भारत में प्रवेश परीक्षा केवल एक परीक्षा भर नहीं होती, बल्कि यह महीनों या अक्सर वर्षों की अनुशासित तैयारी की परिणति होती है। जब ऐसी परीक्षा बाधित हो जाती है, जैसा कि नीट 2026 के संदर्भ में सामने आया है, तो यह निस्संदेह चिंता का विषय है। पेपर लीक संबंधी आशंकाएं निर्मूल नहीं हैं। मगर इसके कारण परीक्षा रद्द होने से ईमानदारी से तैयारी करने वाले विद्यार्थियों और उनका साथ देने वाले अभिभावकों के न केवल सपने टूटे, बल्कि उनकी सारी मेहनत पर भी पानी फिर गया। उनके लिए यह अनिश्चितता चिंताजनक है। इस मुद्दे पर किसी भी तरह का मार्गदर्शन उनके प्रति सहानुभूति की भावना से होना चाहिए। इसके बाद जो आलोचना सामने आई है, वह समझ में आती है। फिर भी, यह आवश्यक है कि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) को जो कार्य करना होता है, उसके पैमाने और जटिलता को भी समझा जाए।
हर वर्ष एनटीए परीक्षाओं की एक विस्तृत श्रृंखला आयोजित करता है – जेईई (मेन), नीट (यूजी) और सीयूईटी (यूजी) जैसे स्नातक प्रवेश से लेकर सीयूईटी (पीजी) और सीमैट जैसे स्नातकोत्तर परीक्षण तथा यूजीसी-नेट जैसी पात्रता परीक्षा तक। इन परीक्षाओं में हर वर्ष लगभग 80 लाख अभ्यर्थी शामिल होते हैं, जो कभी-कभी एक करोड़ से अधिक तक पहुंच जाते हैं। कई अभ्यर्थी एक से अधिक परीक्षा में बैठते हैं, जिससे संचालन संबंधी जटिलता और बढ़ जाती है। विषयों की विविधता, अभ्यर्थियों की पृष्ठभूमि, परीक्षा प्रारूपों और समय-सीमाओं की भिन्नता इस पूरी प्रक्रिया को चुनौतीपूर्ण बना देती है।
इन परीक्षाओं का प्रबंधन बड़े पैमाने का ‘लॉजिस्टिक’ और सुरक्षा संचालन भी है। इसमें हजारों केंद्रों का समन्वय, प्रश्नपत्रों की सुरक्षित साज-संभाल, अभ्यर्थियों की पहचान का सत्यापन, सूचना प्रौद्योगिकी प्रणालियों का संचालन, शिकायतों का निपटान और सघन समय-सीमा में परिणाम तैयार करना शामिल है। ऐसी जटिल व्यवस्था को निरंतरता के साथ संचालित करना राष्ट्रीय स्तर की चुनौती है। इसे समझने और गंभीरता से लेने की जरूरत है।
इसी संदर्भ में नीट 2026 की स्थिति को राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी के व्यापक रिकॉर्ड के साथ भी देखा जाना चाहिए। इसकी स्थापना के बाद से पेपर लीक संबंधी चिंताओं के कारण पूरी परीक्षा रद्द होने की घटनाएं बहुत कम रही हैं, जिनमें यूजीसी-नेट जून 2024 का मामला और वर्तमान प्रकरण अपवाद हैं। यूजीसी-नेट के मामले में परीक्षा को संभावित गड़बड़ी के संदेह में रद्द किया गया और दोबारा आयोजित किया गया। इसी प्रकार, नीट (यूजी) 2024 में व्यापक आरोपों के बावजूद सर्वोच्च न्यायालय ने पूरे देश में परीक्षा रद्द करने की सिफारिश नहीं की और यह कहा कि किसी तंत्रगत उल्लंघन का पर्याप्त प्रमाण सामने नहीं आया।
विगत वर्षों के दौरान राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी ने प्रक्रियाओं को मजबूत करने की दिशा में कई ठोस काम किए हैं, जैसे पहचान सत्यापन को बेहतर बनाना, संचालन संबंधी नियमों को सख्त करना और शिकायत निवारण प्रणाली को मजबूत करना। गौरतलब है कि लाखों अभ्यर्थी परीक्षाएं देते हैं, उत्तर कुंजी देखते हैं, आपत्तियां उठाते हैं और निर्धारित समय-सीमा के भीतर परिणाम प्राप्त करते हैं। यह दर्शाता है कि यह व्यवस्था विशिष्ट पैमाने पर काम करते हुए लगातार विकसित और अनुकूलित हो रही है।
हालांकि, नीट का अनुभव यह भी दर्शाता है कि एक ही दिन देशव्यापी परीक्षा को कागज-कलम स्वरूप में आयोजित करना जोखिम से कम नहीं है। बाईस लाख से अधिक अभ्यर्थियों के लिए प्रश्नपत्रों की तैयारी, छपाई, भंडारण और उनके परिवहन की प्रक्रिया व्यापक है और हर चरण संभावित कमजोरियों को जन्म देता है। ऐसे में एक छोटी-सी चूक भी बड़ा प्रभाव डाल सकती है और सार्वजनिक विश्वास को भी प्रभावित कर सकती है, जैसा कि पिछले दिनों देखा गया। जब इतना कुछ एक ही दिन पर निर्भर हो जाता है, तो व्यवस्था स्वाभाविक रूप से नाजुक हो जाती है। इसलिए नीट 2026 से जो सबक मिलता है, वह यह है कि एकल बिंदु पर निर्भरता को कम किया जाए। यह अब जरूरी हो गया है।
