भूख के विरुद्ध हमारी लंबी लड़ाई ने खेतों को लहलहाया, भंडारों को भरा और अन्न की कमी को काफी हद तक दूर किया। मगर, इस उपलब्धि के बीच एक मौन संकट पनपता रहा और वह है पोषण की कमी। पेट तो भर गया, पर शरीर को वह संपूर्ण ऊर्जा नहीं मिल सकी, जो स्वस्थ जीवन का मूल आधार है। कई दशकों तक दुनिया भर में भूख से लड़ने का मुख्य उपाय यही माना गया कि अधिक से अधिक खाद्यान्न पैदा किया जाए। हरित क्रांति और उसके बाद कृषि के आधुनिकीकरण ने भारत जैसे देशों को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता की राह दिखाई। मगर आज चुनौती केवल पेट भरने की नहीं है, बल्कि शरीर को सही पोषण देने की भी है। यह दोहरी समस्या हमें कृषि नीतियों, फसल विकास की दिशा और खाद्य व्यवस्था पर गंभीरता से पुनर्विचार करने की ओर इशारा करती है।
फसलों की नई-नई किस्में इस उद्देश्य से विकसित की गई थीं कि प्रति हेक्टेयर उत्पादन अधिकतम हो सके। इन किस्मों ने खेती की तस्वीर बदल दी और लाखों लोगों को भुखमरी से बचाया। मगर जब पूरी प्राथमिकता उपज बढ़ाने पर केंद्रित हो गई, तब फसलों के पोषण मूल्य पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। कई अध्ययनों से संकेत मिला है कि गेहूं और चावल जैसे खाद्यान्न की आधुनिक किस्मों में लौह तत्त्व, जिंक और कुछ विटामिन की मात्रा पारंपरिक देसी किस्मों की तुलना में कम हो सकती है। भले ही यह अंतर बहुत बड़ा न हो, लेकिन जिस समाज का भोजन मुख्य रूप से अनाज पर आधारित है, वहां इसका प्रभाव व्यापक हो सकता है। जब आहार में विविधता कम हो और अधिकांश भोजन केवल एक-दो फसलों पर निर्भर हो, तब पोषक तत्त्वों में हल्की-सी कमी भी बड़े पैमाने पर कुपोषण का कारण बन जाती है। भारत में पोषण की मौजूदा स्थिति इस सच्चाई को स्पष्ट करती है।
दुनिया के चावल और गेहूं के बड़े उत्पादक देशों में शामिल होने के बावजूद भारत में रक्त की कमी, ठिगनापन और कम वजन की समस्या बनी हुई है। विशेषकर प्रजनन आयु की महिलाएं और छोटे बच्चे इससे अधिक प्रभावित हैं। विभिन्न राष्ट्रीय सर्वेक्षणों और वैश्विक रपटों से यह बात सामने आती रही है कि खाद्य सुरक्षा और पोषण सुरक्षा एक ही बात नहीं है। केवल अनाज की उपलब्धता बढ़ जाने से पोषण की समस्या हल नहीं होती। महिलाओं और बच्चों में रक्त की कमी का बने रहना इस बात का प्रमाण है कि उन्हें जरूरी लौह तत्त्व और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्त्व पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र की एक रपट के अनुसार, भारत में वर्ष 2024 में पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में से 18.7 फीसद कुपोषण से पीड़ित थे। इसी तरह राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2019-21) के मुताबिक, देश में पांच वर्ष से कम उम्र के 35.5 फीसद बच्चे बौने हैं। इससे एक बात तो स्पष्ट है कि केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि कितना खाद्यान्न पैदा हो रहा है; यह भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है कि उस खाद्यान्न में पोषक तत्त्वों की स्थिति क्या है।
इन चुनौतियों को समझते हुए कृषि अनुसंधान संस्थानों ने अब पोषक तत्त्वों से भरपूर किस्में विकसित करने की दिशा में काम शुरू किया है। जैव-संवर्धन इसी प्रयास की एक अहम कड़ी है। इसमें फसलों की ऐसी किस्में विकसित की जाती हैं, जिनमें प्राकृतिक रूप से पोषक तत्त्वों की मात्रा अधिक हो। यह समाधान टिकाऊ है, क्योंकि इसमें फसल की कटाई के बाद अलग से पोषक तत्त्व मिलाने की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि पोषण सीधे खेत से ही भोजन में पहुंचता है।
