समाज की स्मृति में दो वाक्य लंबे समय से समांतर रूप से चलते आए हैं- ‘तेते पांव पसारिये, जेती लांबी सौर’ और ‘ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्।’ ये केवल लोकवाक्य नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि के दो विपरीत छोर हैं। पहला संयम, यथार्थ और आत्मनियंत्रण की ओर संकेत करता है, तो दूसरा तात्कालिक सुख के लिए भविष्य की चिंता को स्थगित कर देने की प्रवृत्ति को वैधता देता है। समय के साथ इन दोनों के बीच का तनाव बना रहा, लेकिन आज का परिदृश्य इस तनाव को एक नए ढंग से सामने लाता है, जहां बाजार केवल वस्तुओं का विनिमय नहीं करता, बल्कि आकांक्षाओं, असुरक्षा और इच्छाओं को भी गढ़ता है।

एक समय था जब वस्तुओं का जीवन में प्रवेश धीमा और विचारपूर्ण होता था। खरीद एक निर्णय थी और उस निर्णय के पीछे एक क्रम-जरूरत का आकलन, संसाधनों का संतुलन और भविष्य की एक सहज चिंता थी। वस्तुएं उपयोगिता के साथ-साथ एक नैतिक अर्थ भी रखती थीं। वे जीवन को सरल बनाती थीं, पर उसे परिभाषित नहीं करती थीं। अब स्थिति उलट गई है। वस्तुएं जीवन की परिभाषा बनने लगी हैं। बाजार ने उपभोग को केवल आसान नहीं बनाया, बल्कि उसे अनिवार्यता का रूप दे दिया है। विज्ञापन, डिजिटल मंच और विपणन की नई रणनीतियां मिलकर एक ऐसा वातावरण निर्मित करती हैं, जिसमें इच्छा और आवश्यकता के बीच की रेखा लगातार धुंधली पड़ती जाती है। बाजार केवल मांग को पूरा नहीं करता, वह मांग पैदा करता है। और इसी प्रक्रिया में व्यक्ति के भीतर एक स्थायी ‘अपर्याप्तता’ का भाव आकार लेता है। यह वस्तुनिष्ठ नहीं होती, लेकिन अनुभव में वास्तविक लगती है।

व्यक्ति को यह महसूस होता है कि वह जैसा है, उतना पर्याप्त नहीं है और यह कमी वस्तुओं के माध्यम से पूरी की जा सकती है। यहीं से उपभोग एक विकल्प नहीं रहता, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक बाध्यता का रूप लेने लगता है। यह बाध्यता किसी बाहरी दबाव से नहीं, बल्कि भीतर के उस सूक्ष्म असंतोष से पैदा होती है, जिसे बाजार लगातार जीवित रखता है। अब वस्तुएं जरूरत पूरी करने के बजाय आत्म-छवि का विस्तार बन गई हैं। कौन-सा फोन, किस तरह की कार, कौन-सी सुविधाएं, किन स्थानों की यात्राएं- ये सब एक सामाजिक पहचान रचते हैं। इस दौड़ में पीछे छूट जाने का भय उपभोग की गति को और तीखा करता है।

इस पूरी प्रक्रिया को व्यावहारिक आधार देता है आसान कर्ज। क्रेडिट कार्ड, त्वरित ऋण और ‘अभी खरीदें, बाद में भुगतान करें’ जैसी व्यवस्थाएं इच्छा और सामर्थ्य के बीच के अंतर को समाप्त नहीं करतीं। वे उसे समय में आगे खिसका देती हैं। जो पहले निर्णय को टालने का कारण था, वही अब उसे शीघ्र लेने का साधन बन जाता है। उपभोग तत्काल होता है, उसका भुगतान स्थगित। कर्ज का प्रभाव तत्काल नहीं दिखता। वह धीरे-धीरे जीवन की संरचना में शामिल होता है। शुरुआत में वह सुविधा का विस्तार करता है, लेकिन समय के साथ वह आय के उपयोग को सीमित करने लगता है। आय का एक हिस्सा नियमित रूप से पूर्वनिर्धारित हो जाता है- देनदारियों के रूप में। इस स्थिति में व्यक्ति के पास संसाधन होते हुए भी उनके उपयोग की स्वतंत्रता घटने लगती है। उधार का सुख तत्काल हो सकता है, लेकिन उसकी कीमत समय के साथ सामने आती है। उपभोग और भुगतान के बीच का यह अंतर धीरे-धीरे एक स्थायी संरचना बन सकता है, जिसमें वर्तमान लगातार भविष्य पर निर्भर रहने लगता है।

