अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे टकराव ने अमेरिकी नीति के एक ऐसे पहलू को उजागर किया है, जिस पर पहले बहुत कम ध्यान दिया गया। वह है मध्य पूर्व में अमेरिका के सैन्य अड्डों की स्थिति। इस इलाके में मौजूद अमेरिकी अड्डे अब ईरानी हमलों के निशाने पर हैं। खबरों के मुताबिक, इस साल 28 फरवरी को संघर्ष शुरू होने के बाद से करीब उन्नीस अमेरिकी सैन्यकर्मी मारे गए हैं और 624 घायल हुए हैं।

अरबों डालर के सैन्य साजो-सामान का नुकसान हुआ है और इसके केंद्र में यही सैन्य अड्डे हैं। अमेरिका युद्ध तो चाहता है, मगर अपना नुकसान नहीं चाहता। इस नुकसान ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की युद्ध नीति पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है, जो आगामी तीन नवंबर को अमेरिका में मध्यावधि चुनाव तक पीछा करेगा।

दरअसल, डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान से युद्ध छेड़ने से पहले अपने नुकसान का आकलन नहीं किया था। फारस की खाड़ी के आसपास अमेरिका के कई ऐसे सैन्य अड्डे हैं, जो ईरान के बहुत करीब हैं। मध्य पूर्व में अमेरिका का सबसे बड़ा सैन्य अड्डा कतर स्थित अल-उदीद एयर बेस है, जहां मौजूदा युद्ध से पहले लगभग दस हजार अमेरिकी सैनिक तैनात थे।

यह अमेरिकी सेंट्रल कमांड का अग्रिम मुख्यालय भी है और यहीं ‘कंबाइंड एअर आपरेशन’ केंद्र भी स्थित है, जो पूरे मध्य पूर्व में अमेरिकी वायु सेना की सभी गतिविधियों को नियंत्रित करता है। पांचवें बेड़े और अमेरिकी नौसेना की सेंट्रल कमांड का मुख्यालय बहरीन में है। कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात में अमेरिका के महत्त्वपूर्ण सैन्य अड्डे हैं। ओमान और सऊदी अरब में भी अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी है। ये सभी ईरान की प्रहार पहुंच में आते हैं।

सैन्य अड्डों की यह व्यवस्था तब तर्कसंगत थी, जब अमेरिका अफगानिस्तान और इराक में ऐसे आतंकवादी संगठनों से लड़ रहा था, जिनके पास उन अड्डों पर हमला करने की क्षमता नहीं थी। वर्ष 2001 में जब अमेरिका ने अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ अभियान शुरू किया था, तब खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य अड्डे बेहद उपयोगी और लगभग अभेद्य थे। वर्ष 2003 में शुरू हुए इराक संघर्ष के दौरान भी स्थिति ऐसी ही थी, कोई भी विरोधी पक्ष अमेरिकी सैन्य अड्डों पर मिसाइलों से हमला करने में सक्षम नहीं था और उस समय ड्रोन का इस्तेमाल शुरू ही हुआ था। तब के ड्रोन से आज की तुलना करें, तो इनकी मारक क्षमता में कई गुना इजाफा हुआ है।

ईरान के साथ टकराव में अमेरिकी सैन्य अड्डों की मौजूदा व्यवस्था अब अभेद्य नहीं है। ईरान के जखीरे में मौजूद मिसाइलों और ड्रोन की मारक क्षमता को देखते हुए इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अमेरिकी सैन्य अड्डे अब खतरे में हैं। उदाहरण के लिए, कुवैत स्थित कैंप आरिफजान, जो सेंट्रल कमांड की जमीनी सेनाओं के लिए अग्रिम मुख्यालय है, वह ईरान से केवल 62 मील की दूरी पर है। बहरीन में अमेरिकी नौसेना का बेस ईरान से लगभग 128 मील दूर है, जबकि अल-उदीद सैन्य ठिकाना करीब 170 मील दूर है। ये सभी ईरानी मिसाइलों की रेंज में आते हैं। इसकी तुलना में ईरान से इजराइल की दूरी लगभग 1,100 मील है।

खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के सैन्य अड्डे तब विकसित किए गए, जब सोवियत संघ के मुकाबिल अमेरिकी सहयोगियों की सुरक्षा की जरूरत थी। हो सकता है कि अफगानिस्तान और इराक युद्धों के दौरान यह नाकेबंदी सफल तरीके से काम कर रही थी, लेकिन आज के परिप्रेक्ष्य में इन ठिकानों पर अमेरिकी सैनिक पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। यही वजह है कि अमेरिकी सैन्य टुकड़ियों को अब ईरान से दूर भेजा जा रहा है। पिछले दिनों ऐसी खबरें आई थीं कि कुछ अमेरिकी सैनिक कतर में मौजूद अल-उदीद एअर बेस को खाली कर रहे हैं और अमेरिकी विमानों को भी दूसरी जगह भेजा गया है। बाद में पता चला कि दर्जनों अमेरिकी विमानों को इजराइल के बेन गुरियन हवाईअड्डे और रेमन एअर बेस पर भेजा गया है। इससे साफ है कि अमेरिका खाड़ी क्षेत्र में अपने सैन्य अड्डों को लेकर चिंतित है।

सेवानिवृत्त जनरल फ्रैंक मैकेंजी, जो केंद्रीय कमान ( सेंटकाम) के पूर्व कमांडर थे, उनका मानना है कि अमेरिकी सैनिकों को ईरान और खाड़ी क्षेत्र से और दूर जाने की जरूरत है। उन्होंने पिछले दिनों कहा था कि अमेरिका की केंद्रीय कमान का अग्रिम मुख्यालय ईरान से सौ मील दूर कतर में नहीं होना चाहिए। उनके मुताबिक, अमेरिका के सैन्य अड्डे बनाने की रणनीति जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाती। हमें पश्चिम की ओर देखना होगा। हमें इजराइल में सैन्य अड्डे बनाने पर विचार करना होगा, क्योंकि एक तो वह ईरान से दूर है और दूसरा वहां विमानों के उड़ान भरने पर पाबंदियों की संभावना भी बहुत कम हैं।

अमेरिका, इराक के पश्चिमी अनबार प्रांत में ऐन अल असद एयर बेस पर अपनी मौजूदगी बनाए हुए है, जहां से वह इराकी सुरक्षा बलों की मदद करता है और नाटो मिशन में योगदान देता है। वर्ष 2020 में ईरान ने इस सैन्य अड्डे पर मिसाइल हमले किए थे, जो ईरानी जनरल कासिम सुलेमानी की अमेरिका द्वारा हत्या के जवाब में किए गए थे।

अमेरिकी सैन्य अड्डों को ईरान की पहुंच से दूर अन्य जगहों पर भी पुनर्स्थापित किया जा सकता है, जैसे पश्चिमी सऊदी अरब और मिस्र में, मगर इन जगहों पर इजराइल जैसी वायु रक्षा प्रणाली नहीं हैं और न ही वहां विमानों की उड़ान में उतनी ढील मिल पाएगी, जितनी इजराइल में मिल सकती है। कुछ रणनीतिकारों का मानना है कि अमेरिका के कई खाड़ी देशों में सैन्य अड्डे हैं, इसलिए उसे अपने सभी हवाई संसाधनों को एक ही जगह रखने के बजाय नए अड्डे बनाने पर विचार करना चाहिए। मगर इसमें भी कई तरह की चुनौतियां हैं।

इजराइल को अपने यहां नए अमेरिकी सैन्य अड्डों पर भले ही कोई एतराज न हो, लेकिन मिस्र, सऊदी अरब या इस इलाके के दूसरे देश इसे एक बोझ के तौर पर देख सकते हैं और वे उसके बदले सौदेबाजी कर सकते हैं। इसके अलावा, नए सैन्य ठिकाने बनाना बहुत महंगा है, खासकर ऐसे समय में जब अमेरिकी रक्षा बजट पर पहले से ही भारी दबाव है।

कतर में वर्ष 1996 में अल-उदीद बेस बनाने में लगभग दो अरब डालर खर्च किए गए थे और तब से इसके रखरखाव पर छह अरब डालर से ज्यादा की राशि खर्च हो चुकी है। खाड़ी देशों में सैन्य ठिकाने स्थापित करने के पीछे अमेरिका की मुख्य रणनीति वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर नियंत्रण, क्षेत्रीय प्रभाव बनाए रखना और ईरान जैसे विरोधियों को रोकना है। मगर अब खाड़ी देशों में यह बहस तेज हो गई है कि अमेरिका के ये ठिकाने वास्तव में सुरक्षा देते हैं या उन्हें अनचाहे युद्ध में घसीटते हैं, क्योंकि अमेरिकी हमलों के जवाब में ईरान खाड़ी देशों को ही निशाना बना रहा है। बहरहाल, मौजूदा परिस्थितियों ने अमेरिका को अपने सैन्य ठिकानों की सुरक्षा को लेकर चिंता में डाल दिया है।