राजनीति में कहा जाता है कि वक्त बहुत ताकतवर होता है, जब आपका वक्त अच्छा होता है तो नेता, भीड़, कार्यकर्ता आपके साथ होते हैं लेकिन जब वक्त कमजोर होता है तो आप अकेले होने लगते हैं। ऐसा ही कुछ पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और टीएमसी की प्रमुख ममता बनर्जी के साथ हो रहा है।
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के नतीजे 4 मई को आए थे और 9 मई को शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी।
इस तरह पश्चिम बंगाल में सरकार बदले हुए अभी मुश्किल से एक महीने का ही वक्त हुआ है लेकिन ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी बुरी तरह दरकती हुई दिख रही है।
2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव और इस दौरान हुए कई राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के बेहद खराब प्रदर्शन और पश्चिम बंगाल में टीएमसी के लगातार 2011, 2016 और 2021 में सरकार बनाने के बाद ममता बनर्जी को विपक्ष की सबसे बड़ी नेता कहा जाने लगा था।
पीएम पद की उम्मीदवार बताते थे समर्थक
खुद ममता बनर्जी कहती थीं कि कांग्रेस विपक्षी इंडिया गठबंधन की अगुवाई नहीं कर पा रही है और उन्हें इसकी अगुवाई करने का मौका दिया जाना चाहिए। ममता बनर्जी के समर्थक और कार्यकर्ता भी उन्हें प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवार और केंद्र की बीजेपी सरकार से लड़ने वाली एकमात्र नेता बताते थे।
टीएमसी के नेता उन्हें पश्चिम बंगाल की शेरनी कहते थे। टीएमसी ने पूरी कोशिश की थी कि 2024 के लोकसभा चुनाव में ममता बनर्जी ही विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवार हों।
2014 से 2024 के बीच का वक्त वह वक्त था, जब ममता बनर्जी इंडिया गठबंधन में शामिल कांग्रेस और वाम दलों को पश्चिम बंगाल में विधानसभा या लोकसभा में सीटों की हिस्सेदारी देने के लिए तैयार नहीं थीं। हालांकि इस बार विधानसभा चुनाव में हार के बाद वह विपक्षी नेताओं से मुलाकात कर रही हैं और दिल्ली में इंडिया गठबंधन की बैठक में भाग लेने भी आई हुई हैं।
2021 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने जब बीजेपी के द्वारा पूरी ताकत लगाए जाने के बाद भी बड़ी जीत दर्ज की थी तब उनकी छवि एक ऐसे नेता की बन गई थी जिन्होंने पश्चिम बंगाल में वाम दलों और कांग्रेस को लगभग शून्य कर दिया और बीजेपी को भी सरकार नहीं बनाने दी।
2026 के विधानसभा चुनाव के वक्त भी टीएमसी ने फिर से अपनी सरकार बनाने के लिए जमकर पसीना बहाया लेकिन जो चुनाव नतीजे आए वह टीएमसी के नेताओं और उसके समर्थकों की उम्मीद के खिलाफ थे। 2021 के विधानसभा चुनाव में 215 सीटें जीतने वाली टीएमसी इस बार सिर्फ 80 सीटों पर आकर सिमट गई।
विधायकों के बाद बगावत करेंगे सांसद?
राजनीति में जीत और हार चलती रहती है लेकिन नेता की असली परीक्षा तब होती है जब कमजोर वक्त में भी उसके समर्थक उसके साथ खड़े रहें लेकिन ममता बनर्जी के साथ ऐसा नहीं हुआ और नतीजों के कुछ ही दिन बाद 80 में से 58 विधायकों ने बगावत का बिगुल फूंक दिया। कहा जा रहा है कि आने वाले दिनों में राज्यसभा और लोकसभा के कई सांसद उनका साथ छोड़ सकते हैं। राज्यसभा के सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने इस्तीफा देकर इसकी शुरुआत भी कर दी है।
पिछले एक महीने में ही पश्चिम बंगाल में कई ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं, जहां पर पार्टी के नेताओं, सांसदों कार्यकर्ताओं को आम जनता के भयंकर गुस्से का सामना करना पड़ा है। खुद उनके भतीजे और पार्टी के महासचिव अभिषेक बनर्जी के साथ लोगों ने मारपीट की थी।
ममता बनर्जी के नेतृत्व को मिली चुनौती
टीएमसी में सिर्फ ममता बनर्जी ही ऐसी नेता हैं जो फ्रंट फुट पर आकर पार्टी की अगुवाई कर सकती हैं। वह 15 साल तक मुख्यमंत्री रही हैं, केंद्र की सरकार में मंत्री रही हैं, पार्टी की अध्यक्ष हैं और पश्चिम बंगाल की राजनीति में आज भी असरदार हैं लेकिन वह तभी पश्चिम बंगाल में बीजेपी को चुनौती दे सकती हैं जब उनके समर्थक, विधायक-सांसद उनके साथ मजबूती से खड़े रहें लेकिन पिछले एक महीने में जिस तरह पश्चिम बंगाल की सियासी तस्वीर तेजी से बदली है, उसमें साफ दिखाई देता है कि ममता बनर्जी को पार्टी के भीतर से ही जबरदस्त चुनौती मिली है।
अगर ममता को टीएमसी को बचाए रखना है और भाजपा जैसी बड़ी राजनीतिक ताकत का मुकाबला करना है तो उन्हें न सिर्फ अपने विधायकों, सांसदों, कार्यकर्ताओं की बात सुननी होगी बल्कि उन्हें पार्टी के साथ जोड़कर भी रखना होगा।