हालांकि, इसका परखा हुआ एक विकल्प पहले से मौजूद है। एनटीए ने जेईई (मेन) और सीयूईटी जैसी बड़ी परीक्षाओं को कंप्यूटर-आधारित मोड में अनेक दिनों और सत्रों में सफलतापूर्वक आयोजित किया है। यह तरीका भौतिक रूप से प्रश्नपत्रों को लाने-ले जाने की चिंता को काफी हद तक कम कर देता है। इस लिहाज से देखें, तो प्रश्नपत्रों की बड़े पैमाने पर छपाई और परिवहन समाप्त होने से एक बड़े जोखिम को समाप्त किया जा सकता है। इस पर अमल होना चाहिए।
बहु-सत्रीय परीक्षा प्रणाली लचीलापन भी प्रदान करती है। यदि किसी विशेष सत्र में व्यवधान आता है, तो उसे स्थानीय स्तर पर दुरुस्त किया जा सकता है, वह भी पूरे परीक्षा चक्र को प्रभावित किए बिना। लाखों अभ्यर्थियों से जुड़ी राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षाओं में यह क्षमता अत्यंत महत्त्वपूर्ण होती है। निस्संदेह, कंप्यूटर-आधारित परीक्षा अपने साथ कुछ चुनौतियां भी लाती है, परंतु अनुभव बताता है कि इन्हें प्रबंधित किया जा सकता है और इससे संपूर्ण प्रणाली अधिक सुदृढ़ बनती है।
डॉ. के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय समिति ने एक स्पष्ट और संतुलित मार्गदर्शन किया है। समिति के प्रमुख सुझावों में बड़े पैमाने की परीक्षाओं के लिए बहु-सत्रीय प्रणाली और पारदर्शी सामान्यीकरण पद्धति का उपयोग शामिल है। साथ ही, कंप्यूटर-सहायता प्राप्त सुरक्षित कागज-कलम परीक्षा (सीपीपीटी) का प्रस्ताव भी दिया गया है, जिसमें प्रश्नपत्रों को सुरक्षित रूप से केंद्रों तक भेजकर वहीं मुद्रित किया जाए, जिससे उनके साज-संभाल और परिवहन से जुड़े जोखिम कम हों तथा पेपर लीक जैसी घटनाएं न हों। इन सभी सुझावों को मिलाकर देखें, तो यह स्पष्ट होता है कि नीट को बहु-सत्रीय कंप्यूटर-आधारित प्रणाली की ओर चरणबद्ध तरीके से ले जाना अब आवश्यक है। ऐसी व्यवस्था में पूरी परीक्षा रद्द किए बिना सभी अड़चनों का समाधान संभव होगा। इससे निरंतरता और निष्पक्षता सुनिश्चित होगी। विद्यार्थियों का भी भरोसा बढ़ेगा।
इन सबके अलावा एक चिंता सत्रों के बीच निष्पक्षता की भी है। बहु-सत्रीय परीक्षाओं में प्रश्नपत्र में कुछ अंतर हो सकता है, लेकिन इसे सामान्यीकरण के माध्यम से संतुलित किया जाता है। यह सांख्यिकीय पद्धति सुनिश्चित करती है कि किसी भी छात्र को उसके सत्र के कारण लाभ या हानि न हो। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी पहले से ही जेईई (मेन) और सीयूईटी जैसी परीक्षाओं में इस पद्धति का सफल उपयोग कर रही है। वास्तव में, सामान्यीकरण एक ऐसी व्यवस्था है जो ‘सत्रीय लाभ’ से छात्रों की रक्षा करती है और विभिन्न सत्रों के अंकों को एक समान आधार पर लाती है। इसकी मूल शर्त पारदर्शिता है। इसमें यह स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि यह प्रक्रिया कैसे काम करती है और निष्पक्षता कैसे सुनिश्चित की जाती है।
विद्यार्थियों की इतनी बड़ी संख्या वाले देश में एक सशक्त राष्ट्रीय परीक्षा संस्था की आवश्यकता अनिवार्य है। इसलिए राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी को व्यापक आलोचना के माध्यम से कमजोर करने के बजाय ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि नीट के लिए अधिक सुदृढ़ और लचीले तौर-तरीके अपनाए जाएं और ऐसी रूपरेखा तैयार की जाए, जो भारत के पैमाने के अनुरूप हो।
लेखक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के पूर्व अध्यक्ष हैं।
