एक नहीं बोले, दो नहीं बोले, तीन नहीं बोले, अगर कोई कुछ नहीं बोलेगा तो फिर सत्ता पक्ष से कोई गलती ही नहीं हुई है। भाजपा के नए-नवेले नेता राघव चड्ढा के सही होने के बहुमत वाले तर्क को मानेंगे तो नीट परीक्षा की धांधली में अपनी जिम्मेदारी पर चुप्पी साध कर सत्ता ने मामला रफा-दफा कर दिया। जब सरकार हर तरफ बचत की बात कर रही है, नेता से लेकर जज तक साइकिल से दफ्तर जा रहे हैं, तो 2026 में नीट-परीक्षा दोबारा ली जाएगी। दोबारा होने वाली परीक्षा में लगने वाले संसाधनों के आंकड़े पर हम बात नहीं करेंगे। बात करेंगे जवाबदेही, नैतिकता और आदर्श की, जिसका भंडार सत्ता पक्ष की तरफ तो खत्म हो गया सा दिखता है। घनघोर विभागीय नाकामी के बाद भी किसी मंत्री के मुख से इस्तीफे की बात नहीं निकलती, कार्रवाई तो दूर की बात है। लगता है कि सत्ता नैतिकता व आदर्श के सारे संसाधन सिर्फ विपक्ष के लिए संरक्षित कर चुकी है, ताकि उसे इसकी किसी तरह की कमी महसूस न हो। नाकामी के किसी भी आरोप का जवाब न देही के राजनीतिक चलन पर बेबाक बोल।
‘हमारी सरकार में इस्तीफे नहीं होते। वह यूपीए की सरकार में होता था। यह राजग की सरकार है।’ केंद्रीय रक्षा मंत्री के बयान का भावार्थ निकालें तोउत्तरदायित्व, जवाबदेही, नैतिकता…ये सब यूपीए सरकार के बंधन थे। राजग सरकार इन बंधनों से मुक्त है।
राजनाथ सिंह जब यह बयान दे रहे थे तो उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि राजग सरकार में उनकी बात पत्थर की लकीर बना दी जाएगी। राजग सरकार के मंत्री चाहे जिस स्तर पर भी नाकाम होंगे, न तो उनसे कोई सवाल किया जाएगा, और न ही वे किसी और के सवाल का जवाब देने के लिए बाध्य होंगे। जमीनी हकीकत तो यह है कि जो मंत्री अपने सामान्य विभागीय काम-काज से जितना दूर, जितना उदासीन है, उसकी उन्नति की राह उतनी ही उज्ज्वल है।
नीट परीक्षा में पेपर लीक सामने आने के बाद ओड़ीशा में बीजद के एक नेता ने आरोप लगाया कि धमेंद्र प्रधान का बस शरीर ही दिल्ली में रहता है, उनके प्राण तो ओड़ीशा में बसते हैं। हो सकता है कि बीजद नेता उन चुनावों में राजग की जीत से जलन में हों, जिन्हें जीतने में शिक्षा मंत्री की प्रधान भूमिका को रेखांकित किया जा सकता है।
वैसे भी राजनाथ सिंह की सरकार वाले मंत्रियों का पसंदीदा गाना हो सकता है-दिल्ली में मंत्री मुसाफिर है/आता है जाता है…। संसद सत्र में शामिल होने की मजबूरी नहीं हो तो राज्यों के विधानसभा चुनावों के अस्थायी शिविर ही उनका निवास हैं। जिन राज्यों में चुनाव का एलान हो जाता है, केंद्रीय मंत्रिगण से लेकर बड़े नेता, नतीजों तक वहीं के मेहमान हो जाते हैं। अपने चुनावी शिविर से निकल कर कभी-कभी दिल्ली से जुड़े गैर चुनावी कार्य की खानापूर्ति कर देते हैं।
पहले बात करते हैं, 2024 की। राष्ट्रीय परीक्षा एजंसी ने 5 मई 2024 को नीट-यूजी परीक्षा आयोजित की। परीक्षा समाप्ति के कुछ घंटों के अंदर ही सोशल मीडिया पर पेपर लीक होने के आरोप लगे। पता चला कि 30 से 50 लाख रुपए तक में पेपर बेचे गए। नतीजों में असामान्य तरीके से छात्रों के 720 में से सौ फीसद अंक (720) आए। विवाद तब आगे बढ़ा जब 1563 छात्रों को कृपांक दे दिए गए। अब कई विद्यार्थियों को 718 और 719 अंक मिले, जिसे अव्यावहारिक माना गया और नीट की परीक्षा राजनीतिक मुद्दा बन गई। इस मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह तो माना कि परीक्षा की पवित्रता भंग हो गई, लेकिन दुबारा परीक्षा नहीं हुई। उस वक्त पेपर लीक को ‘क्षेत्रीय’ मान कर पूरे देश में दोबारा परीक्षा करवाने से इनकार कर दिया गया।
अब हम आते हैं 2026 में। विद्यार्थियों को ही पता चलता है कि नीट का पेपर लीक हुआ है। एक आम शिक्षक पुलिस तक पहुंचता है, लेकिन वहां भी मामले की गंभीरता को नहीं समझा गया। हंगामा मचते ही इस बार नीट की परीक्षा दोबारा करवाने का एलान कर दिया गया। यानी महज दो साल में पेपर लीक क्षेत्रीय से राष्ट्रीय हो गया। लेकिन राजनाथ सिंह वाली इस्तीफे नहीं होते वाली सरकार से इसका ‘श्रेय’ लेने अभी तक कोई सामने नहीं आया है।
तब और अब में एक अंतर यह है कि 2024 में धमेंद्र प्रधान पेपर लीक की बात नहीं मान कर वक्त जाया कर रहे थे। 13 जून 2024 को धमेंद्र प्रधान ने कहा था कि नीट परीक्षा में पेपर लीक के कोई सबूत नहीं मिले हैं। साथ ही उन्होंने ‘एनटीए’ को भी बेदाग घोषित कर दिया था। उस वक्त उन्होंने विद्यार्थियों के विरोध को साजिश बताते हुए इस मुद्दे को ‘हवा’ देने का ठीकरा भी कोचिंग केंद्रों पर फोड़ा।
2026 में बिना कोई समय गंवाए पेपर लीक को ‘राष्ट्रीय’ मानते हुए दुबारा परीक्षा करवाने का एलान कर दिया गया। इस मसले पर प्रेस कांफ्रेंस में प्रधान ने कहा कि पेपर लीक के दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। फिर उन्होंने कहा कि 2024 में भी बख्शा नहीं गया था। वहीं सभी यह सवाल कर रहे हैं कि क्या गारंटी है कि 2025 में पेपर लीक नहीं हुआ होगा? पिछले साल लीककर्ता अवकाश पर तो नहीं गए होंगे? हो सकता है, पिछली बार आम लोगों की पकड़ में न आया हो?
