विचार और अनुभूति मानव मन की दो अलग-अलग, लेकिन एक-दूसरे से संबंधित अवस्थाएं होती हैं। विचार जहां बुद्धि की सोच को कहा जाता है, वहीं अनुभूति दिल के अहसास या अनुभवों से जुड़ी होती है। यों आमतौर पर कहा जाता है कि कुछ लोग दिल से सोचते हैं, तो कुछ लोग दिमाग से सोचते हैं। जो दिमाग से सोचते हैं, वे हर बात में अपना लाभ-हानि देखते हैं और जो लोग दिल से सोचते हैं, वे दूसरों के दुख-दर्द से भी दुखी हो जाते हैं या दूसरों की खुशी में खुश भी हो जाते हैं।
कई बार देखा जाता है कि हम अपने किसी मित्र या परिजन को चिंताग्रस्त या चुपचाप बैठे देखते हैं, तो पूछ लेते हैं कि क्या विचार कर रहे हो… या क्या सोच रहे हो। हम किसी समस्या में उलझे अपने मित्र को या किसी अपने को सलाह भी दे देते हैं कि अब ज्यादा मत सोचो, ज्यादा विचार मत करो, सब ठीक ही होगा। मगर अब ‘ज्यादा मत सोचो’ कहने भर से दिमाग में चल रहे विचार-चक्र को या दिल में उठ रहे भावनाओं के बवंडर को रोकना भला हमारे या किसी के भी हाथ में कहां होता है?
यह विडंबना ही है कि मनुष्य का विचार-चक्र सतत चलता ही रहता है। सुख हो या दुख, मनुष्य अकेला हो या किसी महफिल में, उसके दिमाग में विचार आते ही रहते हैं। वह हरदम, हर पल कुछ न कुछ सोचता ही रहता है। यहां तक कि सोते हुए भी मानव के दिमाग का एक हिस्सा जागृत रहता ही है, जो दिनभर में सोची गई, देखी गई बातें दृश्य रूप में या स्वप्न के रूप में दिखाता रहता है।
विचार का अर्थ सोच, खयाल या दिमाग में उठने वाली कल्पना या राय से लगाया जाता है। इसलिए कहा जाता है कि सोच-विचार एक प्रकार की मानसिक प्रक्रिया है। यों विचार या चिंतन को एक संज्ञानात्मक प्रक्रिया भी कहते हैं, जिसमें मानव मन किसी बात या समस्या के अच्छे या बुरे दोनों पहलुओं पर सोचता रहता है और अपने मन-मस्तिष्क में मंथन-चिंतन करता रहता है। जब मनुष्य सोच-विचार करता है, तो इसमें तर्क, योजना, शब्द-चित्र हो सकते हैं। यानी सोच-विचार को किसी चीज या समस्या को समझने का मानसिक तरीका भी माना जा सकता है।
घर के बुजुर्ग प्राय: कहते-समझाते हैं कि हमेशा अच्छा सोचना-विचारना चाहिए, क्योंकि अच्छा सोचेंगे, तो अच्छा होगा और बुरा सोचेंगे तो बुरा होगा। दरअसल, हमारी सोच और विचारों का हमारे आचरण पर प्रभाव भी साफ-साफ दिखता है। जो लोग अच्छा सोचते हैं, अच्छा विचार करते हैं, वे आमतौर पर दूसरों की मदद करने में भी अव्वल ही रहते हैं। जो बुरा सोचते हैं, वे औरों का या कई बार अनजाने में खुद का भी बुरा कर बैठते हैं।
अगर कहा जाए कि मन के विचार ही हमारे जीवन को दिशा देते हैं, तो गलत नहीं होगा, क्योंकि सकारात्मक विचार हमें आगे बढ़ने में मदद करते हैं और नकारात्मक विचार हमारा आत्मविश्वास खत्म कर, जीती हुई बाजी को भी हरवा सकते हैं। एक मराठी कहावत है कि ‘मन चिंती, ते वैरी न चिंती’ यानी कई बार हमारा मन इतनी बुरी बातें सोच लेता है, जो शायद हमारे किसी दुश्मन ने भी न सोची होंगी। घर के किसी सदस्य को किसी दिन घर आने में देर हो जाए और उससे संपर्क न हो रहा हो, तो मन में खराब विचार पहले आने लगते हैं कि कहीं उसके साथ कुछ बुरा तो नहीं हो गया। फिर हमारे विचारों की गति इतनी होती है कि पलभर में हम विचारों में ही सात समंदर पार कर सकते हैं।
विचारों के बारे में एक मजेदार बात और भी है कि हम अपने विचारों का विनिमय भी कर सकते हैं। सुनने में अटपटा लगता है, क्योंकि विचार करना एक मानसिक प्रक्रिया है और विनिमय से तात्पर्य तो किसी वस्तु या सेवा के बदले में दूसरी वस्तु या सेवा या मुद्रा का आदान-प्रदान करना है। मगर जब ये दोनों शब्द साथ में आते हैं, तो एक नया शब्द विचार-विनिमय बनता है।
विचार-विनिमय शब्द बताता है कि विचारों का भी आदान-प्रदान किया जा सकता है, बल्कि किया भी जाता है। दफ्तरों में होने वाली बैठकों में, जहां दफ्तर के अफसर या सहयोगी किसी समस्या विशेष को सुलझाने के लिए अपने-अपने विचार प्रकट करते हैं और इन्हीं अच्छे विचारों का एकत्रित स्वरूप, कार्यशैली के रूप में अपनाकर उक्त समस्या के निराकरण की कोशिश की जाती है। इसी प्रकार विविध संस्थाओं द्वारा किसी विषय-विशेष पर सेमिनार, विचार-विनिमय के लिए ही आयोजित किए जाते हैं।
जिस प्रकार दूध की मलाई या दही को मथने पर घी निकलता है, ठीक उसी प्रकार किसी भी समस्या पर, चाहे वह कितनी ही बड़ी क्यों न हो, विचार-विनिमय करने से या विचार-मंथन करने से उसका हल या उस समस्या का निदान भी मिल ही जाता है। यों विचार-विनिमय से सिर्फ समस्याओं के हल ही नहीं मिलते, बल्कि अनेक लोग अपने विचारों का विनिमय मुद्रा कमाने के लिए भी करते हैं। सच नहीं लगता ना कि किसी के विचारों के लिए कोई अन्य मुद्रा या पैसा क्यों देगा?
लेखक कहानी या लेख लिखकर, कविता या गीत लिखकर, हास्य कलाकार अपनी कल्पना या अपने विचारों से कुछ चुटकुले रच कर मुद्रा या पैसा कमा सकते हैं और कमाते भी हैं। विचारपूर्वक काम करने से किसी भी काम की सफलता सुनिश्चित हो सकती है। किसी ने कहा भी है कि पैर की मोच और छोटी सोच हमें आगे नहीं बढ़ने देती। ऐसे में सकारात्मक सोचें और यदि सादा जीवन एवं उच्च विचार अपना लिया जाए, तो जीवन सफल हो सकता है।
