मनोरमा नदी के किनारे आज खेत लहलहाते हैं। पगडंडियां हैं, पेड़ हैं और एक गहरी खामोशी है। इसी मिट्टी के नीचे 169 साल पुरानी एक ऐसी कहानी दफन है। इसकी आंच आज भी महसूस की जा सकती है। इस आंच का नाम है महुआ डाबर। वह गांव जो आजादी की जंग लड़ने के गुनाह में पूरी तरह जमींदोज कर दिया गया। ब्रिटिश अभिलेखों में इसे बाद में गैरचिरागी घोषित कर दिया गया। मगर, उसकी हुंकार यहां की हवाओं से आज भी सुनाई देती है। बस, सत्ता के बहरे कान इसे कभी सुन नहीं सके।

बस्ती जिला मुख्यालय से महज 16 किलोमीटर दक्षिण और बहादुरपुर ब्लॉक से करीब दो किलोमीटर दूर स्थित यह गांव कभी एक समृद्ध कस्बा था। 1813 में डॉ. फ्रांसिस बुकानन के सर्वेक्षण में यहां करीब 200 घरों का उल्लेख मिलता है। कई घर दो मंजिला थे। मनोरमा नदी के किनारे बसे इस कस्बे में व्यापार, कारीगरी और शिक्षित लोगों की अच्छी मौजूदगी थी। बाद में मुर्शिदाबाद से आए रेशम और कपड़ा बुनने वाले कारीगरों ने इसकी समृद्धि को और बढ़ाया।

फिर आया 1857। और महुआ डाबर इतिहास के सबसे भयावह अध्यायों में दर्ज हो गया। दस जून 1857 को यहां क्रांति की आग भड़की। विद्रोह के दौरान फैजाबाद से भाग रहे कुछ ब्रिटिश अधिकारियों का सामना महुआ डाबर में विद्रोहियों से हुआ। ब्रिटिश अभिलेखों में लेफ्टिनेंट टीई. लिंडसे, डब्ल्यूएच. थॉमस, जीएल. कॉटली, सार्जेंट एडवर्ड्स, एएफ. इंग्लिश और टीजे. रिची समेत कई अधिकारियों की हत्या का उल्लेख मिलता है।

इसके बाद अंग्रेजी प्रशासन ने महुआ डाबर को निशाना बनाया। महुआ डाबर को जलाकर पूरी तरह नष्ट कर दिया गया। तत्कालीन कमिश्नर डब्ल्यू. विनयार्ड और डिप्टी कलेक्टर विलियम पेप्पे के बीच पत्राचार में इसके सुबूत मिलते हैं। 15 जून 1857 के पत्र में पेप्पे को लिखे पत्र में विनयार्ड ने गांव को “पूरी तरह जलाकर नष्ट” करने और यहां तक कि “एक भी ईंट साबुत न बचने” का निर्देश दिया था। चार जुलाई के पत्र में विनयार्ड ने तीन जुलाई को गांव जलाए जाने की कार्रवाई पर संतोष व्यक्त किया। साथ ही, सभी घरों को जमींदोज करने का काम पूरा करने के निर्देश दिए।

इससे साफ है कि महुआ डाबर का विनाश कोई अचानक हुई घटना नहीं था। स्थानीय स्मृतियों और संग्रहालय में संरक्षित सामग्री के अनुसार, इस कार्रवाई में 5000 से अधिक लोगों के मारे जाने का दावा किया जाता है। हालांकि, इस संख्या की स्वतंत्र अभिलेखीय पुष्टि के लिए व्यापक शोध की जरूरत है। गांव के मिट जाने का प्रमाण ब्रिटिश दस्तावेजों में भी मिलता है। बाद के अभिलेखों में महुआ डाबर को ‘गैरचिरागी’ यानी अस्तित्वहीन दर्ज किया गया।

पेप्पे की कब्र बची, महुआ डाबर की स्मृति नहीं

विलियम पेप्पे ने यूनिवर्सिटी ऑफ एबरडीन से सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी। लेकिन 1857 में वह ब्रिटिश प्रशासन के दमन अभियान का हिस्सा बने। 1911 में इलाहाबाद के गवर्नमेंट प्रेस से प्रकाशित सर एडवर्ड आर्थर हेनरी ब्लंट की पुस्तक में पेप्पे की कब्र पर अंकित शिलालेख का उल्लेख मिलता है। उसमें 1857 के दौरान उनकी सेवाओं और महुआ डाबर को जलाने की कार्रवाई का भी जिक्र है। आज स्कॉटलैंड के एबरडीन में पेप्पे की कब्र संरक्षित है। विडंबना यह है कि जिस व्यक्ति की कब्र पर महुआ डाबर जलाने का उल्लेख सुरक्षित है, उसी महुआ डाबर के मृतकों की स्मृति आज भी सरकारी संरक्षण की बाट जोह रही है।

