Dunia Mere Aage: नींद आदमी का सबसे ईमानदार क्षण है। काश कि हम किसी सोए हुए आदमी से बात कर पाते। शायद वही एक समय है, जब उसके शब्द नहीं, उसका अस्तित्व बोलता है। जब चेहरे पर चढ़े हुए सारे मुखौटे उतर जाते हैं। जब पद, प्रतिष्ठा, धन, अहंकार, छल, चतुराई और अभिनय सब बिस्तर के किनारे रखे रह जाते हैं और भीतर का मनुष्य अकेला रह जाता है।
जागता हुआ मनुष्य अक्सर संवाद नहीं करता, प्रदर्शन करता है। वह अपने शब्दों को तौलता है, मुस्कान को नापता है, भावनाओं को छिपाता है और अवसर देखकर सच बोलता है। उसकी भाषा में भय भी होता है, स्वार्थ भी और सामाजिक मर्यादाओं की परतें भी। वह कभी सम्मान बचाने के लिए झूठ बोलता है, कभी संबंध बचाने के लिए, कभी लाभ कमाने के लिए और कभी स्वयं से ही बचने के लिए। परंतु नींद..! नींद अभिनय नहीं जानती।
वहां कोई दर्शक नहीं होता, इसलिए कोई कलाकार भी नहीं होता। वहां मनुष्य अपने सबसे सरल रूप में लौट आता है। जिस व्यक्ति के सामने पूरी दुनिया सिर झुकाती है, वह भी नींद में बच्चे की तरह निश्चिंत दिखाई देता है। जिस व्यक्ति के सामने लोग कांपते हैं, उसकी पलकों पर भी वही असहाय विश्रांति उतरती है। जिस व्यक्ति ने जीवन भर दूसरों को धोखा दिया हो, वह भी नींद में स्वयं को धोखा नहीं दे सकता।
नींद संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां राजा और रंक का तकिया एक ही भाषा बोलता है। महलों की रेशमी चादरें और फुटपाथ की फटी चादर दोनों का अंतिम उद्देश्य एक ही है- थके हुए शरीर को विश्राम देना। नींद यह घोषणा करती है कि प्रकृति के सामने सभी मनुष्य समान हैं। जिसने दिन भर दूसरों को आदेश दिए, रात को वही अपनी पलकों का भी स्वामी नहीं रह जाता। नींद किसी की सत्ता को स्वीकार नहीं करती। कितना विचित्र है कि दिन भर हम जिस चेहरे को दुनिया को दिखाते हैं, वह हमारा वास्तविक चेहरा नहीं होता।
असली चेहरा तब दिखाई देता है, जब हम उसे देखने की स्थिति में ही नहीं रहते। नींद में कोई अपनी सुंदरता नहीं संवारता, कोई अपनी आवाज को मधुर नहीं बनाता, कोई अपने पद का परिचय नहीं देता। अगर सचमुच किसी सोए हुए आदमी से बात करना संभव होता, तो शायद हमें उसके होंठों से उत्तर न मिलते, लेकिन उसकी चुप्पी बहुत कुछ कह जाती। हम पूछते कि तुम इतने कठोर क्यों हो? शायद उसकी शांत सांसें कहतीं- मैं भीतर से बहुत डरा हुआ हूं।
हम पूछते- तुम इतने क्रोधित क्यों रहते हो? शायद उसका विश्राम कहता- मैं बहुत थका हुआ हूं। हम पूछते- तुमने इतने छल क्यों किए? शायद उसकी बंद पलकों के पीछे छिपा अपराधबोध स्वीकार करता कि वह स्वयं से कभी जीत ही नहीं पाया। मनुष्य का चरित्र उसके भाषणों में कम, उसकी नींद में अधिक दिखाई देता है। जो व्यक्ति संतोष से सो जाता है, वह संसार का सबसे धनी मनुष्य है। और जो आलीशान बिस्तरों पर भी करवटें बदलता रहता है, उसकी निर्धनता बैंक खाते में नहीं, अंतरात्मा में लिखी होती है।
