जिंदगी ऐसी कोई फिल्म या कहानी नहीं होती, जिसमें हर बार अंत में सब कुछ सही ही हो जाए। न ही इसका संचालन अपने मन मुताबिक किया जा सकता है। जीवन में परिस्थिति और कर्म—दोनों समय-समय पर अपनी भूमिका निभाते हैं और जीवन की नौका चलती रहती है।
हर व्यक्ति की जिंदगी में दुख-सुख का कुछ न कुछ नुक्ता हमेशा लगा ही रहता है। जब हम पैदा होते हैं, तो हमारे सामने अलग तरह की समस्याएं होती हैं। हम अपने बूते चल नहीं सकते, अपनी देखभाल नहीं कर सकते। कुछ कहना हो, तो बोल नहीं सकते। कोई क्या बोल रहा है, यह पूरी तरह समझ नहीं सकते। जिंदगी संकेतों और धीरे-धीरे अनुभव के आधार पर आगे बढ़ती है।
फिर जब थोड़े बड़े होते हैं, तो स्कूल-कॉलेज और घर की छोटी-छोटी समस्याएं हमारे पास आने लगती हैं। अब समस्याओं का रूप बदल जाता है। बचपन की समस्याएं पीछे छूट जाती हैं और युवावस्था की समस्याओं का रंग, ढंग, स्वाद और स्वभाव अलग होता है। वे समस्याएं भी एक दिन पीछे छूट जाएंगी और फिर आएगी वृद्धावस्था। तब फिर एक अलग तरह की समस्याओं का आगमन शुरू हो जाएगा। हमारे हाथ-पैर काम करना कम और बाद में बंद भी कर देंगे। ऐसे ही एक दिन हम इस दुनिया से विदा हो जाएंगे और समस्याएं यहीं रह जाएंगी।
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अगर हम सिर्फ समस्याओं के बारे में सोचते हैं, तो बचपन, युवावस्था और वृद्धावस्था—तीनों के सुख हमसे किनारा कर लेंगे। इस बीच हम जीवन भर इन समस्याओं के समाप्त होने का इंतजार करते रहेंगे कि सब कुछ एकदम पूरी तरह सही हो जाए। जबकि सब कुछ एकदम सही कभी नहीं होता। दुख और सुख दोनों साथ चलते हैं। खुशी और आंसू दोनों आंखों को नम करते रहते हैं।
हम एक समस्या का समाधान करते हैं, तो दूसरी समस्या अपने आपको तवज्जो दिए जाने की आकांक्षी हो जाती है। जीवन समस्या और समाधान का एक जाल है, जो हमारे इर्द-गिर्द लिपटा हुआ है और हम चाहकर भी इसे एक झटके में नहीं काट सकते। यह जाल हमारे धैर्य, संयम, समझदारी और सहनशीलता के सहारे ही काटा जा सकता है।
कुछ बातों को सामने देखकर भी नजरअंदाज करना ही उचित रहता है। अगर हम ज्यादा उत्सुकता, उत्तेजना और अधीरता दिखाएंगे, तो इसमें और ज्यादा उलझने की संभावना रहती है। इसीलिए धैर्य खोने से बेहतर है कि कुछ को स्वीकार कर लिया जाए, कुछ को सुलझाने का प्रयास किया जाए और इन स्थितियों को स्वीकार करते हुए आगे बढ़ते रहा जाए।
हर बार सफल होने से नहीं मिलता है अनुभव, असली समझ तो विफलता ही देती है | दुनिया मेरे आगे
जीवन की समस्या के रूप में बन गई इन गांठों को सुलझाने का प्रयास करते रहना चाहिए, लेकिन जबरदस्ती अपनी सारी ऊर्जा उसी में झोंक देना समझदारी नहीं है। कुछ गांठें तो समय के साथ अपने आप भी सुलझती जाती हैं। भले ही उन्हें सुलझने में कुछ समय लग जाए। जो चीज शुरू होती है, उसका एक दिन अंत निश्चित है।
पछतावे से नहीं विश्वास से आगे बढ़ें, हर छूटा अवसर हार नहीं होता | दुनिया मेरे आगे
हम सभी का जीवन नदी में तैरती एक छोटी नाव के समान है। नाव सही-सलामत नदी में तैरकर अपनी यात्रा पूरी करे, इसके लिए हमें निरंतर पतवार चलाते रहना चाहिए। बेमन से पतवार चलाएंगे, तो जल्दी थक जाएंगे और हंसते-गाते हुए चलाएंगे, तो यात्रा का पता भी नहीं चलेगा।
नाव का लहरों से सामना होना ही है। लहरों के आने पर अगर कोई एकदम से सहम जाए या घबरा जाए, तो नाव डूब जाएगी या गलत दिशा में बढ़ जाएगी। इससे ज्यादा अच्छा है कि उन लहरों के साथ तारतम्य बिठाया जाए, हंसते हुए उनका सामना किया जाए और इस सफर का भरपूर आनंद उठाया जाए।
अगर यह सोचा जाए कि लहरों से एक दिन पीछा छूट जाएगा, तो यह संभव नहीं है। एक-एक कर लहरें आती रहेंगी, जब तक हम जीवनरूपी नदी को पार नहीं कर लेते। अगर हम इस उम्मीद में बैठे रहेंगे कि लहरों का आना-जाना बंद होने पर हम खुश होंगे, खुशी मनाएंगे और जीवन को जीना शुरू करेंगे, तो इस यात्रा के बहुत से सुंदर दृश्य, आसपास का मोहक वातावरण और खुशियां हमसे छूट जाएंगी। जो जीवन सुंदर स्वप्न बन सकता है, उसे हम दुःस्वप्न में बदल देंगे। इसके बाद हम एक नीरस जीवन के यात्री बनकर रह जाएंगे। अंत में हाथ में सिर्फ पछतावा ही रह जाएगा कि हमने समय रहते जीवन को जिया नहीं।
जीवन का सबसे बड़ा पड़ाव: जब खुद को साबित करने की जरूरत खत्म हो जाती है | दुनिया मेरे आगे
यह ध्यान रखने की जरूरत है कि सब कुछ कभी ठीक नहीं होने वाला। सब कुछ ठीक हो जाएगा, यह सिर्फ कल्पना है, जिसका सच्चाई से कोई वास्ता नहीं है। इसलिए जीवन जैसा भी है, उससे कुछ पल चुराकर उन्हें भरपूर जी लेना चाहिए, क्योंकि हर यात्री को यहां एक सीमित समय मिला हुआ है। उसके बाद उसकी यात्रा खत्म होनी ही है, चाहे वह यात्रा खुशदिली से पूरी करे या निराशा में डूबकर। यह यात्री के ऊपर ही निर्भर करता है।
संसाधन और भौतिक सुविधाएं इस यात्रा में कुछ सुविधा अवश्य मुहैया कराती हैं, लेकिन सुविधाओं के चक्कर में पूरी यात्रा का सत्यानाश कर लेना बेवकूफी के अलावा कुछ नहीं है। हो सकता है, हम इस यात्रा में जिन चीजों की तलाश कर रहे हैं, वे सबसे अंत में मिलें, लेकिन अंत में मिलने का फायदा ही क्या होगा, जब उनका उपभोग करने के लिए हम तैयार ही नहीं होंगे। इसीलिए अच्छे दिनों की आमद के इंतजार में अपने जीवन को नाहक व्यर्थ नहीं करना चाहिए।
