‘शहर में एक कयामत थी कयामत न रही
हश्र खामोश हुआ फित्ना ए दौरां चुप है’
पिछले दिनों अरुंधति राय ने एक साक्षात्कार में कहा-मैंने कभी सोचा नहीं था कि व्यवस्था के विरोध में लिखने के पैसे मिलेंगे, पुरस्कार मिलेंगे। अरुंधति राय भारत ही नहीं दुनिया की व्यवस्था के खिलाफ लिखती हैं। लेकिन उनकी अनूदित रचना का उत्सव मनाने वाली हिंदी पट्टी ने उनकी इस हौसलाअफजाई पर कान नहीं धरा। कभी असहिष्णुता पर पुरस्कार वापसी करने वाले लोग ग्यारह साल बाद ऐसे मंच पर पुरस्कार लेने जाते हैं जहां लोकतांत्रिक आवाजों को कुचलने वाली शक्ति से जुड़े राजनेता मौजूद हों। कभी भीड़ की हिंसा की मुखालफत करने वाली हिंदी पट्टी के लोग पुरस्कारों के मामले में भीड़ की आवाज बन जाना चाहते हैं। ऐसे पुरस्कार की जयकार के खिलाफ बोलने वाले साहित्य के ‘फूफा’ करार दिए जा रहे हैं। पुरस्कार के हथियार को जब फिर हार की तरह पहना गया है तो अखलाक की आह याद दिलाता बेबाक बोल।
‘सब दलीलें तो मुझ को याद रहीं
बहस क्या थी उसी को भूल गया’
अगर साहित्य का इतिहास वर्तमान के साथ सतत संवाद करता तो इस स्तंभ का शीर्षक होता, ‘आह अखलाक!’ अखालक याद है आप लोगों को…वो दादरी, वो बाबरी…पुरस्कार वापसी…। वो बहस इस स्तंभ का भी मील का पत्थर बनी थी। वह सितंबर 2015 था…संयोग, ग्यारह साल बाद भी सितंबरी सितम ही हुआ। तारीख का संयोग तारीखी हो जाता है। 28 सितंबर 2015 की रात उत्तर प्रदेश के दादरी के एक गांव में 52 साल के मोहम्मद अखलाक की भीड़ ने हत्या कर दी। इस ‘भीड़’ शब्द को याद रखिएगा। उससे पहले एमएम कलबुर्गी की हत्या हो चुकी थी। मुखालफत में उदय प्रकाश, नयनतारा सहगल और मूर्धन्य कवि सहित कई संस्कृतिकर्मी इस मुहिम में शामिल हुए। पुरस्कार सार्वजनिक नैतिक प्रतिरोध का माध्यम बन गया। पुरस्कार वापसी की मुहिम ने पुरस्कारों व सत्ता की साख को थू-थू कर दिया था।
क्या आपको पता है कि दिल से ‘आह अखलाक!’ पहली बार कब निकला? जब भाजपा की अगुआई वाली सरकार ने बैंकों में 15 लाख आएंगे को जुमला कहा था तब? नहीं, नहीं नहीं…। पहले आगे बढ़ते हैं। साहित्य के मूर्धन्य मनुष्य ने कथित पुष्पगंधा जैसे किसी मंच से कहा कि लेखकों का स्वभाव ही सवाल पूछना है। कवि ने कहा था, ‘इसका उद्देश्य किसी सुबह अचानक कोई नाटकीय कदम उठा लेना नहीं था, बल्कि परिस्थितियों के विरुद्ध प्रतिरोध दर्ज करना था।’ सवाल है, जिस पुरस्कार को हथियार बनाया था, फिर उसी का हार पहन लिया तो ‘हम भारत के लोग’ क्या आह अखलाक! आह कलबुर्गी! कह सकते हैं?
हम तो इंसान हैं, भावनाओं में बह सकते हैं। इस मसले पर चैट जीपीटी से पूछा। कृत्रिम बुद्धि ने कहा, ‘2026 का निर्णय 2015 में स्थापित उनकी अपनी नैतिक सार्वजनिक छवि के साथ एक कठिन सवाल पैदा करता है।’ यह पुरस्कार जब कृत्रिम बुद्धि के लिए इतना कठिन है तो फिर सोचिए मानवीय बुद्धि को यह कहना, ‘अरे फूफा! नाराज क्यों हो रहे, स्वागत नहीं करोगे हमारा’ कितनी बड़ी नाइंसाफी है।
फूफा जैसे कथित कमजर्फ रिश्ते की तो बहुत बात हो गई। अब जरा ‘चचा’ पर आएं। ‘चचा’ शब्द इसलिए कहा कि गालिब के साथ भी जुड़ता है, आजाद हिंद के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के साथ भी जुड़ता है। ‘अंकल सैम’ पता है न! वही अमेरिका वाले ट्रंप। फूफा का मजाक उड़ाने वालों के सामने चचा ट्रंंप को खड़ा कर देने का मन करता है। पुरस्कार पर सवाल उठाने वालों को हिंदी के विद्वानों ने कह डाला कि क्या 21 लाख का विरोध करने वाले नोबेल पुरस्कार का भी विरोध करेंगे।
भाई साहब…इतिहास ने तुलनात्मक अध्ययन के कुछ नियम बताए हैं। अगर आप उस नियम को दरकिनार करना चाहते हैं तो बस एक उदाहरण। ज्यां पाल सार्त्र का नाम सुना होगा? सम्मान की चहुंओर मुनादी के बाद भी लेखक उस सम्मान को किन शब्दों में नकार सकता है? सार्त्र ने तो इसे लेखक की आजादी पर पड़ने वाला संस्थागत दबाव मान कर ठुकरा दिया।