धन से गद्दे खरीदे जा सकते हैं, नींद नहीं। दवाइयों से आंखें बंद की जा सकती हैं, शांति नहीं। आज का मनुष्य पहले से अधिक जाग रहा है, पर भीतर से पहले से अधिक सोया हुआ है। रातें मोबाइल की रोशनी में कट रही हैं और दिन कृत्रिम मुस्कानों में। उसने विश्राम को आलस्य समझ लिया है और बेचैनी को उपलब्धि। परिणाम यह है कि आंखें बंद होती हैं, पर चिंताएं खुली रहती हैं। ऐसी नींद विश्राम नहीं, केवल थकान का विराम है।
नींद हमें प्रतिदिन यह भी सिखाती है कि जीवन का सबसे बड़ा सत्य समर्पण है। जिस प्रकार सोने के लिए हमें अपने शरीर को बिस्तर के हवाले करना पड़ता है, उसी प्रकार जीवन में शांति पाने के लिए अहंकार को समय के हवाले करना पड़ता है। जो हर क्षण नियंत्रण में रहना चाहता है, वह चैन से सो भी नहीं सकता। नींद उन लोगों के पास सहज चली जाती है, जिन्होंने अपने भीतर के शोर को थोड़ा शांत कर लिया है।
शायद इसी कारण छोटे बच्चे सबसे गहरी नींद सोते हैं। उनके पास न छल है, न संग्रह की चिंता, न प्रतिष्ठा का बोझ। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, हम वस्तुएं इकट्ठी करते जाते हैं और नींद खोते जाते हैं। हमारे घर बड़े होते जाते हैं, लेकिन विश्राम छोटा होता जाता है। सुविधाएं बढ़ती हैं, सुकून घटता जाता है।
जिस समाज की रातें भय में बीतती हैं, उसके दिन कभी स्वस्थ नहीं हो सकते। जिस परिवार में लोग चैन से सोते हैं, वहां विश्वास अभी जीवित है। और जिस व्यक्ति की नींद हर रात उससे हिसाब मांगती है, समझ लेना चाहिए कि उसकी आत्मा अभी मरी नहीं है। इतिहास गवाह है कि मनुष्य ने महल बनाए, साम्राज्य खड़े किए, समुद्र पार किए, चांद तक पहुंच गया, लेकिन आज भी वह एक शांत और निश्चिंत नींद की खोज में भटक रहा है।
विज्ञान ने निद्रा की जैविक प्रक्रियाओं को समझ लिया है, मस्तिष्क की तरंगों को माप लिया है, अनिद्रा की असंख्य दवाएं बना ली हैं, फिर भी वह किसी प्रयोगशाला में संतोष का एक कण और निर्मल अंत:करण की एक बूंद नहीं बना सका। कारण स्पष्ट है- नींद केवल शरीर की क्रिया नहीं, आत्मा की स्वीकृति भी है। जब मन अपने ही निर्णयों के साथ समझौता कर लेता है, जब विवेक स्वयं को कठघरे में खड़ा नहीं करता, जब स्मृतियां अपराधबोध की तरह नहीं चुभतीं, तभी पलकों पर विश्रांति उतरती है।
इसलिए रात की सबसे मधुर लोरी बाहर की निस्तब्धता नहीं, भीतर का निष्कलुष मौन है। जिस दिन मनुष्य अपने अंतर्मन से छल करना छोड़ देगा, उसी दिन उसकी नींद भी फिर से उतनी ही गहरी, सहज और पवित्र हो जाएगी, जितनी किसी निष्कपट शिशु की होती है। इसलिए नींद प्रतिदिन हमारे सामने यह प्रश्न रखती है- क्या आज का दिन ऐसा था कि तुम निश्चिंत होकर सो सको?
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पानी हम सबकी जिंदगी में कितना अहम है, इसका अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि हम सामान्य स्थितियों में एक-दो दिन भोजन बिना रह सकते हैं, लेकिन जल के बिना नहीं। ‘जल है, तो कल है’- यह नारा केवल नारा नहीं, जीवन का आधार बताती इबारत है। हम इतिहास उठाकर देख सकते हैं कि जितनी भी सभ्यताएं बसीं, वे सब नदियों के किनारे ही बसीं, लेकिन… पढ़िए पूरी खबर…
