समय एक-सा नहीं रहता। बदलता रहता है। मान्यता है कि समय की स्लेट पर इतिहास लिखे जाते हैं। जीवन में लिखे का बड़ा महत्त्व होता है, क्योंकि लिखे को बदलना आसान नहीं होता। ऐसा कहा जाता है कि इतिहास अपने आपको दोहराता है। समय के चक्र में दोहराव चलता रहता है। यही दोहराव जब बार-बार होने लगे, तब नया रुक जाता है। नए की आवक अवरुद्ध हो जाती है और नए को नया मानना बेहद कठिन हो जाता है।
हमारे चारों ओर जो कुछ भी है, इसके विस्तार में जाएं, तो वह सब पुराना है। चिंतकों का तर्क है कि हम जो भी देख रहे हैं, सुन रहे हैं या बोल रहे हैं, वह सब पुराना है। नया कुछ भी नहीं। यहां तक कि व्यक्ति की सोच भी नई नहीं है। दरअसल, नई सोच का आना लगभग असंभव हो गया है। व्यक्ति जो भी सोच रहा होता है, वह महज दोहराव रह गया है। इसे यों भी कहा जा सकता है कि व्यक्ति की कुल सोच में दोहराव की मात्रा सबसे अधिक होती है। व्यक्ति बार-बार वही सोचता है जो उसने पूर्व में सुना या देखा होता है।
बचपन से लेकर आज तक जो सीखा या सिखाया जाता है, उसी का दोहराव अंदर चलता रहता है। उठते-बैठते, सोते-जागते मन में विचारों के दोहराव का क्रमचय-संचय चलता रहता है। इनमें से कुछ विचारों के संचय को नई सोच का निर्धारण मान लिया जाता है। फिर सवाल उठता है कि व्यक्ति के शैशव काल में जो सिखाया जाता है वह तो नया ही होता है! सच यह है कि बच्चों को सिखाने वाला भी वही सिखाता है, जो उसने पूर्व में सीखा हुआ होता है। धरती की उत्पत्ति के बाद से सोच का करोड़ों-करोड़ों बार दोहराव होता आया है। होता रहेगा। सोच और विचारों की पुनरुक्ति चाहे-अनचाहे होती रहती है।
इसलिए आज के समय की विडंबना है कि नयापन रुक गया है। पुनरुक्ति से नयापन लगभग समाप्त हो रहा है। दृश्य और श्रव्य के इलेक्ट्रानिक साधन ये काम बखूबी कर रहे हैं। सोशल मीडिया दोहराव के मंच हैं। इसलिए दोहराव आसान है और नई सोच का निर्माण कठिन। जो दोहराव से बच गया, वह अमर हो सकता है। दुनिया में ऐसे लोग विरले हैं। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि जो हम सोच रहे होते हैं, वही दूर बैठा हमारा साथी भी सोच रहा होता है। जब हम यह बात अपने साथी को बताते हैं, तब वह आश्चर्य में पड़ जाता है। बोलता है कि वह भी तो वही सोच रहा था!
ऐसे मामले हमारी दिनचर्या के हिस्से हैं। ऐसे मामलों में और गहराई से विचार किया जाए, तब कोई और भी कह सकता है कि ऐसा तो वह पहले ही सोच चुका है। दरअसल, यह दायरे में सोच और दोहराव का परिणाम है। आज यह अधिक हो रहा है। सोचने वालों की संख्या बढ़ गई है इसलिए दोहराव भी कई गुना ज्यादा बढ़ गया है।
विज्ञान मानता है कि आधुनिक विमानों का आविष्कार नई सोच के परिणाम हैं। आगे भी परिष्कृत निर्माण होते रहेंगे। विमान पायलट रहित हो जाएं इसकी प्रबल संभावना है। जैसे अंतरिक्ष यान पूरी तरह स्वचालित हैं।
पौराणिक उल्लेख इस सोच के बरक्स दोहराव की दलील को मजबूत करते हैं। ‘रामायण’ में रावण के पुष्पक विमान का उल्लेख है। इसे क्या कहेंगे? पुष्पक विमान न केवल आसमान की ऊंचाइयों में उड़ता था, बल्कि व्यक्ति की सोच से उड़ता था। सबसे नई तकनीक से लैस आधुनिक टीवी का आविष्कार भी विज्ञान की नई सोच का सिर्फ उदाहरण है। महाभारत में युद्ध का आंखों देखा हाल सुनाए जाने का प्रसंग क्या था? इसे कल्पना और यथार्थ या फिर कल्पना से यथार्थ के सफर के तौर पर देखा जा सकता है। इंटरनेट पर एक वेबसाइट पर हिंदी सहित तमाम दुनिया के संगीत पर पड़ताल जारी है।
यहां यह जानकर अचंभित हो जाना पड़ता है कि जिन खूबसूरत फिल्मी गीतों को हम धरोहर मानते हैं, जिनकी मिठास हमें झंकृत कर जाती है और जिन गीतों को सुनकर हमें गर्व होता है, उनका संगीत दोहराव का परिणाम है। न केवल यह, बल्कि यह भी कि जिस संगीत को हम दोहराव मान रहे हैं, वह भी दोहराव का परिणाम है। फिर सवाल उठता है कि संगीत का मूल स्रोत कहां है? यह पड़ताल और भी गहराई में उतर सकती है। संगीत की किसी धुन की मौलिकता पर प्रश्न नहीं है, लेकिन दोहराव का प्रश्न कैसे उत्पन्न हुआ? क्या यह क्रमश: विस्तार है?
हाल ही में मोहनजोदाड़ो और हड़प्पा सभ्यता पर एक ताजा शोध पत्र जारी हुआ। शोध में यह जानने की कोशिश की गई है कि लगभग दस हजार साल पुरानी दुनिया की सबसे विकसित सभ्यता समाप्त कैसे हुई। कहां गए वे लोग, जिन्होंने इस विकसित सभ्यता का निर्माण किया? इस सभ्यता के अवशेष बताते हैं कि यहां अति-विकसित बहुमंजिला इमारतें हुआ करती थीं। मल निस्तारण के लिए फ्लश शौचालय बनाए जाते थे। सीवर लाइनें थीं। इस तरह से आज की अधुनातन ऊंची इमारतें, विकसित कालोनियां और फ्लश शौचालय उस सभ्यता का दोहराव मात्र नहीं हैं?
फिर सवाल उठता है कि सर्वथा नया कहां है? पुराने से मुक्ति का मार्ग क्या है? क्या दोहराव से बचा जा सकता है? सोच के दोहराव से बचने के लिए सोच को रोकना होगा। सोच के निर्वात में जो विचार पैदा होगा क्या वह नया होगा? क्या यह संभव है?
यह भी पढ़ें: दुनिया मेरे आगे: टूटना, बिखरना, समेटना और संवरना जीवन के चार चक्र

जिस तरह से जीवन के साथ मृत्यु का संबंध है, ठीक उसी तरह जीवन में टूटने, बिखरने, समेटने और संवरने का भी संबंध है। इंसान हमेशा जीवन से मृत्यु की ओर खिसकता रहता है, वैसे ही उसके जीवन में बार-बार टूटने की स्थिति आती है। जब इंसान टूटेगा, तो निश्चित तौर पर बिखरेगा भी। बिखरने के बाद उसे समेटना भी जरूरी है। पढ़िए पूरा लेख..