विचार | क्या अब बदल जाएगी भारत की प्रवेश परीक्षा व्यवस्था? NEET 2026 विवाद के बाद बड़ा सवाल
जब इतने बड़े मसले पर जिम्मेदारी को लेकर सत्ता पक्ष में चुप्पी छाई है तो बोल कौन रहा है? हर आम आदमी के इंटरनेट के पन्ने पर नायक बने कोचिंग संचालक ही दिख रहे हैं। एक कोचिंग नायक सरकार से कह रहे हैं कि दस रुपए का ‘डायपर’ भी ‘लीक’ रोक लेता है, आप नहीं रोक पा रहे हैं। मीडिया के हर मंच पर विद्यार्थियों की आवाज की अगुआई कोचिंग संचालक कर रहे हैं, सत्ता से वे ही सवाल पूछ रहे हैं।
कोचिंग संचालकों की बढ़ती साख का असर यह है कि पिछले दिल्ली विधानसभा चुनाव में अवध ओझा को आम आदमी पार्टी ने टिकट भी दिया था। यह दूसरी बात है कि अवध ओझा चुनाव हार गए थे। लेकिन, इन दिनों कोचिंग संचालक जिस तरह से राष्ट्रीय नायक बन रहे हैं, वह दिन दूर नहीं दिख रहा, जब इनमें से कोई ‘जेन जी’ के समर्थन सेतमिलनाडु का ‘तलपति विजय’ बन कर पूरी व्यवस्था को चौंका दे। जो लोग शिक्षा तंत्र की सबसे बड़ी समस्या हैं, सरकार की नाकामी ने उनके ही नायकत्व का बाजार मजबूत कर दिया है।
पिछले काफी समय से एक देश एक चुनाव का विमर्श गढ़ने की तैयारी हो रही है। इस विमर्श के समांतर हमारे संस्थानों की हालत किस तरह की है? आरोप है कि पिछले दस वर्षों में नब्बे से ज्यादा पेपर लीक हो चुके हैं। ‘राष्ट्रीय परीक्षा एजंसी’ का मकसद भी एक देश, एक परीक्षा ही है। लेकिन यहां सिर्फ भ्रष्टाचार ही ‘एक’ हो पा रहा है, बाकी सब कुछ ‘अनेक’ ही है।
किसी भी देश की साख उसके संस्थानों से होती है। 2024 में परीक्षा की पवित्रता प्रभावित हो जाने के बाद भी उससे जुड़े शीर्ष जिम्मेदारों को पवित्र प्रसाधन ही माना गया। शीर्ष के किसी बड़े जिम्मेदार पर कोई बड़ी कार्रवाई नहीं हुई। इसका नतीजा है कि फिर लाखों विद्यार्थी रोते हुए पूछ रहे हैं कि इसमें हमारा क्या कसूर है? शायद उनका कसूर यह है कि उनमें से एक विद्यार्थी ने इतने बड़े भ्रष्टाचार को सामने ला दिया। ऐसे हालात देख कर लगता है कि हमें अभी उतना ही भ्रष्टाचार पता है, जितना सामने आया है, पता नहीं असली हालात कितने भयावह होंगे।
चिकित्सा के क्षेत्र में अक्सर भ्रष्टाचार के ऐसे मामले आते हैं, जो हमें चौंकाते हैं। एकबारगी पूरी मानवता से भरोसा डगमगाने लगता है। हम बाद में इसलिए चौंकते हैं, सवालरत होते हैं क्योंकि पूरा देश डाक्टर बनाने की प्रक्रिया में हुए भ्रष्टाचार को आसानी से भूल जाता है। नीट 2024 में क्या सत्ता के शीर्ष से किसी ने जिम्मेदारी ली?जो विद्यार्थी इतने भ्रष्ट-तंत्र, गैरजिम्मेदारी वाले माहौल से गुजरते हुए डाक्टर बनेंगे उनसे हम कैसे उम्मीद करेंगे कि वे ‘डाक्टर भगवान का दूसरा रूप होता है’ वाली डाक्टरी करेंगे।
कोरोना-काल में एमबीबीएस के अंतिम सत्र की कक्षाएंआनलाइन करने वाले मेडिकल विद्यार्थियों पर तंज होते थे कि इनसे इलाज मत करवाना, ये आभासी डाक्टर हैं। हमारे तंत्र ने विद्यार्थियों के सामने भ्रष्टाचार को क्षेत्रीय से राष्ट्रीय बना दिया है। जिस देश की परीक्षा ही पवित्र न हो, वहां संस्थानों की पवित्रता कैसे बरकरार रहेगी?
