Bebak Bol: इजराइल और अमेरिका ने जब ईरान पर हमला किया था तो किसी ने सोचा भी नहीं था कि कथित अजेय शक्तियों की भी हालत खराब हो जाएगी। आज अगर ईरान डट कर खड़ा है, दुनिया को भौंचक कर रहा है तो इसके पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि वहां अभी सत्ता पक्ष, विपक्ष और जनता एक हुई दिखती है। जिसकी जिस तरह की जिम्मेदारी है, वही अपना काम करने के बाद बोलने के लिए आगे आ रहे हैं। जब भारत पर भी युद्ध का प्रत्यक्ष असर पड़ चुका है तो यहां आज भी सत्ता पक्ष राहुल गांधी को ही हर चीज का जिम्मेदार ठहराने के लिए बैठा है। जब देश की जनता युद्ध के प्रभावों की चिंता कर रही थी, तब बिहार से आनेवाले केंद्रीय मंत्री राहुल गांधी के ‘पजामे’ की नाप-जोख कर रहे थे। परिवारवाद के नाम पर राहुल गांधी को राजनीतिक रूप से तबाह करने वाला सत्ता पक्ष व उसके सहयोगी दल युद्ध के इस समय में बड़े आराम से ‘निशांत हैं तो निश्चिंत हैं’ का नारा सुन रहे हैं। सत्ता के शीशमहल की दरो-दीवार में दिख रहे राहुल गांधी के अक्स पर बात करता बेबाक बोल।
पत्ते पत्ते विच सैंयां तेरा मुंह दिसदा
वे मैं जेड़े पासे वेखां मैनूं तू दिसदा
एक पंजाबी लोकगीत का मुखड़ा है जिसका लब्बोलुआब है कि मैं मुहब्बत में इस तरह गिरफ्तार हूं कि मुझे हर तरफ तेरा ही चेहरा नजर आता है। जिन्हें पंजाबी की समझ नहीं, उनके लिए फिल्म निर्देशक के आसिफ की अमर फिल्म ‘मुगले आजम’ के मशहूरो मारूफ गीत प्यार किया तो डरना क्या का अनुप्रतीकात्मक दृश्य पेश है, जब अनारकली शहंशाह अकबर के दरबार में नृत्य पेश कर रही है, और गीत का मुखड़ा गूंजता है-
छुप न सकेगा इश्क हमारा
चारों तरफ है उसका नजारा
यही वो पल है जब फिल्म रंगों में रंग जाती है, और सेट पर लगे कांच के हर टुकड़े में अनारकली परिलक्षित हो जाती है। मौजूदा सत्ता के शीशमहल में राहुल गांधी ऐसा ही मुकाम हासिल कर चुके हैं। शीशमहल मध्य-काल में फारसी व भारतीय शिल्पकला की मिश्रित शैली का नायाब नमूना है। इसमें छोटे-छोटे शीशों को दीवारों और छतों में जड़ा जाता था। इसकी खासियत यह भी थी कि एक दीपक से पूरा कक्ष प्रकाशित हो सकता था। सत्ता के शीशमहल में राहुल गांधी वैसे ही दीपक हैं। वे हैं तो अकेले, लेकिन दरो-दीवार पर उनका ही अक्स है। जिधर भी नजर उठाओ वही दिखते हैं।
पाठक पूछेंगे, जब दुनिया युद्ध के संकट पर बात कर रही है तो बेबाक बोल मुगल-काल में क्यों चला गया? वजह यही है कि मध्य-पूर्व में युद्ध लंबा खिंच चुका है, और भारत पर इसका प्रत्यक्ष असर पड़ चुका है। फिर भी सत्ता पक्ष ने संसद में अति उदारता प्रदर्शित करते हुए कहा कि पहले लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा होगी, युद्ध के भारतीयों पर असर को लेकर बाद में चर्चा हो सकती है। गोया कहा जा रहा हो कि सर्दी-जुकाम पर चर्चा बहुत जरूरी, हृदयाघात जैसी मामूली स्थिति पर कभी भी बात कर लेंगे।
युद्ध पर भारतीयों के असर के बरक्स अविश्वास प्रस्ताव को चुनने की एक ही वजह थी। सत्ता पक्ष को राहुल गांधी पर कटाक्ष करने का अवसर मिलने का रोमांच। बहुत कमजोर सी हो गई कांग्रेस पार्टी के सांसद व नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी वो शै हैं, जिनके लिए दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी के अध्यक्ष से लेकर मंत्री व सांसद हमेशा युद्धरत-मुद्रा में रहते हैं। सत्ता के शीर्ष से लेकर गाड़ी पर ‘हमारे चाचा विधायक हैं’ लिख कर चलने वालों को भी राहुल गांधी के सिवा और कोई नहीं दिखता है।
इस स्तंभ में पहले भी बिहार के उन तीन नेताओं पर बात की गई थी, जिन्हें अघोषित ‘राहुल भगाओ देश बचाओ मंत्रालय’ के महकमे में रखा गया है। यह अघोषित मंत्रालय चौबीस गुणे सात काम करता है। आम मंत्रालयों में फेरबदल हो जाए, लेकिन इसके जिम्मेदारों में फेरबदल नहीं होती है, क्योंकि जो अभी काम कर रहे हैं, उनके ‘कौशल’ पर पूरा भरोसा है। आम तौर पर सत्ता पक्ष के नेताओं की पहली प्राथमिकता देश के हालात पर नजर रखनी होती है। फिलहाल इनकी प्राथमिकता राहुल गांधी की एक-एक गतिविधि पर नजर रखने की होती है। फिर देश या विदेश में कहीं भी कुछ होता है तो, उसे राहुल गांधी की किसी न किसी गतिविधि से जोड़ दिया जाता है।
सत्ता पक्ष का हर अगंभीर सा दिखता नेता हर तीसरे दिन पत्रकारों के सामने बयान देता है-मैं राहुल गांधी को गंभीरता से नहीं लेता/लेती हूं। अब इनसे प्रति-प्रश्न पूछने वाले पत्रकार तो होते नहीं हैं कि अगर आप नेता प्रतिपक्ष को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं तो मतलब आप पूरे विपक्ष को और लोकतंत्र को ही गंभीरता से नहीं लेते हैं। आपके पास उनके अगंभीर बातों की कौन सी गंभीर काट है?