हाजरीन-नाजरीन…फिर 2026 की सितंबर आ गई। मकबूल कवि की 95वीं जयंती पर उनके नाम पर स्थापित पुरस्कार समारोह में 21 लाख की नकद प्राप्ति के साथ कुछ ऐसा-वैसा कहा गया कि पुरस्कार के नाम वाले कवि की कविता अपने समय के साथ हमारे समय को भी दर्ज करती है। कविता को सत्य, स्मृति और भय के समय में निर्भीकता की जगह बनाने वाली शक्ति बताया गया।
इस पुरस्कार के स्रोत के पहले एक और घटना पर बात कर लेते हैं। एपस्टीन फाइल…नाम तो सुना होगा। कुछ मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया था कि अपने पैसे को ‘गंदा’ कहने पर जेफरी एपस्टीन ने भी क्रांतिकारी दलील दी थी। उसने अपने पैसे को ‘गंदा’ बताए जाने पर उन कथित गरीब देशों का रुख करने की सलाह दी थी, जहां उसके आरोपित धन से पोलियो उन्मूलन कार्यक्रम चलाए गए थे। अब एक हृदयविदारक सवाल, अगर हिंदी पट्टी में हृदय नामक अंग बचा हो तो…।
कोई इंसान बच्चों को पोलियो-मुक्त करने के लिए पैसे दे तो क्या उसे बच्चों का यौन शोषण करने की इजाजत मिल जानी चाहिए? अभी हिंदी पट्टी दुनियावी चिंताओं से जिस तरह से शोक-मुक्त महसूस कर रही है उसके हिसाब से तो होना चाहिए। अगर एपस्टीन ने कभी भारत आकर किसी हिंदी साहित्यिक मंच पर कुछ लोकलुभावन भाषण दे दिया होता तो दावा है कि इस ग्रह पर हिंदी पट्टी एकमात्र ऐसा क्षेत्र होती जहां एपस्टीन सम्मान समारोह को गर्व से स्वीकार किया जाता। इसकी मुखालफत करने वालों को ‘फूफा’ कहा जाता।
यह स्तंभ लिखते वक्त सत्ता प्रायोजित फूफा याद नहीं आ रहे हैं। याद आ रहे हैं ‘चचा सैम’। अब इतना पता है न कि ‘सैम’ मतलब अमेरिका? तो अभी वाले चचा सैम के पहले वाले चचा यानी बराक ओबामा के सामने नोबेल पुरस्कार ने कैसे ‘शांति’ से समर्पण किया था? हिंदी साहित्य की कथित प्रतिरोधी धारा चाहे कितने भी नारे लगा ले, ‘अमेरिकी साम्राज्यवाद हो बर्बाद’ लेकिन पुरस्कार पर उनके आदर्श अमेरिका वाले चचा ही हैं। अब चचा को ऐसे नोबेल नहीं मिला तो क्या हुआ? वेनेजुएला की नेता ने चचा सैम को समर्पित कर दिया।
पिछली बार ट्रंप के चुनाव हारने पर कहा गया था कि ट्रंप हार गए लेकिन ‘ट्रंपवाद’ जीतता रहेगा। बात सही थी। अब यह ‘ट्रंपवाद’ हिंदी साहित्य में भी दिख रहा है। फूफा तो बहाना है, इस देश में हिंदी पट्टी पर चचा की शक्ति को राज कराना है। अमेरिका पूरी दुनिया का मूल्य निर्देशक बना बैठा है। हिंदी साहित्य की दुनिया ने अघोषित रूप से कह ही दिया है, ‘चचा ट्रंप तुम आवाज दो हम तुम्हारे साथ हैं। येन-केन-प्रकारेण पुरस्कार को उचित ठहराएंगे और उसे अपने नाम कराएंगे।’
स्तंभ की शुरुआत में अपील थी, भीड़ शब्द को याद रखने की। भीड़ कहीं भी जुटाई जा सकती है। पुरस्कार वापसी के लिए भी और ‘मैं ही पुरस्कार हूं’ वाली भावना को न्यायोचित ठहराने के लिए भी। हिंदी पट्टी में किसी भी तरह के निजी संबंध सिद्धांत से अहम होते हैं। फूफा को धकियाने वाले चचा के आगे वैसे ही शांति से समर्पण करते हैं जैसे नोबेल समिति ने बराक ओबामा के सामने किया था। आज पुरस्कृत पुरुष का समर्थक-समूह शोक में पड़े लोगों को ‘अ’ का आह्वान करते हुए 21वीं सदी में 21 लाख की अहमियत समझाने की पुरजोर कोशिश करेगा। कहेगा कि फलां कवि के पुरस्कृत होते ही कविता जिंदा लोगों में जोश लाएगी।
एक बात याद रखिए। हार की तरह धारण किया जानेवाला पुरस्कार कब सरकार पर प्रहार का हथियार बन जाए, इसकी बानगी आप पुरस्कार वापसी में देख चुके हैं। अब भी क्या गारंटी कि भविष्य में यही हार एक बार फिर हथियार वालों पर प्रहार का हथियार न बन जाए? हिंदी पट्टी वालों से अनुरोध है कि वे कितना भी अल्फ्रेड नोबेल याद दिलाएं आप अखलाक को याद रखिएगा। हथियार का हार पहनने वालों को याद रखिएगा। हथियार के पुरस्कार को याद रखिए और कहिए- आह अखलाक!…कलबुर्गी!