कहानियों से दस्तावेजों तक

महुआ डाबर की कहानी पीढ़ियों की स्मृतियों में बची रही। खेतों से निकलने वाले जले हुए अवशेष, पुराने किस्से और बिखरे दस्तावेज इस इतिहास की गवाही देते रहे। 1997 में महुआ डाबर आना-जाना शुरू हुआ तो इस इतिहास को समझने की कोशिश शुरू हुई। खोजबीन में 1836 की रॉबर्ट मोंटगोमेरी मार्टिन की पुस्तक, डॉ. फ्रांसिस बुकानन का सर्वेक्षण, ब्रिटिश अधिकारियों का पत्राचार और 1857 के प्रत्यक्षदर्शी विवरण सामने आए। सार्जेंट बुशर के बयान में महुआ डाबर में ब्रिटिश अधिकारियों पर हुए हमले और उसके बाद की घटनाओं का विवरण मिलता है। दूसरी ओर ब्रिटिश प्रशासन का पत्राचार गांव को पूरी तरह नष्ट करने की योजना का प्रमाण देता है। यानी महुआ डाबर का इतिहास केवल लोककथा नहीं है। इसके कई महत्वपूर्ण हिस्से औपनिवेशिक दस्तावेजों में भी दर्ज हैं।

राख से उठता संग्रहालय

इसी इतिहास को बचाने की कोशिश में पूरा पिरई गांव में महुआ डाबर से जुड़ी सामग्री जुटाई गई। वर्ष 1999 में महुआ डाबर संग्रहालय की विधिवत स्थापना हुई। आज यहां ऐतिहासिक दस्तावेज, पांडुलिपियां, पत्र, मुकदमों की कार्यवाहियां, पुस्तकें, समाचार पत्र, औजार, हथियार, सिक्के, डाक टिकट, तस्वीरें, पेंटिंग्स और महुआ डाबर से मिले अवशेष संरक्षित हैं। संग्रहालय का रिपॉजिटरी सेक्शन पूरा पिरई में और प्रदर्शनी केंद्र शहीद स्थल महुआ डाबर में है। ढाई दशक के इस प्रयास की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि संग्रहालय आज भी किराए के भवन में संचालित हो रहा है और सरकारी संरक्षण तथा नियमित अनुदान की प्रतीक्षा कर रहा है।

इतिहास का सवाल अब सरकार से

महुआ डाबर से जुड़े लोगों का सवाल है कि जब जलियांवाला बाग राष्ट्रीय स्मृति का प्रतीक बन सकता है तो 1857 के इस महत्वपूर्ण स्थल को उसका उचित स्थान क्यों नहीं मिल सकता? स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अब तक राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, जिलाधिकारी या जिला पर्यटन अधिकारी का यहां औपचारिक दौरा नहीं हुआ। सरकारी अनुदान भी नहीं मिला। पाठ्य पुस्तकों में भी महुआ डाबर का विस्तृत इतिहास नहीं है। तीन जुलाई 2011 को तत्कालीन सांसद जगदम्बिका पाल ने यहां श्रद्धांजलि देकर स्मृति पट्टिका का अनावरण जरूर किया था। आजादी के अमृत महोत्सव में यह स्थान स्वतंत्रता संग्राम सर्किट में शामिल हुआ और यहां शस्त्र सलामी देकर शहीदों को राजकीय सम्मान देने की परंपरा शुरू हुई।

मिट्टी पूछती है—हमें कब याद करोगे?

आज मनोरमा नदी बह रही है। खेतों में फसलें उग रही हैं। जहां कभी दो मंजिला मकान और बाजार थे, वहां अब मिट्टी है। वह मिट्टी सवाल करती है। जिन लोगों ने आजादी की लड़ाई में अपनी जान गंवाई, उनके नाम कहां हैं? जिस गांव को अंग्रेजी हुकूमत ने ‘गैरचिरागी’ कर दिया, वहां आजादी के 78 साल बाद भी स्मृति का दीप क्यों नहीं जला? महुआ डाबर को सिर्फ एक स्मारक नहीं चाहिए। उसे इतिहास में अपना स्थान चाहिए। क्योंकि कोई राष्ट्र केवल अपनी आजादी पाने से महान नहीं होता। वह तब महान होता है, जब वह अपनी आजादी की कीमत चुकाने वालों को भूलता नहीं।

अब मांग है:

महुआ डाबर में राष्ट्रीय स्तर का स्मारक और शहादत कॉरिडोर बने, संग्रहालय को सरकारी संरक्षण मिले, दुर्लभ दस्तावेजों का डिजिटलीकरण हो और महुआ डाबर को स्वतंत्रता संग्राम तथा राष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र से जोड़ा जाए। स्कूल-कॉलेजों के विद्यार्थियों को यहां के इतिहास से परिचित कराने की भी व्यवस्था हो।

-डॉ. शाह आलम राना
(क्रांतिकारी-शहीद वंशज और महुआ डाबर संग्रहालय के निदेशक)

यह लेखक के निजी विचार है।