अनंतपद्मनाभन
हम सब कभी न कभी एक ऐसे मोड़ से गुजरते हैं, जहां बेहतरीन अवसर हमारा दरवाजा खटखटाता है, लेकिन हम उसे खोलने के बजाय हिचकिचाने लगते हैं। हम अपनी क्षमताओं, समय और ऊर्जा को तौलते हैं और यह तय कर लेते हैं कि हमें थोड़ा और समय चाहिए। तभी, वह अवसर आंखों के सामने से ओझल हो जाता है- कोई और उस जगह को भर देता है, या वह रास्ता बंद हो जाता है। बाद में यह मोड़ दिल में एक गहरा पछतावा छोड़ जाता है। हम खुद को ही कसूरवार मानने लगते हैं कि हमारी झिझक ने एक खूबसूरत पल को बर्बाद कर दिया। अगर हम ठहरकर अपनी जीवन-यात्रा के इस ताने-बाने को समझें, तो एक गहरा सच सामने आता है- आप उस मौके से इसलिए नहीं चूके, क्योंकि आप तैयार नहीं थे, बल्कि कुछ चीजें बस आपके हक में लिखी ही नहीं होतीं। जब योजनाएं अधूरी रह जाती हैं, तो खुद को दोष देना मानवीय स्वभाव है।
हम सोचते हैं कि काश हम थोड़े और साहसी, सक्षम या आत्मविश्वासी होते। मगर समय का चक्र दोनों तरफ से चलता है, जिसके लिए हमारी आंतरिक तैयारी और बाहरी परिस्थितियों का तालमेल जरूरी है। जब कोई अवसर हाथ से निकलता है, तो वह हमारी सजा नहीं, बल्कि जीवन का एक सौम्य मार्गदर्शन होता है। जरा सोचिए, आपका उस अवसर से पीछे हटना शायद डर नहीं था, बल्कि आपकी अंतरात्मा का वह इशारा था, जिसने भांप लिया था कि यह रास्ता आपके लिए सही नहीं है। जीवन की यह लय हमें सुकून देती है कि वह दरवाजा इसलिए बंद हुआ, क्योंकि उसके पीछे जो था, वह वास्तव में आपका था ही नहीं। इस सच को समझने के लिए हमें उन महान हस्तियों को देखना चाहिए, जिन्होंने बड़ी विफलताओं का सामना किया, लेकिन अंतत: अपना असली मुकाम पाया
देश के महान व्यंग्य-चित्रकार आरके लक्ष्मण के जीवन से भी प्रेरणा मिलती है। किशोरावस्था में उनका सिर्फ यही सपना था कि वे कला की औपचारिक शिक्षा लें। इसके लिए उन्होंने मुंबई के एक प्रतिष्ठित कला संस्थान में आवेदन किया। मगर वहां से जो जवाब आया, वह बेहद रूखा था। अधिकारी ने लिखा कि लक्ष्मण के चित्रों में वह योग्यता ही नहीं है, जो इस संस्थान में प्रवेश के लिए चाहिए। लक्ष्मण अंदर से टूट गए थे और गहरे असमंजस में थे कि क्या उन्हें कला छोड़ देनी चाहिए। मगर रास्ता बंद होने पर उन्होंने हार मानने के बजाय समाचार पत्रों के लिए स्वतंत्र रूप से रेखाचित्र बनाने शुरू कर दिए। इस मोड़ ने उन्हें एक अनोखी शैली विकसित करने के लिए प्रेरित किया, जो किसी भी किताबी नियम की मोहताज नहीं थी। आगे चलकर उन्होंने आम आदमी के उस अमर व्यंग्य-चित्र चरित्र को जन्म दिया, जिसने पचास से अधिक वर्षों तक हर भारतीय के सुख-दुख को बयां किया। अगर उस दिन संस्थान ने उन्हें स्वीकार कर लिया होता, तो वे एक पारंपरिक चित्रकार बनकर रह जाते। मगर हालात ने उनका रास्ता बदला, ताकि उनकी कला करोड़ों लोगों के दिलों की आवाज बन सके।
इस तरह के संघर्षों से प्रेरणा लेकर हम अतीत के पछतावे का बोझ उतार सकते हैं, क्योंकि ‘ऐसा होता तो क्या होता’ की सोच हमें सिर्फ बीते हुए कल से बांध कर रखती है। यदि आपके दिल में भी किसी छूटे हुए मौके की कसक बची है, तो सबसे पहले खुद को माफ कर दें। यह समझें कि आपका ठहरना केवल इसलिए था, क्योंकि आप अपना सर्वश्रेष्ठ देना चाहते थे और यह आपकी कमजोरी नहीं, आपकी ताकत है। बंद दरवाजों पर भरोसा करने का मतलब यह है कि जो मौका गया, वह एक तरह की सुरक्षा थी, जिसने आपको अनजाने तनावों से बचा लिया। जब सही अवसर सामने आएगा, तो वह आपसे यह मांग नहीं करेगा कि आप पूरी तरह दोषरहित हों। इसके विपरीत, वह आपके जीवन के सांचे में इतनी सहजता से ढल जाएगा कि आपकी तैयारी और आत्मविश्वास खुद-ब-खुद बाहर आ जाएगा।
याद रखें, टूटना कभी अंत नहीं होता, बल्कि वह एक नए स्वरूप में खुद को और अधिक मजबूत बनाने की शुरुआत है। तब आप किसी डर की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए आगे बढ़ेंगे, क्योंकि वह रास्ता आपको पूरी तरह अपना लगेगा। यह दुनिया किसी उल्टी गिनती वाली घड़ी पर नहीं चलती और आपकी खुशियों या आपकी सफलता की कोई अंतिम तारीख तय नहीं है। इसलिए, आने वाले कल की ओर बढ़ते हुए एक गहरी सांस लें। हर लहर को पकड़ने के तनाव को मन से निकाल दें और यह विश्वास रखें कि आप इस समय जीवन के जिस मोड़ पर हैं, बिल्कुल सही जगह पर हैं।
आप आज जो भी सबक सीख रहे हैं- यहां तक कि यह शांत ठहराव भी आपको उस भविष्य के लिए तैयार कर रहा है, जो आपकी क्षमताओं के अनुकूल है। विषम परिस्थितियां ही हमारे भीतर छिपे सोने को कुंदन बनाती हैं और जब तक हम संघर्षों की भट्टी से नहीं तपते, हमारा असली निखार सामने नहीं आता। खुद के प्रति थोड़े नरम रहें, अपनी गति से आगे बढ़ें और अपने दिल के दरवाजे को हमेशा खुला रखें, ताकि आप बिना किसी शिकायत के पहचान सकें सही समय का सौंदर्य। धैर्य, लगन, अटूट विश्वास और निरंतर प्रयास ही मनुष्य की वास्तविक नियति को पूर्ण करते हैं।
