नई शुरुआत हम सभी को लुभाती है, फिर वह नई किताब हो, नया काम हो, डायरी का नया पन्ना हो या हमारे जीवन का हर नया दिन। भले ही लंबे समय से हमारे लिए एक जैसा दृश्य स्थिर रूप से बना हुआ हो, पर नएपन की आहट भर से उम्मीद की एक झलक हम सबके मन को जगमग कर जाती है।

हम जीवन के किसी भी पायदान पर हों, नई शुरुआत हम सभी की आंखों में संभावना बनकर एक जैसा मुस्कुराती है। अपने जीवन में नवीनता लाना, जोश और खुशियों से उसे भर देना, यह हम सबकी अपने प्रति बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। नया होना स्वाभाविक प्रक्रिया है, जो सामान्य रूप से हमारे जीवन में लगातार घटित होती रहती है, यह बताती है कि हम जीवित हैं। हम कल से आज बेहतर हैं, संशोधित हैं, कुशल हैं, संतुलित हैं।

किसी भी नई शुरुआत के होने से पहले अल्प विराम का होना भी आवश्यक है, यह ठहराव हमें खुद के बारे में सोचने का समय देता है। अपने मन और जीवन को हम टटोल पाते हैं।

यह ठहराव नए की नींव रखता है, जिसमें अपनी वर्तमान स्थिति का आकलन किया जाता है, उसके अच्छे पक्षों को ले लिया जाता है और कमजोर पक्षों को हटाकर उसे संशोधित किया जाता है। कुछ और उजले पक्ष उसमें जोड़ दिए जाते हैं। इस तरह नई शुरुआत जीवन को और सुंदर, अर्थपूर्ण बना देती है।

कई बार हम अपनी दैनिक जिम्मेदारियों में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि हमारे पास इस तरह के ठहराव को अपने जीवन में सम्मिलित करने का ध्यान ही नहीं रहता।

दिन, महीने और साल बदलते रहते हैं, हमारे आसपास का वातावरण और जीवन भी समय के साथ बदलता जाता है। यहां तक कि जिम्मेदारियों का भी स्वरूप बदल जाता है, पर हम एक चक्र में लगातार लंबे समय तक घूमते रहते हैं और फिर अचानक से सब कुछ थम जाता है।

फिर जीवन के प्रति नीरसता और खालीपन हम महसूस करने लगते हैं, हमारा मन और शरीर निष्क्रिय-सा हो जाता है, सब कुछ सामान्य नजर आते हुए भी अचानक से आई इस गहरी उदासी का कारण हम और हमारे परिजन समझ नहीं पाते। हम एक लंबी मानसिक और शारीरिक थकान से गुजर रहे होते हैं।

अपनी खुशियों और सपनों को अपनी प्राथमिकता की सूची में लगातार पीछे धकेलते रहने से हमने अपनी व्यक्तिगत नवीनता की प्रक्रिया को बाधित कर दिया होता है, जिसके चलते हमारा मनोबल टूट जाता है और जीवन रुक सा जाता है।

हालांकि जीवन को इस तरह के अवसाद से बचाने का स्थायी समाधान जिम्मेदारियों से बचने में नहीं है और न ही किसी तरह के जश्न, सैर-सपाटे, दोस्तों और परिवार से जुड़े रहने से हम इस अवस्था से बच सकते हैं।

यकीनन जीवन में इन सबका होना हमें स्वस्थ और खुश बनाए रखने में सहायक है, पर फिर सबके होते हुए भी हमारे मन को उदासी क्यों घेर लेती है?

अपने जीवन की कई समस्याओं के समाधान के लिए प्रकृति की ओर रुख करना हमेशा हितकर होता है। प्रकृति का संतुलन हमेशा से हमें चकित करता आया है।

हम अपनी धरती से ही प्रेरणा ले सकते हैं, जिसकी संतुलित चाल से हमारा जीवन संभव है। हम सभी जानते हैं, धरती सूरज के चारों ओर लगातार चक्कर लगाती है, इसी वजह से दिन और रात का चक्र चलता है, मौसम बदलते हैं और जीवन संभव होता है।

जिस तरह हम भी लगातार दूसरों की, अपनों की जरूरतों का खयाल रखते हैं, जिसके कारण हमें प्रेम, गरमाहट, आत्मीयता मिलती है, खुशियां मिलती हैं, जीवन को अर्थ मिलता है।

गौर करने की बात है कि धरती सूरज के चारों ओर चक्कर लगाते समय खुद की धुरी पर भी लगातार घूम रही होती है। अगर वह अपनी धुरी पर घूमना बंद कर दे, तो जीवन ही असंभव हो जाएगा।

अपने जीवन में हमें कई सारी परिस्थितियों, विचारों और अपनी दिनचर्या में संतुलन साधने की जरूरत होती है। लगातार सक्रिय बने रहते हुए, कई सारी जिम्मेदारियों को निभाते हुए, सबके प्रिय व्यक्ति होते हुए भी अगर कभी उदासी घेर ले, तो समझ लेना चाहिए कि कहीं न कहीं संतुलन बिगड़ रहा है।

अपनों का खयाल रखते हुए खुद की जरूरतों का भी ध्यान रखकर संतुलन स्थापित करना बेहद आवश्यक है।

हमारे जीवन के केंद्र में हर हाल में, बिना अपराधबोध के हम अपने आप को रख सकते हैं। हमारी व्यक्तिगत उपलब्धियां, खुशियां, हमारा रास्ता, दिशा, लक्ष्य, दूसरों से पृथक हो, यह संभव है और स्वाभाविक भी।

मानसिक स्वावलंबन इसी तरह संभव हो सकता है, जो कि हमें स्वस्थ, मजबूत और संतुलित इंसान बनाता है।

जीवन में हमारा अपना एक छोटा-सा घेरा जरूर होना चाहिए, जिसके भीतर हमने अपनी छोटी-सी दुनिया बसाई हुई हो, जिसकी खुशियां, संतुष्टि किसी और पर बिल्कुल भी निर्भर नहीं करती हो।

यह वह कोना हो, जो वास्तव में हमारा घर हो, जिसमें हम खुद को सुरक्षित और खुश महसूस कर सकें।

किसी भी तरह की परेशानी में भी यहां हमें आराम मिल सके, हम फिर से तरोताजा हो सकें और वापस लौट सकें उन जिम्मेदारियों की ओर, जो हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं, जिनके होने से हमें गरमाहट और प्रेम मिलता है, हमारे जीवन को अर्थ मिलता है।

जीवन का असली सुख सबको साथ लेकर चलने में जरूर है, पर जीवन संभव ही तब है, जब हम अपनी धुरी पर घूमना कभी न भूलें।