प्रेम के अनेक प्रसंग और रूप हैं, जिनका भरपूर उल्लेख साहित्य में मिलता है। उनकी नियति कहानियां बनकर रह जाने में है। मगर एक प्रेम कहानी विचारों की दुनिया से है, जो बौद्धिकता की बुनियाद पर टिकी है। इसके महत्त्व का ऐतिहासिक कारण है। इसने नाजीवाद को परास्त किया था। इसलिए यह मात्र प्रेम कहानी नहीं है।

इसमें रचनात्मक बौद्धिकता और सामाजिकता के साथ-साथ मतांतर, मतभेद और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मानवीय संवेदनशीलता को जीवित रखने का संदेश है। विज्ञान, तकनीक तथा जानकारियों की उपलब्धता के साधनों और भौतिक सुविधाओं के सहारे उन्नति के इस युग में साहित्य और समाजशास्त्र मानव मन को संतुलित रखने, सामाजिक बने रहने तथा वैज्ञानिक खोज को मन, विवेक एवं बुद्धि के नियंत्रण में रखने की क्षमता विकसित करने में पूरी तरह निष्फल सिद्ध हो रहा है।

नाजीवादी प्रतिकूलताओं के बीच मार्टिन हाइडेगर (1889-1976) और हाना आरेंट (1906-1975) का प्रेम वैचारिक दरिद्रता एवं बौद्धिक कायरता दोनों से मुक्ति पाने का संदेश देता है। हाइडेगर की बौद्धिकता से प्रभावित होकर आरेंट उम्र में सत्रह वर्षों के अंतर के बावजूद उनसे प्रेम करने लगी। दोनों में एक-दूसरे की तरह बनने की ललक तो थी, मगर उन्होंने अपने स्व को भी आबाद रखा। ऐसे प्रेम के लिए उपयुक्त शब्दों का प्रयोग करने में कवियों को भी परिश्रम करना पड़ता है।

मृत्यु की चेतना से समय की अहमियत तक

हाइडेगर बीसवीं शताब्दी के प्रभावशाली समाजशास्त्रियों में से एक थे। ‘बीइंग एंड टाइम’ (1927) उनकी महत्त्वपूर्ण रचना है, जिस पर आरेंट की छाप है। उन्होंने अस्तित्व, तकनीक, भाषा और आधुनिक सभ्यता को देखने का तरीका बदला। उनके अनुसार, मृत्यु जीवन का केवल अंतिम क्षण नहीं है। मृत्यु की चेतना बताती है कि मनुष्य का जीवन सीमित है। इसलिए समय अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। तकनीक पर उनका विचार तब विवादित जरूर था, पर आज निर्विवादित बन गया। यह मनुष्य और प्रकृति को संसाधनों से तथा ज्ञान को उपयोगिता और समय को उत्पादकता से जोड़ता है।

हाना आरेंट की सबसे प्रसिद्ध पुस्तक ‘द ओरिजिन्स ऑफ टोटलिटेरियनिज्म’ (अधिनायकवाद की उत्पत्ति) है। दूसरी ‘बैनेलिटी ऑफ इविल’ है। इसमें उन्होंने बुराई के लिए आदेश का पालन करने वाले नौकरशाहों को भी जिम्मेदार माना है। एडोल्फ हिटलर का जर्मनी में उदय हुआ। नाजीवाद ने मानवता को झकझोर दिया। यह तानाशाहों का काल था। रूस में जोसेफ स्टालिन का, तो इटली में मुसोलिनी के फासीवाद के दौर का। जापानी और अंग्रेज शासकों में क्रूरता की कमी नहीं थी।

हाइडेगर और आरेंट के सामने साथ रहने या बिछड़ने का विकल्प था। हाइडेगर ने जर्मनी नहीं छोड़ा और आरेंट अमेरिका चली गईं। हाइडेगर नाजी पार्टी से जुड़े, जिसको बाद में उन्होंने अपनी सबसे बड़ी मूर्खता माना। आरेंट उन्हें ‘चिंतन का राजा’ मानती थीं। फिर भी 1946 में वह हाइडेगर को ‘संभावित हत्यारा’ कहने में नहीं हिचकीं। यह आरेंट का चिंतकों के लिए बड़ा संदेश है कि स्वर्ग के बारे में सोचते-सोचते इतना मग्न न हो जाएं कि सामने के कुएं में ही गिर जाएं।

