हम सामान्य या असाधारण परिस्थिति का सामना करते हुए जीवन भर परीक्षा देते हैं। मगर इस समय जो चुनौती देश के नौनिहालों के सामने खड़ी हो गई है, वह कहीं अधिक बड़ी है। भरपूर मेहनत करने के बाद जब वे डॉक्टर बनने का सपना साकार करना चाहते हैं, तो उनकी उम्मीदें टूट जाती हैं। इस बार भी यही हुआ। सीबीएसई की ‘ऑनलाइन स्क्रीन मार्किंग’ में जो शिकायतें आईं, वह सबके सामने है।

नीट के प्रश्नपत्र लीक होने का मामला सुर्खियों में छाया रहा। देश की परीक्षा प्रणाली किस तरह विद्यार्थियों के भविष्य को दांव पर लगा रही है, इसे समझा जा सकता है। पिछले दिनों कुछ विद्यार्थियों ने इस त्रुटिपूर्ण परीक्षा प्रणाली से निराश होकर आत्महत्या कर ली। ये ऐसे विद्यार्थी थे जो भविष्य में चिकित्सक बनकर मरीजों की सेवा करना चाहते थे। समाज में मानवीयता को जिंदा रखना चाहते थे।

आज वे स्वयं परीक्षा प्रणाली के कुचक्र में फंस गए हैं। वे खुद को असहाय महसूस करने लगे हैं। उन्हें लगता है कि रात-दिन इतनी मेहनत करने का क्या लाभ, जहां उनकी मेधा का ठीक से मूल्यांकन ही नहीं होता। नतीजा यह कि वे जीवन से भी हार जाते हैं। सवाल है कि हम देश की भावी पीढ़ी के लिए कैसी व्यवस्था तैयार कर रहे हैं।

कोटा से लेकर दिल्ली के कई इलाकों में देखा जा सकता है कि किस तरह युवा सिविल सेवा परीक्षा और नीट की तैयारी करते हैं। इस तैयारी में उनके माता-पिता की उम्मीदें भी जुड़ी रहती हैं। युवा निरंतर मेहनत करते हैं। वे परीक्षा देने जाते हैं और सभी प्रश्नों को सुलझाकर लौटते हैं, इस आशा के साथ कि अब कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ेंगे। मगर कुछ दिनों बाद पता चलता है कि प्रश्नपत्र लीक हो गया है। ऐसे में उनकी सारी आकांक्षाओं पर पानी फिर जाता है।

इस बार नीट के मामले में यही हुआ। इस घटना ने लाखों नौजवानों को निराशा के दलदल में धकेल दिया। यह अजीब बात है कि देश में राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) के गठन के बावजूद सुरक्षित और पारदर्शी तरीके से परीक्षाएं संपन्न नहीं हो रहीं। इस व्यवस्था में भी भ्रष्टाचार का दीमक लग गया।

एनटीए की स्थापना से उम्मीद बनी थी कि विद्यार्थी महत्त्वपूर्ण परीक्षाओं को उत्तीर्ण कर अपनी पसंद के कॉलेजों और विषयों में दाखिला लेंगे। मगर वास्तविक स्थिति सबके सामने है।

सवाल है कि सरकार ने एक देश, एक परीक्षा की नीति के तहत राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी का गठन क्या सोचकर किया था। लाखों विद्यार्थी भाग्य आजमाने के लिए परीक्षाओं में बैठें और प्रश्नपत्र लीक हो जाए, तो इसे क्या कहेंगे। यह कितनी बड़ी त्रासदी है कि विद्यार्थी इंतजार कर रहे थे नतीजे का, अपने स्वर्णिम भविष्य का और उन्हें मिली निराशा। अब उन्हें दोबारा परीक्षा देनी होगी। ऐसा ही वर्ष 2024 में भी हुआ था, तब भी लाखों विद्यार्थी निराश हुए थे।

प्रश्नपत्र लीक होने पर नीट यूजी 2026 को रद्द किया जाना कोई साधारण घटना नहीं। दोबारा परीक्षा लेने का निर्णय जरूर किया गया, लेकिन इससे विद्यार्थियों पर नाहक ही मानसिक दबाव बढ़ा है। जिन विद्यार्थियों ने परीक्षा दे दी थी, उन्हें मालूम है कि उन्होंने पिछली बार कितनी मेहनत से तैयारी की थी।

अगर दोबारा परीक्षा के दौरान कोई सवाल हल नहीं कर पाए या पिछड़ गए, तब क्या होगा? ऐसे में विद्यार्थियों की मन:स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। कोई जरूरी नहीं कि वे दोबारा उसी क्षमता से परीक्षा दे पाएं। आज भी यह सवाल अपनी जगह कायम है कि आखिर वे कौन-सी खामियां थीं, जिनकी वजह से प्रश्नपत्र लीक हो गए। ये प्रश्नपत्र जयपुर से लेकर लातूर तक बिके। इतनी चाक-चौबंद व्यवस्था से प्रश्नपत्र बाहर निकल गए, तो शिक्षा व्यवस्था संभालने वालों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।