इस परिदृश्य को और जटिल बनाता है सामाजिक संदर्भ। उपभोग अब निजी निर्णय भर नहीं रहा। वह दृश्यता और तुलना से जुड़ गया है। डिजिटल माध्यमों ने जीवन को एक निरंतर प्रदर्शन में बदल दिया है, जहां दूसरों के जीवन के चुने हुए हिस्से ही दिखाई देते हैं। यह दृश्य वास्तविकता नहीं, लेकिन प्रभाव वास्तविक होता है। व्यक्ति अपनी जरूरतों को नहीं, अपनी ‘दिखने वाली स्थिति’ को समायोजित करने लगता है। इसी क्रम में संयम की धारणा भी बदलती है। ‘तेते पांव पसारिये’ अब व्यावहारिक नियम कम और एक दूरस्थ सलाह अधिक प्रतीत होता है। हालांकि उपभोग के विस्तार ने जीवन को कई स्तरों पर सरल भी बनाया है। मगर जब उपभोग का संबंध संतुलन से हटकर विस्तार से जुड़ता है, तो उसके साथ दबाव भी बढ़ता है।

बाजार की संरचना इसी विस्तार पर आधारित है। इसलिए वह स्थिरता के बजाय निरंतरता को बढ़ावा देता है- नई इच्छाएं, नए मानक और लगातार बदलती अपेक्षाएं। व्यक्ति एक ऐसी प्रक्रिया का हिस्सा बन जाता है, जिसमें गति तो होती है, पर दिशा का बोध स्पष्ट नहीं रहता। इस संदर्भ में ये दोनों सूत्र फिर सामने आते हैं- ‘तेते पांव पसारिये’ और ‘ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्।’ अब वे केवल परंपरा के अवशेष नहीं, बल्कि दो अलग आर्थिक-सांस्कृतिक ढांचों के संकेत हैं। एक में आय और इच्छा के बीच स्पष्ट संबंध है, दूसरे में इस संबंध को स्थगित कर दिया जाता है।

अंतर सूक्ष्म है, पर निर्णायक। पहले में सीमा दिखाई देती है, दूसरे में सुविधा। मगर समय के साथ स्पष्ट होता है कि सुविधा का विस्तार अक्सर सीमा के स्थान पर ही स्थापित हो जाता है। आखिरकार बात इतनी-सी है कि उपभोग अब केवल चुनाव नहीं रहा, वह धीरे-धीरे जीवन की पूर्व-शर्त बनता जा रहा है। ‘ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्’ अब एक उक्ति नहीं, एक व्यवहारिक ढांचा है, जिसमें सुख पहले आता है और उसकी कीमत बाद में, लेकिन लगातार चुकानी पड़ती है। इसके ठीक समांतर ‘तेते पांव पसारिये’ मौजूद तो है, पर उसकी जगह सिकुड़ती जाती है। यहीं यह अंतर निर्णायक हो जाता है- सीमा और सुविधा के बीच। यहीं यह प्रश्न अपने सबसे सरल रूप में सामने आता है- क्या उपभोग हमारी जरूरतों का विस्तार कर रहा है, या हमारी जीवन-रचना को बदल रहा है?

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एक कहावत है ‘नया नौ दिन, पुराना सौ दिन’। आज औद्योगीकरण की वजह से दुनिया भर में बाजार तेजी से बदलते जा रहे हैं। इसी के साथ फैशन की दुनिया में भी तेजी से बदलाव आ रहा है। हम सब समाज में रहते हैं और समाज के साथ ही चलते हैं। मगर आज की सामाजिकता अपने नए स्वरूप में दुनिया के समक्ष है। आज का समाज लोगों के बजाय बाजार पर ज्यादा निर्भर होता गया है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक