करीब दस सालों बाद लंदन आई हूं। यह लेख वहीं से आ रहा है आपके पास। यहां एयर इंडिया की उड़ान से आई थी और हैरान हुई देखकर कि कितने भारतीय विदेश में घूमने लग गए हैं। मेरी उड़ान में तकरीबन सारे यात्री अपने ही देशवासी थे और सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह थी कि इनमें एक बड़ा समूह गुजराती महिलाओं का था, जो पारंपरिक घाघरा-दुपट्टा पहने हुए थीं और जिन्हें अंग्रेजी का एक शब्द नहीं मालूम था।
बहुत अच्छा लगा इन्हें देखकर, इसलिए कि जब ऐसे लोग विदेश का सफर करने लगेंगे, तो उनकी अपने राजनेताओं से अपेक्षाएं भी अधिक होने लगेंगी। वे चीजें मांगने लगेंगे, जो अभी तक देश के मतदाताओं को किसी भी सरकार से नहीं मिली हैं।
माना कि नरेंद्र मोदी के राज में विकास के तौर पर बहुत कुछ हुआ है, लेकिन आम लोगों के जीवन में इसका असर कम रहा है, इसलिए कि शिक्षा और स्वास्थ्य की संस्थाओं में कोई परिवर्तन नहीं आया है। बल्कि स्कूल, अस्पताल और रोजगार के अवसर और भी बदतर हो गए हैं।
संयोग नहीं है कि काकरोच जनता पार्टी का जो प्रदर्शन पिछले दो हफ्तों से जंतर-मंतर पर चल रहा है, उसकी मांगें शिक्षा से जुड़ी हुई हैं। इस प्रदर्शन के बारे में आपको खबर कम ही मिली होगी, क्योंकि मीडिया ने जैसे इसे पूरी तरह अनदेखा कर दिया है। इससे ही जान जाइए कि सरकार को इस प्रदर्शन से तकलीफ हो रही है। हमारे तमाम बड़े राजनेता इस प्रदर्शन पर कुछ नहीं बोले हैं, क्योंकि बोलें तो बोलें क्या और करें तो करें क्या। अब अगर शिक्षा मंत्री की नौकरी जाती है, तो ऐसा लगेगा कि नौजवानों के दबाव में ऐसा हुआ है। मगर यह अच्छा नहीं है कि देश के युवाओं की बात सुनी नहीं जा रही है।
लंदन उन विदेशी महानगरों में है, जहां हर जगह आपको भारतीय नौजवान काम करते हुए दिखेंगे। यहां तक कि हवाईअड्डे पर पासपोर्ट जांच करने वाले भी अब भारतीय हैं। कभी वह जमाना था, जब अपने देसी भाई-बहन हवाईअड्डे पर सिर्फ सफाई कर्मचारी थे, लेकिन उनके बच्चे अब ऐसी नौकरियां कर रहे हैं, जिनके लिए शिक्षित होना और कंप्यूटर की जानकारी होना जरूरी है।
मैंने जब एक-दो लोगों से पूछा कि वे देश वापस क्यों नहीं जाना चाहते, तो उनका जवाब यही था कि जरूर जाते, अगर उनकी कमाई इतनी होती कि इज्जत से जी सकें। हम जानते हैं कि अभी तक ऐसा नहीं हुआ है अपने देश में।
आर्थिक शरणार्थी हैं ये लोग। अफसोस की बात यह है कि हमारे सबसे शिक्षित लोग भी आर्थिक शरणार्थी बनने पर मजबूर हैं। एआई के क्षेत्र में इतने भारतीय मूल के लोग अमेरिका में मिलते हैं कि भारतीयों के खिलाफ एक मुहिम-सी चलने लगी है कैलिफोर्निया में। कोई राज की बात नहीं है कि अमेरिका की कई सबसे बड़ी कंपनियों को भारतीय मूल के लोग चलाते हैं।
रही बात लंदन की, तो यहां कई सबसे धनवान भारतीय बस गए हैं। वे भारत में निवेश करते हैं, लेकिन वहां रहना पसंद नहीं करते, क्योंकि जो सुविधाएं उन्हें लंदन में मिलती हैं, वे मुंबई और दिल्ली में नहीं मिलतीं।
