देश में जब भी किसी परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होता है, तो जांच के आदेश के बाद ‘मुख्य साजिशकर्ता की गिरफ्तारी’ और ‘दोबारा परीक्षा की तारीख’ जैसी बातों के शोर-शराबे के पीछे एक ऐसा कड़वा सच छिप जाता है। नीट परीक्षा के इस अंतहीन तमाशे और बार-बार होने वाले प्रश्नपत्र लीक ने भारत में एक नए किस्म के पलायन को जन्म दे दिया है। अब तक देश का युवा डॉक्टर बनने के बाद विदेश जाता था, लेकिन अब इस परीक्षा तंत्र से तंग आकर देश के मेधावी विद्यार्थी बारहवीं पास करते ही भारत छोड़ रहे हैं।
वे एक अनिश्चित और भ्रष्ट दलदल में अपनी उम्र के कीमती साल बर्बाद नहीं करना चाहते। नीट का प्रश्नपत्र लीक होना सिर्फ एक परीक्षा का रद्द होना नहीं है, बल्कि यह देश के उस भरोसे का टूटना है, जो एक विद्यार्थी अपनी व्यवस्था पर करता है। देश के भीतर चिकित्सा व्यवस्था के सुदृढ़ीकरण का दम भरने वाला शासन क्या इस कड़वे सच पर आत्ममंथन करने का साहस दिखाएगा कि उसने अपनी ही नई पीढ़ी को इस कदर बेगाना और विरक्त कर दिया है?
इस चौंकाने वाले पलायन, जनता के आक्रोश और व्यवस्था की गिरती साख को बचाने के लिए ‘लोक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) अधिनियम, 2024’ पूरे देश में लागू किया गया था। कागज पर यह कानून बेहद सख्त दिखाई देता है, लेकिन सत्ता के गलियारों में बैठे नीति-नियंताओं से यह पूछा जाना जरूरी है कि यह कानून लागू होने के बाद भी क्या परीक्षा माफिया और उन्हें राजनीतिक संरक्षण देने वालों में कोई वास्तविक खौफ पैदा हुआ है? क्या इस तथाकथित कड़े कानून के तहत अब तक किसी एक भी बड़े शिक्षा माफिया, सांठगांठ करने वाले शीर्ष अधिकारियों या प्रश्नपत्र बेचने वाले संगठित गिरोह के सरगना को ऐसी सजा मिली है, जो एक नजीर बन सके?
शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही का अभाव
सच यह है कि जब तक कानून केवल फाइलों की शोभा बढ़ाते हैं, तब तक यह पूरी कवायद केवल एक प्रशासनिक दिखावे और जनता के गुस्से को शांत करने वाला ‘प्रायोजित प्रबंधन’ ही साबित होती है। परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित, आधुनिक और पारदर्शी बनाने के लिए सरकार ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के पूर्व प्रमुख के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया था, जिसने अपनी रिपोर्ट में 101 अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिफारिशें की थीं। मगर विडंबना यह है कि उन सिफारिशों को ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया गया। इस तरह की नीतिगत और प्रशासनिक विफलता की सबसे कारुणिक कीमत उस मध्यवर्गीय परिवार को चुकानी पड़ती है, जिसके जीवन का संघर्ष सत्ता के वातानुकूलित कमरों में बैठे हाकिमों को कभी नजर नहीं आता।
उस घर की दहलीज पर कदम रखकर देखा जा सकता है, जहां बेटे या बेटी के कमरे की मेज पर अभी भी आधी खुली हुई किताबें, कलम और कॉपियां हैं, लेकिन आंखों के आगे पसरे घने अंधेरे के कारण पढ़ाई रुक चुकी है। उस मां के भीतर की चीख को सुनना चाहिए, जिसने अपने गहने गिरवी रखकर कोचिंग की मोटी फीस भरी थी और उस पिता के आंसुओं का हिसाब लगाना चाहिए, जिसने अपनी पुश्तैनी जमीन का एक टुकड़ा सिर्फ इसलिए बेच दिया, ताकि उसका बच्चा समाज में सिर उठाकर कह सके कि वह ‘डॉक्टर’ बनने जा रहा है।
भारत का मेडिकल कोचिंग क्षेत्र स्कूलों को ‘डमी’ संस्थाओं में बदलकर एक समांतर, अनियंत्रित और शोषक व्यवस्था बन चुका है। ग्यारहवीं और बारहवीं की सामान्य, जीवंत स्कूली जिंदगी को खत्म करके हमने एक पूरी पीढ़ी के सामाजिक और मानसिक विकास की बलि चढ़ा दी है। हमने बच्चों को संवेदनशील इंसान बनाने के बजाय केवल एक ‘बहुवैकल्पिक प्रश्नपत्र’ को हल करने वाले और रैंक की अंधी दौड़ में दौड़ने वाले रोबोट में तब्दील कर दिया है। सबसे ज्यादा मार उन गरीब और ग्रामीण पृष्ठभूमि की मेधावी छात्राओं पर पड़ती है, जिनकी पढ़ाई रुकने का मतलब सिर्फ एक साल का नुकसान नहीं, बल्कि सामाजिक दबाव में उनकी शादी कर दिए जाने या उनके सपनों का हमेशा के लिए दफन हो जाना होता है।
अगर ऐसा ही चलता रहा, तो वे दिन दूर नहीं, जब इस पूरे संकट का सबसे भयावह, आत्मघाती और दूरगामी असर देश की भावी चिकित्सा व्यवस्था की गुणवत्ता और जन-स्वास्थ्य पर पड़ेगा। जो विद्यार्थी इस मानसिक आघात, व्यवस्था के प्रति उपजे गहरे आक्रोश, अवसाद और ‘बिकाऊ तंत्र’ के साए में चिकित्सा की पढ़ाई शुरू करेगा, वह भविष्य में मरीजों के प्रति अपना कैसा दृष्टिकोण रखेगा? जब एक पूरी पीढ़ी यह सीखकर बड़ी होगी कि रसूख, पैसा और पहुंच ही अंतिम सत्य हैं, तो उस डॉक्टर से एक ‘सहानुभूतिपूर्ण और संवेदनशील मसीहा’ बनने की उम्मीद करना ही बेमानी है।
जिसने खुद तंत्र के हाथों आर्थिक और मानसिक शोषण झेला हो, वह डॉक्टर बनने के बाद सबसे पहले अपनी उस पूंजी और उस प्रताड़ना का ब्याज वसूलने की कोशिश करेगा। यह चक्र देश के स्वास्थ्य ढांचे को पूरी तरह से संवेदनहीन, अनैतिक और व्यावसायिक बनाने की ओर धकेलेगा, जिसकी अंतिम परिणति गरीब मरीजों की मौत और बर्बादी में होगी। यह ढांचा अपने आप में गहरी क्षेत्रीय और आर्थिक असमानता पैदा करता है। अमीर और साधन-संपन्न परिवारों के बच्चे महंगे कोचिंग संस्थानों में पढ़कर मुकाम हासिल कर लेते हैं, जबकि ग्रामीण और गरीब पृष्ठभूमि का मेधावी विद्यार्थी शुरुआत से ही इस दौड़ में पिछड़ जाता है।
इसलिए समाधान भी अब सतही या तात्कालिक नहीं हो सकते। असली काम परीक्षा प्रणाली को तकनीकी रूप से अभेद्य बनाना है। एक ही परीक्षा पर देश की निर्भरता को कम करने के लिए साल में अनेक प्रयास और बारहवीं के अंकों के वैकल्पिक मूल्यांकन जैसे विकल्पों पर नीतिगत स्तर पर गंभीरता से विचार करना होगा। साथ ही, राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी को वर्तमान ढांचे से मुक्त कर संसद के अधीन एक स्वायत्त और पूरी तरह जवाबदेह संस्था बनाना होगा, जैसा कि देश के कई शिक्षाविद मांग कर रहे हैं।
आज असली परीक्षा इस देश को चलाने वाले शासकों की साख, नीयत और उनके इकबाल की है। जिस समाज में शिक्षा और न्याय केवल एक औपचारिकता बन जाएं, वहां देश का भविष्य केवल एक संयोग बनकर रह जाता है, कोई गौरवशाली नियति नहीं।
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पिछले सप्ताह जयपुर में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ कांग्रेस ने प्रदर्शन किया। ‘धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दो’ के नारे सुनने में आए और प्रधानमंत्री पर भी अंगुली उठाई गई ‘नीट’ में फिर प्रश्नपत्र लीक होने को लेकर। आक्रोश इतना था प्रदर्शनकारियों में कि भीड़ को काबू में लाने के लिए आंसू गैस छोड़नी पड़ी। भीड़ को देखकर मेरे मन में एक ही सवाल उठा बार-बार और वह यह कि इतना आक्रोश क्यों नहीं हम देख रहे हैं उन छात्रों में, जिनको दोबारा परीक्षा देनी पड़ेगी। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