आज विद्यार्थियों को दोबारा परीक्षा देने की तैयारी करनी पड़ रही है, तो इसका जिम्मेदार कौन है। इनमें से कई ऐसे होंगे, जिन्हें अपनी सफलता पर दोबारा शायद ही विश्वास होगा। यह दुखद ही है कि विद्यार्थियों के क्षोभ और गुस्से को शांत करने के लिए सत्ता से जुड़ा राजनीतिक नेतृत्व सामने नहीं आया।

अलबत्ता आभासी मंच पर बनी काकरोच जनता पार्टी ने दिल्ली में प्रदर्शन कर इसे मुद्दा जरूर बनाया और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग की। हालांकि इससे पहले विपक्षी दलों ने भी यह मांग की थी, लेकिन सरकार पर कोई असर नहीं पड़ा। अलबत्ता दोबारा परीक्षा देने जा रहे विद्यार्थियों को मामूली राहत देकर उनके जख्मों पर मरहम लगाने की कोशिश जरूर की गई।

यह हैरत की बात है कि परीक्षा में इतनी बड़ी गड़बड़ी के बावजूद एनटीए अपनी कमियों और त्रुटियों को मानने को तैयार नहीं। इससे एजेंसी के तौर-तरीके और उसके रवैये को समझा जा सकता है। प्रश्नपत्र लीक हो जाने के बाद भी वह कंप्यूटर माध्यम से ही परीक्षाएं लेने की बात करती रही। मगर अदालत में उनके तर्कों को दरकिनार कर दिया गया और स्पष्ट कर दिया गया कि फिर से कंप्यूटर के जरिए परीक्षा आयोजित करवाने का सवाल ही पैदा नहीं होता। इससे वस्तुस्थिति को समझा जा सकता है।

आज चाक-चौबंद कंप्यूटर आधारित परीक्षा से भी भरोसा टूट रहा है। एनटीए को स्पष्ट कर दिया गया है कि दोबारा ली जा रही परीक्षा त्रुटिहीन होनी चाहिए। अगर फिर त्रुटि पाई जाती है, तो व्यवस्था जिम्मेदार होगी। अब विद्यार्थियों में परीक्षा प्रणाली में भरोसा कायम करना व्यवस्था का काम है।

पिछले दिनों काकरोच पार्टी ने दिल्ली में प्रदर्शन कर देश के नेतृत्व पर दबाव तो बनाया, लेकिन शिक्षा मंत्री न तो सामने आए और न इस्तीफा देने की हिम्मत दिखाई। जबकि हमारे यहां त्यागपत्र देने वाले उन नेताओं को याद किया जा सकता है, जिन्होंने भारी गड़बड़ियों, किसी लापरवाही या किसी हादसे के बाद स्वत: पद छोड़ दिया। आजकल के मंत्री तो कोई न कोई तकनीकी नुक्ता निकालकर इस तरह के दबाव से बच निकलते हैं।

मौजूदा शिक्षा मंत्री भी मामूली राहत देकर चाहते हैं कि विद्यार्थी दोबारा परीक्षा दें और यह मामला शांत हो जाए। दोबारा परीक्षा के बाद भी क्या होगा, अभी कहना मुश्किल है। सीबीएसई की परीक्षा के बाद ‘ऑनलाइन मार्किंग सिस्टम’ की खामियां और उससे उपजी बेशुमार शिकायतें अब भी अनसुलझी हैं। विद्यार्थियों को अपना मूल्यांकन देखकर घोर निराशा हुई है। वे अब अपनी उत्तर पुस्तिकाओं का पुनर्मूल्यांकन चाहते हैं। डिजिटल होते देश की यह बड़ी नाकामी है।

दावा है कि हमारी डिजिटल ताकत दुनिया में सबसे अव्वल देशों में से एक है, लेकिन इधर मूल्यांकन हुआ, उधर पोर्टल ठप पड़ गया। कई दिनों तक यह खुला ही नहीं। बड़े-बड़े तकनीकी विशेषज्ञ इसमें जुटे रहे। कई दिनों तक विद्यार्थी तनाव में रहे। सरकार ने कदम तब उठाया, जब बात बिगड़ चुकी थी।

सीबीएसई से असंतुष्ट छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन किया गया, तो पाया गया कि ऑन-स्क्रीन मूल्यांकन का तरीका सही नहीं था। इसकी पहले से कोई तैयारी ही नहीं की गई थी और न ही शिक्षकों को प्रशिक्षित किया गया था। इस पूरे परिदृश्य को देखकर ऐसा लगता है कि देश की परीक्षा प्रणाली एक गहरे दुश्चक्र में फंस चुकी है।