जब दुनिया युद्ध, तेल व ऊर्जा के अन्य संकटों से गुजर रही थी तो भारतीय सत्ता पक्ष को सबसे अहम काम बिहार में सत्ता परिवर्तन की कवायद शुरू करना लगा। जो सत्ता पक्ष व उससे जुड़े सहयोगी दल परिवारवाद के नाम पर राहुल गांधी को राजनीतिक रूप से पूरी तरह तबाह करने पर तुले थे, अब वही बिहार में पोस्टर लगा रहे हैं-निशांत हैं तो निश्चिंत हैं। राजनीतिक पाखंड की विडंबना है कि पहली ही नजर में राजनीतिक मंचों के लिए अयोग्य दिख रहे निशांत पर भयंकर चुप्पी पसरी है। ऐसा नहीं है कि बिहार में सिर्फ चुप्पी ही है।
नीतीश के परिवारवाद से नजरें चुरा कर गिरिराज सिंह चुप्पी तोड़ते हुए कहते हैं-राहुल गांधी इतना छोटा पजामा क्यों पहनते हैं? युद्ध के समय जब देश के लोग कई तरह की चिंताओं से घिरे हैं तब केंद्रीय मंत्री की चिंता राहुल गांधी के पजामे की नाप-जोख पर है। सत्ता पक्ष के कई नेताओं को राहुल गांधी की पोशाक की चिंता रहती है। अब इसके दोषी तो संविधान निर्माता ही होंगे, जिन्होंने संसद में प्रवेश के लिए ‘वर्दी’ तय नहीं की। राजग के सहयोगी दलों के अलावा गठबंधन को लेकर ढुलमुल रहने वाले क्षेत्रीय दलों का भी एकमात्र निशाना राहुल गांधी ही होते हैं। राहुल गांधी हरियाणा के एक साधारण किसान की बेटी की शादी में गए। इंटरनेट पर उनकी उजली पगड़ी वाली तस्वीर और साधारण किसान परिवार के शादी समारोह के दृश्य ‘वायरल’ हो गए।
बात हरियाणा की थी तो वहां के ही नेता मैदान में उतरे। जजपा के नेता दिग्विजय चौटाला ने तुरंत अपनी विशेषज्ञता जाहिर करते हुए कहा-राहुल गांधी किसी की परवाह नहीं करते, कल पगड़ी में वे अंग्रेज लग रहे थे। राहुल को लाल व हरी मिर्च तथा गाय व भैंस में अंतर पता नहीं।
राहुल गांधी को गाय व भैंस में अंतर पता हो या न हो, लेकिन सत्ता पक्ष और उसके गवाह बनने के लिए तैयार बैठे दलों के नेताओं को युद्ध की भयावहता का अंदाजा नहीं है।
पिछले लंबे समय से देखा गया है कि हर संकट की आहट पर बातचीत करने की गुजारिश को अफवाह कह कर टाल दिया जाता है। जब ‘अफवाह’ सच हो जाती है और जनता बुरी तरह फंस जाती हैतो हालात का जिम्मेदार या तो जवाहर लाल नेहरू या राहुल गांधी को ठहरा दिया जाता है। आज के समय में युद्ध में किसी भी देश की प्रत्यक्ष जीत नहीं होती, मगर हारती है दुनिया भर की जनता। युद्ध एक राजनीति है। बहस यही है कि दुनिया के सामने आप अपनी स्थिति कैसी रख रहे हैं? आप किस तरह की राजनीति करते नजर आ रहे हैं।
आज तार्किक रूप से अमेरिका और इजराइल पूरी तरह घिर चुके हैं। हम नहीं जानते, कल युद्ध कौन सा मोड़ लेगा। लेकिन पक्ष-विपक्ष से लेकर देश की जनता से अपील है कि कम से कम अपनी राजनीति तो सही रखिए। राजनीति सही रख कर बहुत सी चीजों को कभी भी सही दिशा की तरफ मोड़ा जा सकता है। फिलहाल इसी राजनीति के जरिए ईरान ने भौंचक कर रखा है। युद्ध के समय में चुटकुला राजनीति करना एक तरह से अपराध है। संकट को नजरअंदाज मत कीजिए, उस पर बात कीजिए। हमारा देश बहुत बड़ा और बहुलतावादी है। हमारी चुनौतियां अलग हैं। गंभीर होकर देश के बारे में सोचें, इससे पहले कि किसी तरह की देर हो।
