धर्म के प्रति आस्था में सहूलियत की अनुभूति कर रहा है।

भारतीय ज्ञान परंपरा को पिछले हजार साल में इतनी राजकीय अहमियत कभी नहीं मिली थी। मगर नेहरूवादी व्यवस्था में पले-बढ़े लोग अपने जीवनकाल में इसे उचित मान भी लेंगे, तो ऐसा अभिव्यक्त करना उनकी अपनी पहचान पर संकट लगता है।

नेहरू युग में औपनिवेशिक संस्कृति की निरंतरता कानूनों, संरचनाओं और सामाजिक दर्शन में आग्रहपूर्वक रही। तभी तो 1700 ऐसे कानूनों का, जो भारतीयों को ‘शासित’ जनता मानकर ब्रिटेन ने बनाए थे, अंत मोदी युग में हुआ। नेहरू के पास बौद्धिकों की बड़ी फौज थी। ऐसी फौज मोदी को नहीं मिली।

यही कारण है कि ‘सामाजिक संघर्ष’ के अतिशयोक्तिपूर्ण प्रचार के जाल में फंसकर यह नव-बौद्धिक वर्ग अपनी ऊर्जा का क्षरण तो करता ही है, उसका खाद-पानी भी बन जाता है। विचार-मंथन तथ्य और तर्क से चलना ही विमर्श की समृद्धि होती है।

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पंडित जवाहर लाल नेहरू और नरेंद्र मोदी का एक-दूसरे के आमने-सामने हो जाना वैचारिक बहस की नियति है। यही सोमनाथ मंदिर के सवाल पर हो रहा है। 1026 ईस्वी में मोहम्मद गजनी ने इसका विध्वंस किया था। अब एक हजार साल बाद ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ मनाया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसके अभिन्न हिस्सा हैं। उनकी भागीदारी महज कर्मकांड नहीं होकर वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ है। पचहत्तर वर्ष पूर्व 1951 में सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ था, तब नेहरू उस पुनर्निर्माण के विरुद्ध थे। नेहरू का विरोध कर्मकांड नहीं था। उनकी भी अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता थी। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक