एक व्यक्ति जब किसी दूसरे व्यक्ति को तीसरे व्यक्ति के बारे में दिल खोलकर दिमाग से बताता है, तो उसके दो इरादे हो सकते हैं। पहला, हल्के-फुल्के हास्य-व्यंग्य में लिपटा वक्त बिताने वाला नजरिया। जैसे गरमी के मौसम में पानी में नमक-चीनी के साथ थोड़ी ज्यादा काली मिर्च डालकर पीना और पिलाना। दूसरे इरादे के तहत यह सुनिश्चित करना कि दूसरा व्यक्ति बातचीत की खट्टी और कड़वी प्रतिक्रियाएं तीसरे व्यक्ति तक जरूर पहुंचा दे। कई बार ऐसा होता है कि दूसरों की कुछ बातें या व्यवहार का स्वाद पसंद नहीं आता।
हम सीधे-सीधे उनके सामने अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करने से बचते या डरते हैं। फिर कुछ समय बाद दूसरे उचित व्यक्ति को वह सब तीसरे व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए चुनते हैं। इस दौरान तीसरा व्यक्ति, जिसके बारे में बात होती है, कहीं मिले तो सामान्य बने रहते हैं। छनी हुई, असली लगने वाली नकली, नाटकीय मुस्कुराहटें थमाते रहते हैं, जैसे कुछ हुआ ही नहीं और सब ठीक चल रहा है।
यह दूसरे व्यक्ति के कानों पर निर्भर करता है कि उनमें कितनी तरह की मैल है। उसने क्या-क्या और किस-किस लहजे में सुना। कई बार मुंह से कान तक आते-आते कोई बात अपना रूप, रंग और स्वाद बदल लेती है। कोई बात सीधे-सीधे स्वीकार कर ली जाती है और कई बार लंबे, उबड़-खाबड़, कंटीले रास्ते से जख्मी होकर आती है। यह सुनने वाले के पाचन तंत्र पर निर्भर करता है कि वह किस तरह के विचार, उद्गार और प्रतिक्रियाएं हजम कर सकता है। कुछ हिस्सा छोड़ सकता है या पूरा छोड़ सकता है। व्यवहार के अनुसार यह जरूरी है कि बात जिस तरह से कही गई है, उसे जिस रंग, ढंग और आकार में लिया जाना चाहिए, उसी तरह से लिया जा रहा है या नहीं।
यहां यह ध्यान रखने की जरूरत है कि पहले व्यक्ति की किसी एक बात को अगर दूसरे और तीसरे व्यक्ति के जरिए चलते हुए चौथे, पांचवें या फिर दसवें व्यक्ति तक पहुंचना है, तो दसवें व्यक्ति तक पहुंचते-पहुंचते क्या वह बात अपने मूल स्वरूप और भाव में रह पाती है या फिर उसमें प्रभाव के स्तर पर बहुत कुछ बदल चुका होता है।
दरअसल, दूसरे व्यक्ति द्वारा सुना गया कुछ, सब कुछ या हर कुछ, यानी वे खास बातें इत्मीनान से तीसरे व्यक्ति तक पहुंचा दी गईं, तो यह माना जाना चाहिए कि उसकी विचार पाचन शक्ति कमजोर है। यहां फिर वही सूत्र बीच में आता है कि बात जब मुंह बदलती है, तो रूप, भाषा और अर्थ बदल लेती है। बात परदे में रहे, तो सब बेहतर रहता है। बात एक बार मुंह से निकल जाए, तो उसका सफर शुरू हो जाता है। बात रुकती नहीं, बात से बात निकलती है। उसके कई अर्थ निकाले जाने शुरू होते हैं। ऐसे-ऐसे भाव निकल आते हैं, जिनके बीज भी उस बात में नहीं होते। बात बढ़ जाती है, तो मानवीय रिश्ते सकुचाने लगते हैं। कभी सीमाओं से बाहर जाने लगते हैं। शक के नए घेरे बनने लगते हैं, जिनमें विवाद, वाद और संवाद परेशान होने लगते हैं।
संबंधों की निकटता फिर से दिखाने के लिए कोई बात उस तीसरे व्यक्ति को परोस दी जाती है, जिस तक उन्हें पहुंचाना पहले व्यक्ति का इरादा रहा होगा। यहां नए सवाल, शक और अनुमान कांटों की मानिंद उगने लगते हैं। वह बात को भुला भी सकता है, लेकिन मानवीय स्वभाव के अनेक कोण उसे उकसाते हैं। बात को नई करवटों में उलझा देना चाहते हैं, उलझा देते हैं। संबंध, उम्मीद और काल्पनिक दलीलों में उलझने लगते हैं और विश्वास कर लिया जाता है कि ऐसा कहा गया होगा। बात को कई बार बात ही बिगाड़ देती है और वक्त मौका ढूंढ़ने लगता है कि आमना-सामना हो, कहे गए शब्दों और व्यवहार की तफ्तीश हो। सोने की चेन खरीदना आसान होता है, लेकिन मुफ्त मिल रहा मन का चैन संभालकर रखना मुश्किल होता है।
इसलिए सलाह यह भी दी जाती है कि किसी के द्वारा किसी भी शैली में कही गई बात तभी सहजता के साथ मानी जानी चाहिए, जब वह सामने कही जाए। कहने वाला और सुनने वाला, दोनों तैयार हों। व्यवहार का नैसर्गिक पाठ तो यही है कि किसी के बारे में कुछ कहना जरूरी हो, तो उस व्यक्ति से ही सीधे बात की जाए। अगर उसकी बात का कोई अंश, क्रिया, संदर्भ या व्यवहार पसंद नहीं आता, तो उस व्यक्ति को बता भी देना चाहिए, ताकि वह माफी मांग सके और संबंध सामान्य बने रहें। किसी भी तरह या रंग की गलतफहमी का घास उग ही न सके।
तीसरे व्यक्ति के माध्यम से गिला या शिकवा-शिकायत में लिपटी अपनी प्रतिक्रिया या विचार प्रकट करना तारीफ के काबिल नहीं माना जा सकता। अगर ऐसा हो भी गया है, तो जिसने वे बातें सुन ली हैं, उसे वह स्वादिष्ट फल या हलवा समझकर कभी पेश नहीं करना चाहिए। कोई बात जिसके बारे में है, उसके साथ संबंध सामान्य रखने के लिए बात को संभालना बहुत जरूरी है। अगर बात को बेबात बनाकर, उसकी शक्ल बदलकर या उसमें नाहक कुछ बातें जोड़कर यानी उसका स्वरूप बदलकर उस व्यक्ति तक पहुंचा दिया गया है, तो उसे कतई विश्वास नहीं करना चाहिए कि ऐसा-वैसा कहा गया होगा। मानने की नौबत आती है, तो उसी बात को मानना चाहिए जो हमारी आंखों के सामने हो, हमारे मैलरहित कान सुन रहे हों। वास्तव में हम तीन जिंदगियां जीते हैं— अन्य लोगों के लिए, अपने कुछ खास लोगों के लिए और तीसरी गोपनीय जिंदगी। शायद इसीलिए कितनी बार बात दरअसल बेबात हो जाती है।