हाइडेगर सहित जर्मनी के ज्यादातर बुद्धिजीवियों का अपराध यह था कि वे वह नहीं कर पाए, जो थॉमस मान (1875-1955) या कार्ल वॉन ओस्सिएट्ज्की (1889-1938) ने किया। मान खुले रूप में नाजीवाद के खिलाफ थे, तो ओस्सिएट्ज्की पत्रकार के रूप में हिटलर के कुकृत्यों को सामने लाए। यह दिखाता है कि खौफ के बीच भी रचनात्मकता ने दम नहीं तोड़ा। एचजी वेल्स ने पेरिस में पुस्तकों को बचाने के लिए पुस्तकालय खोला। जॉर्ज ऑरवेल ने लोगों को मानसिक मजबूती देने का काम किया।

नाजीवाद के अंत के बाद आरेंट और हाइडेगर का पुनर्मिलन हुआ। विचार ने इसकी मध्यस्थता की। विचार के प्रति ललक ने प्रेम और सामाजिकता दोनों को मरने नहीं दिया। जब वे 9 फरवरी 1950 को मिले, तो आरेंट का उद्गार था- ‘ऐसा लगा जैसे अचानक समय ठहर गया है।’ उन्होंने एक पत्र में लिखा था कि मारबर्ग छोड़ते समय अपने संबंधों को पूरी तरह समाप्त नहीं मानकर उन्होंने अक्षम्य विश्वासघात करने और अपने जीवन को बिगाड़ने से बचा लिया।

विचार अलग हों, संवाद क्यों खत्म हो?

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान और उसके बाद बौद्धिकता के प्रवाह ने जब नए मानव जीवन की खोज शुरू की, तो पूंजीवाद और साम्यवाद के झगड़े ने उसे खंडित कर दिया। बौद्धिकों को वैचारिक कारखानों का उत्पाद मात्र बना दिया गया। स्वतंत्र मन और स्वायत्त विचार दुर्लभतम चीजें बन गईं। इसका परिणाम कटुतापूर्ण ध्रुवीकरण के रूप में सामने आया। विचारों का अंतर संवाद, सामाजिकता और गुणग्राहकता का अंत नहीं होना चाहिए। हाइडेगर और आरेंट ने इसका उदाहरण बनकर दिखाया। आरेंट ने हाइडेगर को वैचारिक अपराध के कारण और हाइडेगर ने आरेंट को उस अपराध के विरोध में खड़ा होने के कारण एक-दूसरे के प्रति कटुता को अंकुरित नहीं होने दिया। वे विचारों का सृजन या संशोधन करते रहे।

इन दोनों की बातचीत और प्रेम पत्रों में मानवता के प्रश्नों को सुलझाने के लिए विचारों की तलाश होती थी। जब वे मिले थे, तब आरेंट 19 वर्ष की तथा हाइडेगर 36 वर्ष के थे और पुनर्मिलन सत्रह वर्षों के बाद हुआ, मगर चिंतन की दुनिया को इस उथल-पुथल से क्षति नहीं हुई। हाइडेगर इस बात की चिंता जताते थे कि आधुनिक सभ्यता को खतरा ‘चिंतन विहीनता’ से है। ऐसा नहीं है कि लोग सोच नहीं सकते, बल्कि वे सोचने से भागने लगे हैं। चिंतन तो होता है, पर योजनाबद्ध होता है। जबकि यह साधना के साथ होना चाहिए। वहीं आरेंट मानती रहीं कि राजनीतिक बुराई तब संभव होती है, जब लोग आलोचनात्मक ढंग से सोचना छोड़ देते हैं। इन दोनों का प्रेम प्रसंग चेतना और चिंतन के चरैवेति-चरैवेति होने का संदेश देता है।