फिर भी केवल तकनीकी उपाय पर्याप्त नहीं हैं। कृषि नीति में व्यापक दृष्टिकोण अपनाना होगा, जिसमें आहार की विविधता को महत्त्व दिया जाए। पारंपरिक खेती में दालें, मोटे अनाज, तिलहन, फल और सब्जियां सब शामिल होते थे, जिससे संतुलित पोषण मिलता था। मगर समय के साथ एक ही प्रकार की फसलों पर निर्भरता बढ़ी और खेतों की विविधता कम हो गई। जबकि मोटे अनाज जैसे बाजरा, ज्वार और रागी पोषक तत्त्वों से भरपूर होते हैं और सूखे की स्थिति में इनकी पैदावार अच्छी होती है। इन्हें ‘पोषक अनाज’ के रूप में फिर से बढ़ावा देना कुपोषण से लड़ने का सशक्त माध्यम हो सकता है।
मिट्टी का स्वास्थ्य भी इस पूरी प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि मिट्टी में सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी होगी, तो फसलों में भी उनकी मात्रा कम हो सकती है। रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित उपयोग और जैविक पदार्थों की कमी से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है। इसलिए संतुलित उर्वरक प्रयोग, फसल चक्र, जैविक खाद और मिट्टी परीक्षण जैसी पद्धतियों को बढ़ावा देना आवश्यक है। स्वस्थ मिट्टी में उगाई गई फसलें न केवल अधिक उत्पादन देती हैं, बल्कि बेहतर पोषण भी प्रदान करती हैं। इस प्रकार मिट्टी की सेहत, फसल की गुणवत्ता और मानव स्वास्थ्य एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
ऐसे में सार्वजनिक वितरण प्रणाली और खाद्य सहायता कार्यक्रमों में भी बदलाव की आवश्यकता है। अब तक इनका मुख्य उद्देश्य लोगों को पर्याप्त अनाज उपलब्ध कराना रहा है। यदि इन्हीं प्रणालियों के माध्यम से पोषक तत्त्वों से भरपूर अनाज, दालें और अन्य खाद्य पदार्थ वितरित किए जाएं, तो पोषण सुधार में खासी मदद मिल सकती है। विद्यालयों के मध्याह्न भोजन और गर्भवती महिलाओं के लिए पोषण योजनाओं में स्थानीय तथा विविध खाद्य पदार्थों को शामिल करने से उनकी सेहत में सुधार हो सकता है।
खाद्यान्न के प्रति उपभोक्ताओं की जागरूकता भी उतनी ही जरूरी है। शहरीकरण और बदलती जीवनशैली के कारण लोग अधिक प्रसंस्कृत और डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। ये खाद्य पदार्थ ऊर्जा तो देते हैं, परंतु उनमें पोषक तत्त्वों की कमी होती है। संतुलित आहार, साबुत अनाज, दालें, फल और सब्जियों के महत्त्व को समझाने के लिए जन-जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए। यदि परिवारों, विशेषकर माताओं को सही जानकारी मिले, तो बच्चों के पोषण स्तर में उल्लेखनीय सुधार हो सकता है।
देखा जाए तो आर्थिक पहलू भी इस समस्या से जुड़े हुए हैं। किसान वही फसल उगाते हैं, जिसकी बाजार में मांग और उचित मूल्य मिलता है। यदि पोषक तत्त्वों से भरपूर फसलों को पर्याप्त समर्थन मूल्य और बाजार उपलब्ध नहीं होगा, तो जाहिर है कि किसान उनमें ज्यादा रुचि नहीं लेंगे और उनका उत्पादन सीमित ही रहेगा। इसलिए सरकार को व्यापक स्तर पर ऐसी नीतियां और योजनाएं बनानी चाहिए, जो किसानों को विविध एवं पोषक फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित करें।
इन सब के बीच जलवायु परिवर्तन भी एक नई चुनौती बनकर सामने आया है। तापमान में वृद्धि और अनियमित वर्षा फसल उत्पादन एवं उनके पोषण मूल्य को प्रभावित कर सकते हैं। कुछ शोध बताते हैं कि वातावरण में कार्बन डाइआक्साइड की बढ़ती मात्रा से फसलों में प्रोटीन और पोषक तत्त्वों की मात्रा घट सकती है। ऐसे में जलवायु के अनुकूल और पोषण से भरपूर फसलों की नई किस्मों का विकास जरूरी है। इक्कीसवीं सदी में भूख से लड़ाई केवल मात्रा पर नहीं, बल्कि गुणवत्ता पर भी केंद्रित होनी चाहिए। हर नागरिक को पर्याप्त और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना मानव विकास की बुनियादी जरूरत है। यदि हम पोषण-संवेदनशील कृषि में निवेश करते हैं, तो इससे शिक्षा, रोजगार और आर्थिक प्रगति पर दूरगामी एवं सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। इसलिए अब जरूरी है कि हम कृषि विकास के अगले चरण में पोषक तत्त्वों से भरपूर खाद्यान्न को केंद्र में रखकर आगे बढ़ें।
