आधुनिक विकास का पहिया जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे कई ऐसी समस्याएं पैदा हो रही हैं, जिनका निकट भविष्य में कोई समाधान नहीं दिखाई दे रहा है। ऐसी ही एक विकट समस्या है माइक्रोप्लास्टिक (प्लास्टिक के सूक्ष्म कण) की। यह हवा, ओस और बारिश के जरिए मनुष्य सहित तमाम जीव-जंतुओं की सेहत तथा जैव विविधता पर गहरा असर डाल रहा है। यह प्लास्टिक हमें दिखता नहीं है, लेकिन हमारे ऊपर लगातार वार कर रहा है। इस पर अमेरिका में हुआ शोध एक विज्ञान पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। इसके मुताबिक, दुनिया की साफ मानी जानी वाली जगह ‘दक्षिण नेशनल पार्क’ की हवा में भी प्लास्टिक के महीन कण पाए गए हैं। इस इलाके में न तो वाहनों की भीड़भाड़ है और न ही यहां उद्योग हैं, इसके बावजूद यहां प्लास्टिक के सूक्ष्म कणों की बरसात होती रही है। इससे सैकड़ों टन प्लास्टिक के कण धरती पर बिछ चुके हैं। दूसरी तरफ यूनिवर्सिटी आफ आकलैंड (न्यूजीलैंड) के वैज्ञानिकों के मुताबिक, इलेक्ट्रिक और इलेक्ट्रानिक सामान से पालिकार्बोनेट निकलता है, जो एक तरह का प्लास्टिक ही है। इससे भी मानव स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।

वैज्ञानिकों ने माइक्रोप्लास्टिक के असर पर शोध के दौरान पाया कि हम रोज प्लास्टिक के लगभग सात हजार सूक्ष्मकण अपनी सांस के जरिए लेते हैं। अध्ययन के मुताबिक, इससे वैसा ही असर होता है जैसा तंबाकू खाना या सिगरेट पीना। यह एक गंभीर स्थिति है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे लोगों की सेहत पर ही असर नहीं हो रहा, बल्कि महिलाओं की प्रजनन क्षमता पर भी यह नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है।

वैज्ञानिकों का मानना है माइक्रोप्लास्टिक हमारी कुल क्षमता पर भी असर डाल रहा है। गौरतलब है माइक्रोप्लास्टिक एक बार इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक में खासतौर से पाया जाता है। इसके इस्तेमाल पर तुरंत रोक लगनी चाहिए, क्योंकि केवल एक बार उपयोग में आने वाले प्लास्टिक से महज हवा ही प्रदूषित नहीं हो रही, बल्कि मिट्टी और पानी भी प्रदूषित हो रहा है। माइक्रोप्लास्टिक से जलीय जीव-जंतुओं और पक्षियों पर भी असर हुआ है। इससे कई जीव-जंतु विलुप्त हो गए। जीव-जंतुओं में कई तरह की बीमारियां हो रही हैं और उनकी उम्र में भी कमी देखी जा रही है। इसके अतिरिक्त समुद्र, नदियों और झीलों का जल कई तरह के प्रदूषण से ग्रस्त हो गया है। कस्बों और गांवों के कुओं तथा नहरों का जल भी प्लास्टिक और माइक्रोप्लास्टिक के कारण प्रदूषित हो गया है। इससे ग्रामीण और कस्बाई लोग कई प्रकार की बीमारियों से ग्रस्त हो गए हैं। एक अनुमान के मुताबिक नदियों और समुद्र तटों पर अरबों टन प्लास्टिक कचरा मौजूद है। हालांकि इस कचरे का पुनर्चक्रण करने का कार्य दुनिया की कुछ कंपनियां कर रही हैं।