स्वच्छ सड़कें, सुंदर रिहाइशी इलाके और बड़े-बड़े पार्क, जिनमें जहरीली हवा की चिंता के बिना टहला जा सके, और साफ पीने का पानी। ऊपर से मनोरंजन के कई साधन। फिलहाल लंदन में विंबलडन चल रहा है, जिसे देखने हर साल कई देशों से लोग आते हैं।
हमारे देश में आईपीएल के अलावा कोई बड़ा अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट नहीं होता। जिस व्यक्ति ने इसे शुरू किया था, वह भी तब से लंदन में रहता है, जब से उसे अपने देश के आला राजनेताओं ने देश से बाहर कर दिया। ललित मोदी ने हाल में कई पत्रकारों से बातचीत में माना है कि उनकी जान को दाऊद इब्राहिम से खतरा था। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ राजनेता और क्रिकेट प्रशासन के कई आला अधिकारी उनसे नाराज थे।
मैं कोई नई बात नहीं कह रही हूं। हम सब जानते हैं कि हमने ऐसा देश बनाया है, जिसमें आम नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाने में पर्याप्त निवेश नहीं किया। हम यह भी जानते हैं कि सबसे बड़ा दोष हमारे शासकों का है, जिन्होंने अपने परिवारों का जीवन बेहतर बनाने के लिए खूब मेहनत की, लेकिन इस कोशिश में वे उन लोगों को भूल गए, जिनके वे स्वयं को सेवक कहते नहीं थकते।
हमारे स्कूलों और अस्पतालों का सुधार क्यों करें, जब वे जानते हैं कि उनके बच्चे तो निजी सुविधाओं का ही इस्तेमाल करने वाले हैं? बरसात और गर्मी के मौसम में शहरों और महानगरों की बदहाल सुविधाओं को क्यों दुरुस्त करें, जब वे जानते हैं कि वे खुद लंदन और न्यूयॉर्क में गर्मी की छुट्टियां मनाने जाने वाले हैं?
दोष सबसे अधिक हमारे राजनेताओं और शासकों का है, लेकिन यह भी मानना पड़ेगा कि कुछ दोष हमारा भी है कि हम इन सारी चीजों को देखते हुए भी विरोध की आवाज नहीं उठाते। हम मीडिया वालों को भी शर्मिंदगी से सिर झुकाना पड़ेगा, क्योंकि जब नौजवानों का प्रदर्शन पिछले दो हफ्तों से दिल्ली में चल रहा है, तब हम जानबूझकर उसके बारे में न लिख रहे हैं, न टीवी पर चर्चा कर रहे हैं।
काकरोच जनता पार्टी की खबरें लेनी हों, तो सोशल मीडिया पर जाना पड़ता है, जहां वे दुखी माता-पिता दिखाई देते हैं, जिनके बच्चों ने नीट के प्रश्नपत्र बार-बार लीक होने से तंग आकर आत्महत्या कर ली है। इस सप्ताह अगर आपको मेरे लेख में ज्यादा कड़वाहट दिखती है, तो इसलिए कि जब किसी विदेशी महानगर में आती हूं, तो मुझे अपने देश की बदहाली बहुत तकलीफ देती है।
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मुंबई में पिछले सप्ताह इस साल की पहली बारिश हुई थी और छप्पर फाड़ कर आसमान से पानी बरसा। जैसा अक्सर होता है, जब तेज बारिश होती है, गाड़ियों की पार्किंग उतनी ही मुश्किल होती है, जितना टैक्सी या ऑटो का मिलना। हुआ यूं कि मैं पैदल चलकर ट्राइडेंट होटल में गई थी किसी से मिलने, लेकिन घर लौटना मुश्किल था, क्योंकि बारिश बहुत तेज हो रही थी। मैंने अपने एक दोस्त से बात करके उसकी गाड़ी मंगवाई। जब उसका ड्राइवर मुझे लेने आया, तो काफी देर तक उसको ऊपर आने नहीं दिया गया, क्योंकि गाड़ियों की लंबी कतार लग चुकी थी। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