इस समस्या को ध्यान में रखते हुए केंद्र और राज्य सरकारों ने एक बार इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक के लिए राज्य स्तरीय नियम बना कर इसे प्रतिबंधित करने का कार्य किया, वहीं अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भी 2025 तक पैकेजिंग में सौ फीसद पुनर्चक्रित उत्पाद का उपयोग करने की घोषणा की थी, लेकिन अभी इस दिशा में कितना काम हुआ है, बता पाना मुश्किल है। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, उत्तराखंड, पंजाब, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और हरियाणा सहित देश के अनेक राज्यों में प्लास्टिक कचरे पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है, लेकिन व्यावहारिक रूप से एक बार इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक का चलन अब भी जारी है। यदि एक बार इस्तेमाल वाले प्लास्टिक को चलन से बाहर नहीं किया गया, तो माइक्रोप्लास्टिक से मानव सभ्यता का जो नुकसान होगा, वह हमारी कल्पना से भी अधिक हो सकता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार साधारण प्लास्टिक को सड़ने में भी लगभग पांच सौ वर्ष लग जाते हैं। मगर सहजता से उपलब्ध होने के कारण इसके जहरीलेपन को नजरअंदाज कर कर दिया जाता है। दुनिया में इसका महज पांच में से एक हिस्से का ही पुनर्चक्रण हो पाता है। इस तरह इसका 80 फीसद हिस्सा समुद्र में जा रहा है। इसमें माइक्रोप्लास्टिक का हिस्सा सबसे ज्यादा होता है। समुद्री पक्षी प्लास्टिक के कारण असमय मौत का शिकार बन रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक हर वर्ष करीब एक लाख समुद्री जीव मर जाते हैं। कई जीव-जंतु और पक्षी तो विलुप्त हो गए। इसके अतिरिक्त समुद्र, नदियों और झीलों का जल भी प्रदूषण का शिकार हो गया। कस्बों और गांवों के कुओं और नहरों का जल भी प्लास्टिक के कारण प्रदूषित हो गया है। एक सर्वेक्षण के मुताबिक सत्तर के दशक के बाद प्लास्टिक का उपयोग शहरी, ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में बढ़ता गया। अब यह कई बीमारियों का कारण बन गया है। अब तो प्लास्टिक के बगैर काम नहीं चलता। जाहिर है, इसके असर से बचना नामुमकिन है।

उपयोग में आने वाले प्लास्टिक को जलाने से कई तरह की जहरीली गैसें पैदा होती हैं, जिनमें नाइट्रिक आक्साइड, कार्बन डाइआक्साइड और कार्बन मोनोआक्साइड प्रमुख हैं। इन गैसों से फेफड़ों और आंखों की बीमारियां, कैंसर, मोटापा, मधुमेह, थाायराइड, पेट और सिर दर्द तथा कब्ज जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। नए शोध के अनुसार, प्लास्टिक से बने बर्तनों के उपयोग से इसमें मौजूद नुकसानदेह रसायन खाद्य पदार्थों में घुलकर हमारे शरीर में पहुंच जाते हैं, जिससे पेट, सिर, फेफड़े और आंख से संबंधित समस्याएं पैदा हो जाती हैं। महिलाओं में प्लास्टिक के अधिक उपयोग के कारण बांझपन आ सकता है। नदियों, झीलों और समुद्र के किनारे उगी वनस्पतियों और पेड़ों पर इसका असर अधिक देखा गया है।

माइक्रोप्लास्टिक पर दुनियाभर में लगातार शोध जारी हैं। एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के मुताबिक इंसानी शरीर खासकर मस्तिष्क पर माइक्रोप्लास्टिक का असर बहुत तेजी से बढ़ रहा है। इससे मस्तिष्क की मूल संरचना में बदलाव आ रहा है। दिल का दौरा और मस्तिष्क आघात की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। जांच के सभी नमूनों में माइक्रोप्लास्टिक पाए जाने के प्रमाण मिले। गौरतलब है कि प्लास्टिक प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ता जा रहा है। शोध बताता है कि यह कैंसर और मनोभ्रंश का बहुत बड़ा कारण बन रहा है। प्लास्टिक प्रदूषण जिस तरह गहरा होता जा रहा है, उसे गंभीरता से लेने की जरूरत है। पिछले पांच दशकों में प्लास्टिक प्रदूषण मानव सभ्यता के लिए खतरनाक बनता चला गया है। पहाड़ों से लेकर समुद्र की गहराइयों तक, धरती का कोई भी कोना शायद ही बचा हो जहां प्लास्टिक न पहुंचा हो। मनोभ्रंश से प्रभावित लोगों के मस्तिष्क में छह गुना ज्यादा माइक्रोप्लास्टिक मिलना चिंता की बात कही जा रही है। ऐसे मरीजों के मस्तिष्क में सामान्य लोगों की तुलना में छह गुना माइक्रोप्लास्टिक अधिक पाया गया है।

माइक्रोप्लास्टिक के खतरे और दुष्परिणामों से क्या मनुष्यों को बचाया जा सकता है? क्या इसके बढ़ते असर को रोक पाना संभव होगा? लोगों को इससे बचाने के लिए ऐसे क्या कदम उठाए जा रहे हैं और हर व्यक्ति किस तरह माइक्रोप्लास्टिक के असर से बच सकता है? इन मसलों पर भी लगातार शोध किए जाने चाहिए। उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले वक्त में माइक्रोप्लास्टिक से बचने-बचाने के बेहतर तरीके खोजे जा सकेंगे।